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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-4

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, सितंबर 25, 2011 | रविवार, सितंबर 25, 2011


आवरण
अचानक कोई जाग जाएगा
और देखेगा जो उसने खोया था
पा लिया है
और हर पायी हुई चीज को
रखना पड़ता है सुरक्षित अपने पास ही
और संचय  पुराने होते जाते हैं
समय उन्हें ढकते चला जाता है
आवरण पर आवरण
और जीवन के आवरणों से ढकी हुई चीजों से
किसी बहुमूल्य को निकाल  लेता हूं एक दिन
सारी सफाई के बाद एक उत्तम खनिज
जीवन के किस रस में ढालना है इसे
अब यह हमारी बारी है।



जो मिला है मुझे
उपदेश कभी खत्म नहीं होंगे
वे दीवारों से जड़े हुए
मुझे हमेशा निहारते रहेंगेए
जब मुझमें अपने को बदलने की जरूरत थी
उस वक्त उन्हें मैं पढ़ता चला गया
बाकी समय बाकी चीजों के पीछे भागता रहाए
अत्यधिक प्रयत्न करने के बाद भी
थकता नहीं हूं
कुछ न कुछ हासिल करने की चाह।
जो मिला है मुझे
जिससे सम्मानित महसूस करता हूं
गिरा देता हूं सारी चीजों को एक दिन
अपने दर्पण में फिर से अपनी शक्ल देखता हूं
बस इतना काफी नहीं है
इन बिखरी चीजों को भी सजा कर रखना है
वे सुन्दर.सुन्दर किताबें
वे यश की प्राप्ति के प्रतीक
कल सभी के लिए होंगे
और मैं अकेला नहीं हूं कभी भी।


तस्वीरें
बचपन की सिर्फ दो या तीन तस्वीरें थी हमारी एक साथ
सब में ए मैं उनकी बगल में खड़ा हुआ
पर किसी में भी हंसता हुआ नहीं
मालूम नहीं यह कैसी चुप्पी थी यह
जो हमेशा हमारे साथ रही
शायद बचपन से ही मैं अपना भविष्य
अलग तरह से सोचता थाए
और शायदए वे अलग तरह से रखना चाहते थे मुझे।
मेरे अपने बेटे के साथ भी कम ही हैं तस्वीरें
उनमें भी हम हंसते हुए नहीं
बस पिता और पुत्र की तरह एक साथ खड़े हैं हम।
हर दिन बड़ा होता जा रहा है बेटा
अपने ख्वाबए अपनी खूबसूरत आंखों से देखता है
और मेरे पास आकर भी अपनी ही दुनिया में खोया हुआ
कभी कोई मजाक की बात आती तो हम हंसते भी
लेकिन तस्वीरें कौन खींचता हमारी उस मौके पर
ऐसा नहीं है कि हम हंस नहीं सकते साथ.साथ
जब वह छोटा था हम हंसे थे कई बार
एकदम शुरूआत मेंए जब वह बात.बात पर हंसता था
इतनी प्यारी हंसी कि जिसका कोई साथ नहीं छोडऩा चाहता था
अब तो समय के साथ कितना बदल गया है वह
उसकी दाढ़ी के  कड़े.कड़े बाल
उसके हंसने से पहले ही तन जाते हैं हमारी ओर।


डायरी में
आज चारों तरफ कितना खाली है
कहीं भी जा सकता हूं मैं आसानी से
कितना तरल हो गया हूं मैं
कि किसी लैम्प की रोशनी भी मुझे नहीं रोकती
न ही ये पैदल सवार या गाडिय़ां
सभी से जैसे भिन्न हूं मैं
सडक़ पर पानी की तरह बहता हुआ
कोई खुशी छू चुकी थी मुझे कभी की
अब मुझे उसका पता चलाए
एक नशा सा पूरे शरीर में
मन करता है इसे बस संभाले रहूं
इसी में डूबा रहूं
रुकता हूं तो बस सारे सोच बंद
सपनों की सवारी से बाहर आ गया हूं जैसे
लिख सकता हूं आज की रात मैं यही बात
सोने से पहले
अपनी इन डायरी के पन्ने में।





