डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-6 - अपनी माटी

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गुरुवार, सितंबर 29, 2011

डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-6


अनुभूतियां

सचमुच हमारी अनुभूतियां
नाव के चप्पू की तरह बदल जाती हैं हर पल
लगता है पानी सारे द्वार खोल रहा है खुशियों के
चीजें त्वरा के साथ आ रही हैं जा रही हैं
गाने की मधुर स्वर लहरियां गूंजती हुई रेडियो से
मानों ये झील के भीतर से ही आ रही हों
हम पानी के साथ बिलकुल साथ.साथ
और नाव को धीरे.धीरे बढ़ाता हुआ नाविक
मिला रहा है गाने के स्वर के साथ अपना स्वर
और हम खो चुके हैं पूरी तरह सेए
यहां की सुन्दरता के साथ।

मनाली में
ये सेव के पेड़ कितने अजनबी है मेरे लिए
हमेशा सेव से रिश्ता मेरा
आज ये पेड़ बिल्कुल मेरे पास
हाथ बढ़ाऊं और तोड़ लूं
लेकिन इन्हें तोड़ूंगा नहीं
फिर इन सूने पेड़ों कोए
खूबसूरत कौन कहेगा।

 पत्र
वह अंतिम पत्र था हमारे बीच
फिर कोई पत्र नहीं लिखा गया
पिछले सारे पत्रों के ऊपर था यह
अपने नीचे सभी को छुपाये हुए
जब भी इच्छा होती थी मन में
पुराने पत्रों को पढऩे की
सबसे पहले इसे ही पढऩा होता था
फिर पिछला. फिर निचला
इस तरह से हम वापस
अपने प्रेम की शुरूआत में पहुंच जाते थे।
वो पहला पत्र सचमुच खूबसूरत था
जैसे पहले आंसू प्रेम के छलके हुए
दृढ़ता से आपस में जुडऩे की तैयारी।
वर्षों लगे थे हमें करीब आने में
और जिस दिन पूरे करीब आ गए थे
लिखा गया था यह अंतिम पत्र।

आग
चीजों के राख में बदल जाने के बाद
कुछ भी मालूम नहीं होता
इसका पिछला स्वरूप क्या था
और आग जलती है बिना भेद.भाव के
प्राप्त करती है अपनी खुराक नरम चीजों से
और पकडऩे को बढ़ती है सख्ती की ओर
लेकिन कितनी आसानी से बांध लेते हैं इसे
छोटे से मिट्टी के दीये भीए अपने आकार में
जबकि सूरज की आग की हमें परवाह नहीं
ना ही डर है चांद. सितारों से
क्योंकि ये दूरस्थ मित्र हैं हमारे
रोटी की तरह हमारा पोषण करते हुए
और वह आग बेहद डरावनी हो सकती है कल
जो अभी बंद है किसी माचिस की डिब्बियां में
और जिसे शैतानी हाथ ढूंढ़ रहे हैं धुप्प अंधेरे में।

विदाई
एक पत्थर जो पड़ा है वर्षों से वहीं का वहीं
कभी विदा नहीं होता जलधारा के साथ
और एक दिन हार मान लेती है नदी
ना ही कभी विदा होते हैं उर्वरक धरती से
चाहे कितनी ही फसलें उगाई और काट दी जाती रहेंए
तुम जो मेरे सीने से निकलती हुई धडक़न हो
जो एक दिन दो से तीन हुई थी
जहां भी रहोगीए कहीं की भी यात्रा करती हुई
फिर से लौट कर आओगी
नाव की तरह अपने तट पर
और हम फिर से मिलकर एक हो जाएंगे
और बातें करेंगे हमेशा की तरह
उन्हीं पुरानी कुर्सियों पर बैठ कर।


यहां की दुनिया
बच्चा अभी.अभी स्कूल से लौटा है
खड़ा है किनारे पर
चेहरे पर भूख की रेखाएं
और बाहों में मां के लिए तड़प।
मां आ रही हैं झील के उस पार से
अपनी निजी नाव खेती हुई
चप्पू हिलाता है नाव को
हर पल वह दो कदम आगे बढ़ रही
बच्चा सामने है
दोनों की आंखें जुड़ी हुई
खुशी से हिलती है झील
हवा सरकती है धीरे.धीरे
किसी ने किसी को पुकारा नहीं
वे दोनों निकल चले आये ठीक समय पर
यही है यहां की दुनिया।

यहां के दृश्य

यहां दृश्य टुकड़ों.टुकड़ों में बिखरे हुए हैं
एक.एक कण सभी को समर्पित
थोड़े से बादल हटते हैं
दृश्य कुछ और हो जाता है
हवा चलती है जैसे हम सभी को
एक साथ समेट लेने को
मन में इच्छा होती है वैसी आंखें मिल जाएं
जो सब कुछ ले जाएं अपनी झोली में।
थोड़ी सी तस्वीरें खींची हुई मेरे पास
एक पेड़ की डालियों जितनी भर
और यहां तो हर क्षण
कहीं भी जा सकते हैं आप दूर.दूर तक
वो भी पलक झपकाये बिना
और भूल जाते हैं हम
किस दुल्हन का मुखड़ा ढूंढ़ रहे हैं हम यहां।

