डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-5 - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-5


समुद्र तट पर
इतने लोगों की भीड़
इनके साथ रहूं या साथ छोड़ दूंघ्
मैं अकेला समुद्र तट पर
एक मात्र कुर्सी पर भी कर सकता हूं विश्राम
चारों तरफ जलए जैसे नहीं हो कुछ इसके सिवा
अगर कुछ है तो मैं ही हूं इतना भर ही।
इस सुबह की धूप में कोई मजाक नहीं करता
न ही चढ़ता है किसी पेय का नशा
आंखें ढूंढ़ती रहती हैं रंग.बिरंगी बोटें
और यात्री उन पर आते.जाते हुए।
हर छोटा बच्चा रेत से घर बनाना चाहता है
जैसे यह हमारी पैदाइशी ख्वाहिश
और भाग रहे हैं जो मछलियों के पीछे
जाल उनके पंजों की तरह हिलते हुए
पूरे बाजार में समुद्री खाद्य पदार्थ टंगे हुए
जैसे चित्रित करते हों सूखे समुद्र को।
कितना कुछ है यहां
और मैं देखता भर हूं सिर्फ समुद्र की लहरों को
लहरें मेरे पास आती हुईए मुझसे दूर जाती हुई
मुझे अपने पास आने का प्रलोभन देती हुई।



सृजन रुकता नही 
काफी तेज बारिश हुई है
लगा एक मुश्किल समय सामने है
फूलों की मुश्किल कि उन्हें धोने की जरूरत नहीं थी
और बेवजह उनके धुले चेहरे मुर्झाने लगे
इतना अधिक पानी कि पत्ते जरूर चमकने लगे।
सभी तरफ से घिरे बादल भी
रोशनी को नहीं रोक सकते
मैदान जल से भरे हुए
अब लोग क्या काम करें
वे चुपचाप थके हुए से
धूप का करते हुए इंतजार
गुलाब के कांटे बिल्कुल धारदार
पत्तों की नोक तक दिखती है
पक्षियों के बिना सूना आकाश
फिर भी सृजन रुकता नहीं
घास में हरियाली पहले से अधिक असरदार।

आधुनिकता
ये कितने ही अनजाने चेहरे
जिन्हें हम देखते हैं रोज
कितनी ही बार उनके पास से गुजरते हैं
कभी साथ भी बैठ जाते हैं
सफर में
लेकिन हममें दूरियां हैं
नीचे से ऊपर तक की
दूरियां सपने और वास्तविकता जितनी ।
सभी का मिलन संक्षिप्त होता है
टुकड़ों.टुकड़ों में बनते.बिखरते संबंध
और सांसों का प्रयास
कि जल्दी ही हम अपने काम पर पहुंचें।
किसी ने गिरे हुए आदमी की मदद की
यह उपकार थोड़ी देर में खत्म हुआ
और भूल गए लोग सारी गाथा।
एक कहानी से कुछ सबक लिया गया
फिर वो किताब खुली ही नहीं वर्षों तक।
दिन के  उजाले कितने ही प्रकाशित कर दें
कितनी ही सारी चीजों को
आधुनिकता हमें बहुत कम देर ही
ठहरने देगी उस छोर तक।
प्यार से देखता हूं एक पल इस तोते को
मुस्कान से वो चोंच खोल देता है
मेरी खुशी को वो देखे
उससे पहले ही मैं उससे दूर चला जाता हूं।


जमीन
सिर्फ तीन कठ्ठा जमीन पाने का मकसद था मेरा
और मैंने दांत गड़ाये रखे थे अपनी जिद पर
कि किसी तरह से भी हासिल करके रहूंगा मैं इसे
हौसले बुलंद होते थे मेरे हर दिन
और चेहरे पर तनाव आ जाता था घर लौटते.लौटते
और तनाव उस दिन चरम पर था
जब यह भूमि मेरे पास थी
इस पर कहीं घास तो कहीं भूरि मिट्टी
मैं इसके  बीचों.बीच खड़ा
जैसे सारी जमीन की धूरि मैं ही हूं
इस बीचए कितनी ही बार आवाज निकली होगी
मेरे भीतर सेए
कि मैं इस जमीन का मालिक  बन गया हूं
मेरी मालिकियत जैसे इसके कण.कण पर राज करती है
और मैं अपने अधिकार को अपने कब्जे में रखकर
गर्व से चलता हुआ
कितनी रौनक से भरा हुआ महसूस करता हूं।


