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''साहित्य में प्रकट और परोक्ष रूप से शिक्षा के सूत्र समाए हुए हैं''-प्रो.दिलीप सिंह

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 06, 2011 | मंगलवार, सितंबर 06, 2011

हैदराबाद, 6  सितम्बर,2011


साहित्य और अन्य विषयों की शिक्षा में एक मूलभूत अंतर यह है कि साहित्य में व्यक्‍तित्व विकास और जीवन मूल्यों की शिक्षा अंतर्निहित रहती है जबकि अन्य विषयों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. इसलिए हामारे जीवन में साहित्य के शिक्षक का महत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है. वह साहित्य में निहित उच्च मानवीय गुणों के प्रति हमारे मन को उन्मुख और संस्कारित करता है. यह संभव है कि कोई विशेष जीवन मूल्य स्वयं शिक्षक में विद्‍यमान न हो तो भी साहित्य के माध्यम से छात्र के मन उसे जगाया जा सकता है. यहाँ हम हिंदी साहित्य की चर्चा कर सकते हैं कि किस प्रकार पद्‍मावत में शिक्षक का प्रतीक हीरामन तोता जीवन और अध्यात्म से जुड़ी पते की बातें करता है. इसी प्रकार कबीर, तुलसी और रहीम के दोहों के माध्यम से बड़ी सहजता से नैतिक शिक्षा दी जा सकती है. 

साहित्य में प्रकट और परोक्ष रूप से शिक्षा के सूत्र समाए हुए हैं. अगर कोई साहित्यकार प्रकृति का वर्णन करता है तो वह नदी, समुद्र, वृक्ष और बादल तक को शिक्षक बना देता है कि कैसे इनके माध्यम से परमार्थ और परोपकार जैसी उदार चीज़ें सीखी जा सकती है. यही कारण है कि बचपन से ही कोई भी साहित्यिक पाठ पढ़ाने के बाद हम से यह पूछा जाता है कि इस पाठ से आपको क्या सीख मिली. गणित या अर्थशास्त्र अथवा अन्य किसी विषय के पाठ में ऐसा नहीं होता. इसलिए साहित्य का छात्र भाग्यशाली है कि वह शिक्षक और पाठ दोनों के माध्यम से जीवन को श्रेष्‍ठ बनाने की शिक्षा प्राप्‍त कर सकता है.

ये विचार दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो.दिलीप सिंह ने यहाँ सभा के खैरताबाद परिसर में आयोजित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के शिक्षक दिवस समारोह में अध्यक्ष पद से बोलते हुए व्यक्‍त किए. प्रो.सिंह ने आगे कहा कि साहित्य की ही भाँति भाषा भी हमारा शिक्षक है. उन्होंने कहा कि भाषा में सामाजिक और सांस्कृतिक अनेक ऐसे पहलू निहित होते हैं जिन्हें सीखकर हम लोक व्यवहार के साथ साथ व्यक्‍तित्व निर्माण के लक्ष्‍य को भी प्राप्‍त कर सकते हैं. उन्होंने ध्यान दिलाया है सभी भाषाओं के साहित्य में अनेक ऐसे पात्र मौजूद हैं जो हमें जीवन संघर्ष की शिक्षा देते हैं तथा हताशा के क्षणों में हमारे काम आते हैं. यदि प्राचीन साहित्य को छोड़ भी दें तो आज के कहानी और उपन्यासों में भी शिक्षा का यह गुण मिल जाएगा.

प्रो.दिलीप सिंह ने याद दिलाया कि प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का सूरदास अंधा अनपढ़ भिखारी होते हुए भी बहुत बड़ा अनाऔपचारिक शिक्षक है जो हमें समाज के लिए कुछ सार्थक कार्य करने की प्रेरणा देता है. डॉ.दिलीप सिंह ने बताया कि भाषा और साहित्य हमारे सबसे अधिक निकट सबसे बड़े शिक्षक है क्योंकि इनसे हम जीवन को सुंदर बनाने के रास्ते सीख सकते हैं अतः साहित्य को परीक्षा लिखने अथवा शोधग्रंथ रचने के लिए ही नहीं, जीवन और समाज को सार्थक बनाने की शिक्षा प्राप्‍त करने की दृष्‍टि से भी पढ़ना चाहिए.

इस अवसर पर संस्थान के छात्रों और शोधार्थियों ने वि्भागाध्यक्ष प्रो.ऋषभदेव शर्मा सहित सभी अध्यापकों डॉ.साहिरा बानू बी. बोरगल, डॉ.जी.नीरजा, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ.गोरखनाथ तिवारी और डॉ.मृत्युंजय सिंह का उत्तरीय, स्मृति चिह्‍न, पुष्‍प गुच्छ और उपहार देकर सम्मान एवं अभिनंदन किया.


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