अत्मीयता
उसने कितनी आत्मीयता से कहा थाए
आपने दावत देने का वादा किया था और नहीं आये
उसके  शब्दों में एक मीठा आग्रह था
साथ न बैठ पाने का सहज दुख
और वो जानती थी कि उसका हक मुझ पर कितना कम था
यह मुलाकात एक सुंदर दृश्य की तरह
और उसे सब कुछ भुला देना था।
उस दिन अचानक ही हम एक.दूसरे को अच्छे लगे थे
कोई कारण नहीं था बातें करने का
फिर भी हमारी उत्सुकता ने हमें मिला दिया
वह हंसी थी जैसे पहली बार में ही
अपना परिचय देने को इच्छुक हो
लेकिन मैंने पाया असीम था उसके पास देने को
बातों ही बातों में और अधिक जीवंत होती जा रही थी वो
कोई विवरण नहीं था उसके पास
किसी तरह का कोई स्पर्श भी नहीं
बस अपनी कोमल भावनाओं का इजहार
और मुश्किल हो रहा था मुझसे यह सब कुछ सहना
शायद इसलिए कहा था मैंने उससे
अलविदा!  कल फिर मिलेंगे
और आज बस उससे क्षमा मांगने आया था।



घटित होती हुई सांझ
सांझ से पहले हमें वहां पहुंचना है
और देखेंगे हम सूर्यास्त।
यह किनारे की भूमि
जहां से धीरे.धीरे सागर में अस्त होता है सूरजए
बस आखिरी किरणों की झलक
नारियल के दो पेड़ों पर
जिनके बीचोंबीच से गुजरती हुई छोटी सी नाव।
हमारी हर पल दृष्टि नाव पर
मद्धिम होती जा रही है जिसकी झलक
बैठा हुआ आदमी उसमें
दिखाई देता है जैसे बिंदु पेंसिल का।
किरणों का गिरना और उठना लहरों पर
और लौटते हुए पक्षियों की परछाई का स्पर्श जल पर।
यहां से कितने सारे पक्षी उड़े
सबने वापसी दर्ज की लौटने कीए
अंतिम पक्षी की उड़ान के साथ
अस्त होता हुआ सूरज
चारों तरफ अंधेरे की लकीरें
अपना काला रंग भरती हुई
और हमारी उत्सुकता खत्म हो चुकी हैं अब।


समुद्र के किनारे
कितने सारे पेड़ चाहिएं नारियल के
इस प्रदेश को हरा.भरा दिखने के लिए
और बगल सेए वेग से आगे बढ़ता पानी समुद्र का
जिस पर जलते हुए सूर्य की चिंगारी ठंडी होती हुई।
इस रेतीले तट पर निशान ही निशान लोगों के
जैसे सभी को पहचान दे सकती हो यह जगह।
हवा उठती है बार.बार लहरों की तरह
मेरे पंख हों तो मैं भी उड़ चलूं।
चारों तरफ यात्री ही यात्री
और सामने सूचना पट पर लिखा है
खतरा है पानी के भीतर जाने से
और एकाएक अनुशासन को टटोलता हूं
मैं अपने भीतर।
और यकीन करता हूं कि
खुशियों के  साथ इनका भी कुछ संबंध है।



रेगिस्तान
रेगिस्तान हो या पथरीले पहाड़
हरियाली फूटकर बाहर आ जाती है
जैसे वे आत्मा के रंग ही हों
थोड़े.थोड़े हरे रंग भरे हुए यहां
जिन्हें कभी ओस नसीब नहीं होगी
न ही बारिश।
फिर भी ये धीरे.धीरे बढ़ते रहेंगे
चमकते रहेंगे हमारी आंखों में समाकर।
जीवन एक से निकलता है
समा जाता है दूसरे में
यहां सुनसान सी दुनिया
रेत में भी रेत के कण उड़ते हुए
थोड़े से लोग मौजूद
बाजार से ऐतिहासिक चीजें खरीदते हुए
यहां के बाजार कभी नहीं बदलेंगे
वे छोटी.छोटी चीजें ही हमेशा बेचेंगे
और मेरे हाथों में जो तस्वीरें हैं
इन पुरानें अवशेषों की
यह  इतिहास का एक पन्ना है
जिसे कागज में सुरक्षित
ले जा रहा हूं वापस ।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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