प्रकाश
हर अंधेरे की भूख
कि उसे केवल प्रकाश चाहिए।
अपने अंतिम क्षणों तक भी
आंखें मूंदना नहीं चाहता कोई
प्रकाश हमें थोड़ा सा मिला
यही हमारा दुख है।
मेरी सारी गतिविधियों में शामिल है प्रकाश
यह मेरे साथ उठता और बैठता हुआ।
चाहे कितना भी अंधेरा न हो जाएं
गुम हो जाएं सारी बत्तियां
एक अंधकार चारों ओर जैसे पानी के नीचे हम दबे हुए
फिर भी हम तड़पेंगे आंखें  खोलने के लिए
मैं इसी तड़प को देखता हूं दिन.रात
कुछ है जो मेरे भीतर
जो अपना मार्ग ढूंढ़ता है
और ये शब्द उसी के माध्यम से
अपनी आंखें खोलते हैं कागज पर।




बच्चे
बच्चे लाइन में चलना नहीं चाहते
बच्चे नहीं जानते यह सुरक्षा का नियम है
बच्चे लाइनें तोड़ देते हैं
वे खेलना चाहते हैं मनपसंद बच्चों के साथ।
बच्चों के लिए कोई थकान नहींए
न ही कोई दूरी है
दायरा है दूर.दूर तक देखने का
वे खेलते समय पाठ याद नहीं रखते
भूल जाते हैं पढ़ाई भी कुछ होती है
बच्चे मासूम उगते हुए अंकुर या छोटे से वृक्ष
अभी इतने कच्चे कि हवा से लथ.पथ
इनके चेहरे याद नहीं रहते
जैसे सभी अपने हों और एक जैसे
और उनकी खुशियां समां लेने के लिए
कितना छोटा पड़ जाता है यह भूखंड।


एक संगीत समारोह में
शांति चारों ओर थी
और उसके संगीत के साथ परम शांति की ओर बढ़ते हम सभी
अगर शुरू के स्वरों से बाद में आने वाले शब्दों को
बांध लें हम मन मेंए
तो संगीत को नृत्य के रूप में देखा जा सकता है यहां
यह संगीत अपनी लय में नृत्य करता हुआ
और उनकी आवाजए चेहरे और वाद्यों की धडक़न
जैसे हममें स्थित किसी सुप्त स्रोता को पुकारने लगी हो
जो अब लगभग पूरी तरह से जाग गया था
और सुर.ताल में स्थित प्रखर तेज का आलिंगन करने लगा था
हम स्थिर होकर भी महासमुद्र का गोता लगाते हुएए
कोई चुप नहीं यहां
सभी एक ही मंच को आलिंगनबद्ध किये हुए।



पगडंडी 
जहां से सडक़ खत्म होती है
वहां से शुरू होता है
यह संकरा रास्ता
बना है जो कई वर्षों में
पॉंवों की ठोकरें खाने के बादए
इस पर घास नहीं उगती
न ही होते हैं लैम्पपोस्ट
सिर्फ भरी होती है खुशियॉं
लोगों  के  घर  लौटने की !



अंतिम संस्कार
मैं गुजर रहा था
अपने चिरपरिचित मैदान से
एकाएक चीख सुनी
जो मेरे सबसे प्रिय पेड़ की थी

कुछ लोग खड़े थे
बड़ी.बड़ी कुल्हाडिय़ॉं लिये
वे काट चुके थे इसके हाथ
अब पॉंव भी काटने वाले थे

मैंने इशारे से उन्हें रोकना चाहा
वे रुके नहीं अपना काम करते रहे

मैंने फिर कहा माफ  करो इसे
अगली बार यह जरुर फल देगा
इसमें पत्ते भी आयेंगे और फूल भी
पथिक भी आराम करेंगे
चिडिय़ॉं भी घोंसले बनायेंगी

नहीं वे माने और न ही रुके
केवल बुदबुदाते रहे.
मरे हुए का शोक करता था
कौन है यह आदमीघ्
क्या इसे अपना हिस्सा चाहिएघ्

आगे मैं कुछ बोलता
वे पहले ही बोल पड़े.


हम लोग लाश उठा रहे हैं
अंतिम संस्कार भी करा देंगे
तुम राख ले जाना

वे बहुत खुश थे
जोर.जोर से हॅंस रहे थे
जड़ें हिल रही थीं उनकी हॅंसी सेए
कुल्हाडिय़ॉं चमक रही थीं
और उखडऩे लगे थे
धरती से मेरे पॉंव ।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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