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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, सितंबर 22, 2011 | गुरुवार, सितंबर 22, 2011


कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा ऋण

रात जिसने दिखाये थे
हमें  सुनहरे सपने
किसी अजनबी प्रदेश के
कैसे लौटा पायेंगे
उसकी स्वर्णिम रोशनी

कैसे लौटा पायेंगे
चॉंद. सूरज को उनकी चमक
समय की बीती हुई उम्र
फूलों को खुशबू
झरनों को पानी और
लोगों को उनका  प्यार

कैसे लौटा पायेंगे
खेतों को फसल
मिट्टी को स्वाद
पौधों को उनके फल

ए धरती तुम्हीं बता
कैसे चुका पायेंगे
तुम्हारा इतना सारा ऋण ।


दादी जी के लिए

तुम नहीं हो
फिर भी हमें लगता है
तुम यहीं कहीं हो

कभी घड़े के पानी की तरह
उतरती हो हमारे गले में
कभी अन्न का स्वाद बनकर
शांत करती हो हमारी भूख

दीये की लौ की तरह
जलती हो हमारी पूजा में
फूलों की सुगन्ध बनकर
बसती हो हमारी प्रार्थना में

एक आभास की तरह
जिन्दा हो हमारे रग.रग में
हवा की तरह मौजूद हो
हमारे हर दुरूख. सुख में

तुम यहीं कहीं
बसी हुई हो हमारे दिल में
जैसे मौजूद थे हम कभी
तुम्हारी कोख में ।

यह लालटेन

सभी सोये हुए हैं
केवल जाग रही है
एक छोटी.सी लालटेन
रत्ती भर है प्रकाश जिसका
घर में पड़े अनाज जितना
बचाने के लिए जिसे
पहरा दे रही है यह
रातभर ।


परीक्षाफल

वह बच्चा
पिछड़ा हुआ बच्चा
चील की तरह भागा
अपना परीक्षाफल लेकर
अपनी मॉं के पास
एक बार मॉं बहुत खुश हुई
उसके अच्छे अंक देखकर
फिर तुरंत उदास
किताबें खरीदकर देने के लिए
पैसे नहीं थे उसके पास।


ऊँचाई पर

ऊँचाई पर चढ़े लोगों को
दुनिया बहुत छोटी नजर आती है
और नीचेवालों को
ऊपरवाला बहुत दूर।



उसके पीछे

गाड़ी चमक उठी थी
उसके हाथों की रगड़ से
जिसके पीछे उसे अपना झॉंकता हुआ
चेहरा नजर आया
और उसके पीछे
सवार भूख ।


प्रतिबिम्ब


अपनी असंख्य डालियों का बोझ उठाये
चुपचाप खड़ा है यह पेड़
और इसके भीतर
मैं देखता हूं
एक बोझ ढोने वाली
औरत का प्रतिबिम्ब ।


बैण्डबाजे वाले

आधी रात में
बैण्डबाजे वाले
लौट रहे हैं
वापस अपने घर
अन्धकार के पुल को
पार करते
जिसके एक छोर पर
खड़ी है उनकी दुखभरी जिन्दगी
और दूसरे छोर पर
सजी.धजी दुनिया ।

तुम्हारी थकान


इधर तुम काम बन्द करते हो
उधर सूरज अपनी रोशनी
चारों तरफ अंधेरा छा जाता है
और तुम्हारी थकान
जलने लगती है
एक मोमबत्ती की तरह ।

फुटबॉल

अचानक गोल
कुछ दर्शक चिल्लाते हैं
बहुत अच्छा हुआ
कुछ  चुपचाप हैं
अपने पक्ष को
हारते देख
गेंद को थोड़ा.सा भी
अवसर नहीं
सोचने काए
वह किसका साथ दे
किसका नहीं ।



पिंजड़ा

सचमुच पिंजड़े के बाहर
कितनी आजाद है दुनिया
और इसके भीतर कितनी तंग
फासला दोनों के बीच है
बस हाथ बढ़ाओ और
छू लेने जितना
फिर भी लग जायेगी
सारी जिन्दगी इस पंछी को
इसे पार करने में भी॥

शंका

कचड़ा उठाने वालों पर
कुत्ते भौंकते हैं
जबकि वे जानते हैं
अब कचड़े में कुछ भी   नहीं
जो भी था वे खा चुके
फिर भी शंकित .
शायद कुछ बचा हो।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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