  हाथ मिलाना
उम्मीद खत्म हो जाती है जहां से
दूरियां बननी शुरू हो जाती हैं वहीं से
अब तो इन दूरियों से भी
वापस लौटकर आना होता है
किसी को भी नहीं कह सकते
हमेशा के लिए अलविदा
वास्तविकता तो यही है
मुलाकात के समय हाथ मिलाओ
लौटने के वक्त फिर से हाथ मिलाओ
एक बार जुडऩे के लिए एक बार बिछुडऩे के लिए
एक पल में सबको अपना कह दो
दूसरे पल में पराया
इसी तरह की हो गयी है दुनिया।


घटनाएं


रात और दिन की विभिन्न घटनाएं
हमारे इर्द.गिर्द नाचती रहती हैं
जैसे इन्हें कोई सुर और ताल दे रहा हो
और हर कांपते हुए क्षण को
मैं पूर्ण सजगता से देखता हूं
कहीं यह अविश्वास और आक्रोश की कंपन तो नहीं
और जमीन पर रख देने से
सारी थालियां चुप हो जाती हैं।


 वे क्षण जो मोतियों की लडिय़ों की तरह
मेरे पास से गुजरे
मैंने उन्हें चन्दन की तरह माथे से लगाया
और उनकी आराधना की।


 आभारी हूं मैं इस भूमि और आकाश का
जिसने मुझे रहने की जगह दी
और उन्हें पूरा हक था मेरी आत्मा को खोलकर देखने का
और मुझसे हर सवाल पूछने का ।


वे सारे क्षण जब मैंने किसी से प्यार किया था
कभी लौट कर नहीं आये
मैंने उन्हें पाने के लिए
अपनी भाषा में लड़ाई की
और उन पर लगातार लिखता रहा।


वो सारी चीजें लुप्त हो गयी हैंए जो
मैं तुम्हें फिर से याद करता हूं
मैं फिर से अपनी उदास स्मृतियों में
रंग भरने की कोशिश करता हूं
और पाता हूं आज भी वे जिंदा हैं
उन्हें अब भी मेरी जरूरत है
और उनकी हंसी को चारों ओर पहुंचाया जा सकता है।                    

किताब
अनगिनत सीढिय़ां चढऩे के बाद
एक किताब लिखी जाती है
अनगिनत सीढिय़ां उतरने के बाद
एक किताब समझी जाती है।

छत
इन्हें भी चाव है स्थिरता का
और शौक कि लोग आयें बैठें.टहलें उसमें कुछ देर
उपयोग किया जाए उसका अच्छी तरह से।
नीचे भी दीवारों से घिरी खोखली नहीं है यह
क्षमता है इसमें सब कुछ समा लेने की
चाहे बिस्तरए मेज या रसोई का सामान
और कैसी भी छत हो इस दुनिया की
अपने ऊपर धूप सहती है
और नीचे देती है छांवए
अपनी आखिरी उम्र तक
तथा जिस दिन उजड़ती है यह
उस दिन महसूस होता है
कितना बड़ा आकाश ढ़ोती थी
यह अपने सर पर।


मेरा मित्र
किसी को भुलाया नहीं जा सकता
एक.एक करके सब लौट आयेंगे
वापस इस जिन्दगी में
अलग.अलग विचित्र चीजें
दिखाई देंगी इन रास्तों पर
लेकिन यह नीला आकश
वैसा का वैसा
दूर से अपने रंग भरता हुआ
कभी नहीं छोड़ेगा हमारा पीछा
क्या यही है मित्र मेरा सबसे बड़ा
और इसके पास तो हैं
बड़े.बड़े चाँद.सितारे
मैं एक छोटा सा शून्य
वो भी बिना किसी चमक का
फिर भी यह सम्बरन्धय बनाये रखता है मुझसे
भेजता रहता है अपनी रोशनी मुझे हर पल।




खिलाड़ी
कुछ अलग सा होता है
एक बड़े खिलाड़ी का खेल
मारता है वह गेंद
अपनी पूरी ताकत से
जैसे कोई विस्फोट हुआ हो
लेकिन निशाना निर्धारित करती है आँख
और इस गेंद को देखो
आकाश और जमीन के बीच उड़ती हुई
इसमें खिलाड़ी की आँख भी है
पाँव भी है
और मजबूत इरादा भीए
गिरती है यह जब गोल पोस्ट के भीतर
वाह.वाह होती है कितनी
जबकि एक नये खिलाड़ी के पास
न तो वो आँख और न ही वो पाँव
इरादा भी गिरा हुआ
इसलिए झूमती है उसकी गेंद
बच्चे की तरह इधर.उधर।



योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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