''हमारी त्रासदी यह है कि हम अंग्रेजों व अंग्रेजी को खुद से बेहतर मानते रहे हैं''-डॉ हेतु भारद्वाज - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''हमारी त्रासदी यह है कि हम अंग्रेजों व अंग्रेजी को खुद से बेहतर मानते रहे हैं''-डॉ हेतु भारद्वाज


चूरू, राजस्थान 
(डॉ. हेतु भारद्वाज का चूरू में प्रयास संस्थान के हिंदी दिवस आयोजन में सम्मान करते हुए )
प्रख्यात साहित्यकार, संपादक एवं समालोचक डॉ हेतु भारद्वाज ने कहा है कि भाषा महज हमारे विचारों के आदान-प्रदान का साधन नहीं है, वह हमारे जीवन का पर्याय है। उन्होंने कहा कि जो अहमियत हमारे जीवन में सांसों की है, वही भाषा की भी है। भाषा के बिना यह दुनिया महज गूंगों की वीरान बस्ती होती है.

डॉ भारद्वाज बुधवार को राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर व प्रयास संस्थान चूरू की ओर से हिंदी दिवस पर लोहिया कॉलेज सभागार में आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भाषा का निर्माण आम आदमी करता है और उसे समृद्ध करने का काम लेखक करते हैं लेकिन भाषा के विकास की प्रक्रिया में दोनों को ही दरकिनार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विश्व की किसी भी भाषा में हिंदी से श्रेष्ठ लेखन न तो हुआ है और न ही अब हो रहा है क्योंकि हिंदी की सृजनात्मक शक्ति और अभिव्यक्ति क्षमता अद्भुत है। अनेक पड़ावों के बाद आज हिंदी विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। उन्होंने कहा कि दूसरी भाषाओं के जो शब्द हमारी जिंदगी में रच-बस गए हैं, उनके प्रति हमारे दुराग्रह नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हिंदी का दूसरा जन्म हुआ और इसके साथ ही हिंदी के खिलाफ षड़यंत्रों का सिलसिला शुरू हो गया जिसके चलते भाषा कई कठिनाइयों से गुजर रही है। उन्होंने कहा कि हमारी त्रासदी यह है कि हम अंग्रेजों व अंग्रेजी को खुद से बेहतर मानते रहे हैं और अंग्रेज भारत को कालबेलियों को देश कहते रहे। उन्होंने कहा कि यदि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई नहीं होती तो आज भी शायद भारत को कालबेलियों का देश ही कहा जाता। 

डॉ भारद्वाज ने कहा कि आजादी के बाद हिंदी की क्षमता पर शक किया गया और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी को भी राजकाज की भाषा घोषित कर दिया गया। हिंदी में तकनीकी व पारिभाषिक शब्दों के विकास के लिए जिन लोगों को नियुक्त किया गया, उन्होंने इतने कठिन शब्दों का संकलन और रचना की, जिन्हें समझना हिंदीभाषियों के लिए भी मुश्किल था। उन्होंने कहा कि भाषा का विकास एक सतत् प्रक्रिया है और हमने उसको तोड़ा है, जिसकी सजा हिंदी भुगत रही है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक हिंदी का प्रयोग करते हुए भाषा को समृद्ध बनाएं। 

इससे पूर्व डॉ भारद्वाज एवं अन्य अतिथियों ने सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उपाचार्य प्रो. ईश्वर राम जांगिड़ ने स्वागत भाषण दिया। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ मंजु शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि विश्व में करीब 600 मिलियन लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं और हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। प्रयास संस्थान के संरक्षक भंवर सिंह सामौर ने आभार जताया। अध्यक्षता  प्राचार्य एमडी गोरा ने की।  संचालन डॉ गीता सामौर ने किया। उम्मेद गोठवाल, प्रो. आर एस शक्तावत, सरोज हारित, संस्थान सचिव कमल शर्मा, एलएन आर्य, वीके अग्रवाल, ई. ए. हैदरी, मधुरिमा भारद्वाज, रूपा शेखावत, डॉ जगजीत कविया, डॉ मूलचंद आदि ने माल्यार्पण कर अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में अतिथियों ने मुख्य वक्ता डॉ हेतु भारद्वाज को शॉल एवं प्रतीक चिह़न भेंट कर सम्मानित भी किया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

दुलाराम सहारण
राज्य के चूरू  जिले में प्रमुख रूप से सक्रीय सामाजिक संस्थान प्रयास के अध्यक्ष है और एक प्रखर संस्कृतिकर्मी के रूप में जाने जाते हैं.वे पेशे से वकील हैं.
,drsaharan09@gmail.कॉम
चुरू,राजस्थान
9414327734
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