''मुझे कोई लच्छेदार भाषण देना नहीं आता''-भड़ास संपादक यशवन्त सिंह - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''मुझे कोई लच्छेदार भाषण देना नहीं आता''-भड़ास संपादक यशवन्त सिंह




सत्य की परिभाषाएँ अनेक मिल जाएगी मगर सत्य कहीं नहीं मिलता। सच को लिखने की हिम्मत जुटाने वाले पत्रकार समय आने पर अपने मीडिया हाउस के चोंचलों में फंसते हुए अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लेते हैं। वही कलम ईमानदारी से लम्बे समय तक चल सकती है जिसका आधार सच हो। कमोबेश यही कहना है कि हमें मीडिया, सत्ता, समाज और प्रशासन जैसा ऊपर से दिखता है, तस्वीर उससे कई अलग होती है। नैतिक मूल्यों की बातें उपरी लोगों के द्वारा निचले तबके के लागों के लिए दिया गया एक सोचा समझा दर्शन है। इस दौर में मेन स्क्रीन मीडिया के भरोसे रहते हुए समाज के हर व्यक्ति को अपने बूते न्यू मीडिया आन्दोलन से जुड़ना होगा, जिसमें ब्लॉग, कम्यूनिटी रेडियो, स्वयं के छोटे-छोटे अखबार शामिल हो सकते हैं. कई छोटी वेबसाईट भी बहुत कमाल का काम कर रही है और बड़े बड़े शोषक-शासकों को परेशान करके रख दिया है.


उन्होंने कहा कि ''मैं आपके बीच का ही आदमी हूँ.मुझे कोई लच्छेदार भाषण देना नहीं आता. ही मैं कोई टी.वी. पर दिखने जैसा चेहरा लिए हूँ.सालों का अनुभव मेरे साथ है उसे ही आधार बनाकर अपनी बात रखता हूँ कि.यहाँ मीडिया जगत के खुद के भीतर क्या कुछ हो रहा है इसके फैलाव को देखते हुए हमनें भड़ास फॉर मीडिया नामक वेबपोर्टल  के ज़रिए कुछ ठोस काम किया जिसे रोजाना लाखो हिट्स मिल रहे हैं.ये एक नवाचारी कदम है .जो कहीं कहीं न्यू मीडिया की सशक्त उपज है.

इसी बीच से कुछ सालों से सिटिजन जर्नलिज्म का कोंसेप्ट भी उभरा है.जब पत्रकार ही धंधा करने लगे तो हर नागरिक को पत्रकार बन जाना चाहिए.अब पत्रकारिता को किसी के रहमोकरम पर नहीं छोड़ कर हमें अपना खुद का ब्लॉग बना  सटीक तरीके से अपनी बात रखने का हुनर पालना होगा.एक बात और कि पत्रकारिता को पेशन के साथ करें वहीं आजीविका के लिए कोई और धंधा करें

पी.आर. एजेंसियों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि टेलेंटेड और भ्रष्टाचारी दोनों तरह के लोग जब मिल जाते हैं तो देश का बंटाधार तय है.दुःख इस बात का भी है कि अब तो मीडिया में ही भ्रष्टाचार गया है.कलम के दम पर सत्य लिख कर कोई खुले आम अगर घूम रहा है तो ये उसकी साफ़ नीयत का कमाल ही है.पेज थ्री परम्परा के पोषक शुरू से बड़े अखबार ही रहे हैं और वैसे भी अब सब कुछ पूंजी का खेल हो गया है.जहां पहूंचकर मीडिया का भी एजेंडा बदलने लगता है

मीडिया,सरकार और जनता के बीच हमेशा मध्यस्थ रही है.मगर अब स्थितियां विलग है जहां मीडिया हाउस भी किसी उद्योग कंपनी की तरह मार्च के अंत में फायदे का बज़ट चाहते हैं.परिस्थितियाँ कुछ यूं भी बदली है कि सप्ताहभर में किए पचास स्ट्रिंग ओपरेशन में से अंत में पैतालीस तो मेनेज कर लिए जाते हैं और बाकी पांच जो मेनेज नहीं हो पाते उन्हें ब्रोडकास्ट कर या छापकर मीडिया हाउस सरोकार निभाने का दंभ भरते नज़र आते हैं.भूत-प्रेत को लफ्फाजी दिखा-सुनाकर कब तक रेटिंग बटोरते रहेंगे,अन्तोगत्वा मीडिया जगत को ये बात समझ भी गयी कि जनता का भरोसा ही उनकी असल रेटिंग तय करती है इसलिए रेटिंग के बटोरने के मायने और रास्ते यथासमय पर बदले भी हैं

(ये विचार राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ की राज्यस्तरीय कार्यशाला,चित्तौड़गढ़  में मुख्य वक्ता के तौर पर कहे )


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



माणिक,
वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.

उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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