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'‘रंग छवियाँ’ में एकांकीकार द्वारा क्रान्ति को ‘‘बगावत’’ कहना भ्रमपूर्ण है''- डॉ. आर.सी.मीणा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, सितंबर 04, 2011 | रविवार, सितंबर 04, 2011


पाठक मंच,बूंदी,राजस्थान 
2 सितंबर 2011 को राजकीय महाविद्यालय,बूंदी में राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के तत्वावधान में ‘‘पाठक मंच’’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें अकादमी द्वारा प्रकाशित तथा डॉ. मदन शर्मा द्वारा संपादित ‘‘रंग छवियाँ’’ पुस्तक पर पत्रवाचन के बाद पाठकों द्वारा चर्चा की गई। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि वरिष्ठ साहित्यकार  गणेश लाल गौत्तम, अध्यक्षता दकाल के सम्पादक घनश्याम लाडला ने की। कार्यक्रम के प्रारंभ में प्राचार्य डा. डी.के.जैन ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य समाज नई दिशा देता है। जब जब समाज दिशा भ्रम होता तब साहित्य की जरूरत पड़ती है।  कार्यक्रम संयोजक डॉ. आर.सी.मीणा ने अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक तथा योजना के बारे में विस्तार से बताया।

कार्यक्रम में इसके बाद डॉ. सियाराम मीणा तथा  आलोचक डा. एल.एल.योगी द्वारा रंग छवियाँ पुस्तक पर पत्र वाचन करते हुए पुस्तक के महत्व एवं कथ्य पर प्रकाश डाला। पत्र में डा. सियाराम मीणा ने संग्रह में प्रकाशित 14 एकांकियों का परिचयात्मक विश्लेषण करते हुए बताया कि कण्ठहार एकांकी राष्ट्रीय भावना की सशक्त अभिव्यक्ति है, डालर अण्डा लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में आ रही मूल्यपरक गिरावट, टूटता भ्रम पराये रिश्तों में सुख की कल्पना के भ्रम को तोडती है, गृहस्थी के गुलगुले में नोकरी पेशा औरत की परिवारिक समस्याओं से रूबरू करावाया है। आलोचक डा. एल.एल.योगी ने  एकांकी को साहित्य की सर्वोत्तम विधा बताते हुए कहा कि समीक्षित पुस्तक में आये गीति, ध्वनि और तुर्रा कलंगी नाटय एकांकियाँ में आ रहे सामाजिक बदलाव को चिन्हित किया है। डा. औंकारनाथ चतुर्वेदी की सूर्यमल्ल मिश्रण पर आधारित ‘‘कण्ठहार’’ को नाट्यविधा में देखकर प्रशन्नता व्यक्त की। कवि के वंशभास्कर को राष्ट्रीय चेतना का आल्हाखण्ड बताया। समाज में आ रही गिरावट, दाम्पत्य संबंधों में आ रहे ठण्डेपन व टूटन तथा अधिकांश मध्यम वर्गीय टूटन से जुडी नाटिकाएं है।

दोनों पत्रों पर सदन में गरमा-गरम  बहस हुई। बहस की शुरूआत करते हुए  गुलाबचन्द पांचाल ने ‘‘कण्ठहार’’ एकांकी में आई एतिहासिक तथ्यपरक त्रुटियों की ओर सदन का ध्यान आकर्षित किया। एकांकी में सन् 1857 की क्रांति के लिए आये ‘‘बगावत’’ शब्द पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि वंशभास्कर राजाओं की गाथा गायन मात्र है। कार्यक्रम संयोजक ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि एकांकीकार द्वारा क्रान्ति  को ‘‘बगावत’’ कहना भ्रमपूर्ण है क्योंकि यह क्रांति अब जनक्रंाति के रूप में जानी जाती है। एकल पात्र पर आधारित ‘उनके लौटने तक ’’एकांकी के शिल्प पर आपŸिा दर्ज की जिसके जवाब में डा. एल.एल.योगी ने बताया कि एकल पात्र में भी संवाद संभव है, पात्र स्वगत कथन के माध्यम से । जब पात्र अकेला होता है तब वह सच के अधिक करीब होता है।

गणेश लाल गौत्तम ने अतिथि के रूप बोलते हुए सर्यमल्ल मिश्रण की एंकांकी पर हमें शिल्प या शाब्दिक त्रुटि पर नहीं कथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है तब यह एकांकी निश्चय ही आपको राष्ट्रीय सरोकारों से परिपूर्ण रचना लगेगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे दकाल के सम्पादक वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम लाडला ने बताया कि क्रांतियाँ कभी असफल नहीं होती। 1947 की आजादी के पीछे 1857 के महत्व को नजर अंदाज नही करना चाहिए। इनके अलावा डॉ. लालचन्द कहार, डॉ. ललित भारतीय, डॉ.नीलू चौहान और डा.बी.के.योगी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। वरिष्ठ पत्रकार दिनेश विजयवर्गीय, प्रो.गुरमित सिंह,  बी.एस. आकोदिया, डा. गोपेश भट्ट, हरकेश बैरवा और जयराम खटीक तथा हरिशंकर शर्मा ने पाठक मंच कार्यक्रम में भाग लिया। डॉ.लालचन्द कहार ने अन्त  सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ. ललित भारतीय
वर्तमान में बूंदी,राजस्थान राजकीय कोलेज में चित्रकला के असोसिएट प्रोफ़ेसर 
और स्पिक मैके के वरिष्ठ कार्यकर्ता


lalitbhartiya@gmail.com
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