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हमारी आधी दुनिया का सच बयान करता कविता संग्रह 'मरजानी' :-पुखराज जाँगिड़

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, सितंबर 25, 2011 | रविवार, सितंबर 25, 2011



अखिल भारतीय स्तर पर यह दौर स्त्री, दलित और आदिवासी रचनाकारों का, हाशिए की अस्मिताओं के सृजन-संदर्भों का है। वही आधुनिकता की पहली शर्त ही वंचितों को लोकतांत्रिक अधिकार हैफिर चाहे वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था हो या सामंती मानसिकता। हिंदी में स्त्रीवादी चेतना से संपन्न कविताओं की एक लंबी परंपरा रही है और उसके तेवर में काफी बदलाव आए है। इसमें वर्तिका नंदा का 68 कविताओं का संग्रह मरजानी एक नया हस्तक्षेप है। यह मीडिया से संबद्ध स्त्री की अनथक यात्राओं के भूगोल का, अपने समय व समाज से की गई विविध रचनात्मक मुटभेड़ों का सृजनधर्मा संवाद है। पत्रकारी जीवन के दृश्यबंध इसकी एक खास विशेषता है। वर्तिका नंदा मूलतः प्रयोगधर्मी मीडिया शिक्षण के लिए जानी जाती है।टेलीविजन और अपराध पत्रकारिता(2007) व टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग(2010) उनकी अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण किताबें है। ऐसे में वर्तिका के लिए लिए कविता करना अपने अस्तित्त्व की थाह लेने, उसे समझने, थामने और सहेजने का है जिसे उन्होंने साँसों का संकल्प यारास्ते का दीया कहा है। इस संकल्प की शुरूआत 22 साल पहले स्कूली दिनों में छपे उनके पहले कविता-संग्रह मधुर दस्तक (1989, फिरोजपुर) से हुई।
 मरजानी शब्द का रचनात्मक उपयोग कृष्णा सोबती ने वर्षों पहले मित्रो मरजानी (उपन्यास) में किया तो अब पद्य में वर्तिका नंदा ने। संग्रह का आवरण गीत चतुर्वेदी का है और वह मरजानी के अंतरंग परिवेशऔर उसके रचनात्मक फैलाव को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। मनुष्य की इच्छाएं इच्छाएं मरकर भी नहीं मरती इसलिए मरजानी भी नहीं मरती।

पाश की कविता को आगे बढाते हुए कवयित्री लिखती है कि

सबसे ताकतवर होता है/ 
सपनों का खिलमिल-मिल जाना...कवच हो जाना/ 
हथेलियों की लकीरों को/ 
आलिंगन में भर लेना कुछ इस तरह कि/ 
सपने बस अपने ही हो जाएँ/ 
अपनों से भी ज्यादा अपने हो जाएँ। 
(पृ.-12)

गुल्लकपेड़सपनेसालबत्तीटीचरसंतरी नमकपारे,कसाईगिरीकवितागिरी, ‘पैदाइशलेन-देन और कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 हमारे दिन-प्रतिदिन की घटनाओं की तो अंतसमनसच’, ‘सपनेप्रेम और हसरतें स्त्री-मनोभावों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कविताएं है। ये नए जमाने की समस्‍याओं पर लिखी नए नजरिए की कविताएं है। इन कविताओं की जमीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों में निहित है और के उसी खाद-पानी से सींची गई है, इसलिए पाठक को आत्मीयतापूर्वक अपने साथ जोड़ लेती है। स्त्री-जीवन के विविध पहलुओं को अभिव्‍यक्त करने का कविताई सामर्थ्‍य और बौद्घिकता प्रखरता संग्रह को विशिष्ट बनाती है। टीवी एंकर और वो भी तुम कविता बताती है कि मीडिया में एक स्त्री का संस्कारी जमीन की पैदाइश होना और सामाजिक सरोकारों पर काम करना सबसे बड़ी अयोग्यता है। क्योंकि ये खबरों की दुनिया है/यहाँ जो बिकता है, वही दिखता है/और अब टीवी पर गाँव नहीं बिकता।

वर्तिका नंदा ने मरजानी के माध्यम से स्त्री-पुरूष संबंधों के मनोविज्ञान और परिवार जैसी सामाजिक संस्थाओं की निष्ठा और निष्पक्षता की बात की है। स्त्री का यथार्थ कभी भी इकहरा नहीं होता, वह पुरूष से जुड़कर पुरा होता है। वह तकिए में समाई साँसों की छुअनको रचनात्मक आयाम देती है। स्त्री-यथार्थ की पुख्ता जमीन पर खड़ी है ये कविताएं आने वाली पीढी से तमाम तरह की मानसिक जकड़नों से मुक्त होने की अपेक्षा करती है। ये देहरी में कैद शिक्षा का विरोध करती है, सहानुभूति या दया नहीं बराबरी चाहती स्त्री-विमर्श व स्त्री-प्रकृति की कविताएं की कविताएं है ये निरंतर अकेले व अजनबी होते प्रेमविहीन समाज में स्त्री की इच्छा-अनिच्छा, सहज-असहज, सही-गलत, स्थिति-परिस्थिति, आशा-निराशा, हास-परिहास, बौद्धिकता-भावुकता, संवेदनशीलता-संवेदनहीनता को रेखांकित करती बिंबात्मक कविताए है और स्त्री-जीवन के तनाव और बिखराव को चिह्नित करती है। भविष्य की चिंता इसका मुख्य सरोकार है। यही हमारी आधी दुनिया का सच है।

मरजानी (कविता-संग्रह) - वर्तिका नंदा, पहला संस्करण-2011, पृष्ठ-120, मूल्य-200 रूपए, प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., दरियागंज, नई दिल्ली-02.

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