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दलित विमर्श:डॉ. केदार सिंह का एक विश्लेषण

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, सितंबर 21, 2011 | बुधवार, सितंबर 21, 2011


हिन्दी साहित्य में आज तक अनेक आन्दोलन हुए हैं। इन आन्दोलनों का उद्देश्य विकास एवं बदलाव रहा है। इनमें से ज्यादातर आन्दोलन अल्पावधि में ही समाज को प्रभावित करके या स्वयं प्रभावहीन होकर समाप्त हो चुके हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य में दलितों के सांस्कृतिक, सामाजिक, न्याय, पुनरुत्थान, शिक्षा जैसे विभिन्न उद्देश्यों को आत्मसात करके एक आन्दोलन आरंभ हुआ। जिसे ’दलित-विमर्श’ नाम दिया गया। यह आन्दोलन अपने कथ्य को लेकर जितना आधुनिक है, अपने समय में जितना चर्चित है, उससे कहीं अधिक विवादास्पद है।

’दलित’ शब्द का अर्थ है - दबाया हुआ, कुचला हुआ। समाज में जो वर्ग बहुत दिनों से सताया हुआ है वह दलित है। लेकिन ‘दलित’ शब्द का प्रयोग आज की तारीख में हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत परम्परागत रूप से शूद्र माने जाने वाले वर्गों के लिए रूढ़ हो गया है। दलित वर्ग के अन्तर्गत वे जातियाँ आती हैं जो निम्न स्तर की होती हैं यथा - शूद्र, चाण्डाल, मेहतर, हरिजन आदिवासी आदि। किन्तु यदि ‘दलित’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाय तो इसे एक वर्गीय शब्द माना जाना चाहिए जो न केवल अछूतों को ही अपने भीतर समेटे, बल्कि अभावग्रस्त शोषित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी वर्गों तथा जातियों को, जिनकी आर्थिक स्थिति खराब हो और अनेक प्रकार के अभावों से जूझ रहे हों। जैसे खेतिहर-मजदूर, बन्धुआ-मजदूर, भूमिहीन-गरीब, बेरोजगार, शोषित महिलाएँ तथा अनाथ बच्चे आदि सभी, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म के हों, वर्गीय दृष्टि से ’दलित’ हैं।

प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर हिन्दी साहित्य के उन्नीसवीं सदी के अंत तक साहित्यिक श्रेष्ठता का आधार कभी जाति नहीं रही। श्रेष्ठ साहित्य के सृजन में विभिन्न जातियों के लोग संलग्न थे। लेखक के लिए दलित या सवर्ण होने की अनिवार्यता नहीं थी। वाल्मीकि, वेद व्यास, सिद्ध और नाथ तथा ज्ञान मार्ग के एक या दो को छोड़कर सारे संत भक्त कविगण दलित जाति के थे। किन्तु दलित होने के कारण न उन्हें मान, सम्मान मिला, और न दलित होने के कारण उन्हें हेय दृष्टि से देखा गया और न उन्होंने अपनी रचनाओं को दलित-जाति का प्रतिनिधित्व करनेवाला साहित्य के रूप में घोषित करने का फतवा जारी किया। प्राचीन काल से ही साहित्य की श्रेष्ठता का मापदंड गुणात्मक साहित्यिक आधार रहा है, न कि जातिगत आधार। श्रेष्ठ साहित्य के कारण हीं उनकी पहचान श्रेष्ठ साहित्यकारों में होती थीं।

राजनीति के आगे मशाल बनकर रौशन करनेवाले साहित्य को बींसवीं सदी से राजनीति के पीछे चलने वाला पिछलग्गू बना दिया गया। अब प्रत्येक राजनीतिज्ञों के अपने-अपने साहित्यकार होते हैं, जो साहित्यिक सृजन कम, दल विशेष के सिद्धांतों एवं आदर्शों के प्रचार के साथ मंत्री जी का गुणगान ज्यादा करते हैं। ’दलित साहित्य’ या ’दलित विमर्श’ का प्रादुर्भाव इसी साहित्यिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हुआ और सत्ता सुख के लिए इसका उपयोग किया जाने लगा।

आदिकाल में कर्म के आधार पर हिन्दू समाज का विभाजन किया गया था। जहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं होता था पर जबसे जाति  का आधार जन्म-जात हो गया यानि जन्म के आधार पर समाज में जाति का विभाजन होने लगा, तब से एक वर्ण विशेष को आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक रूप से त्रासदी पूर्ण जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। त्रासदीपूर्ण जीवन जीने वाली जातियाँ हीं आज ’दलित’ हैं। इसके विपरित सत्ता सुख एवं अधिकारों से वंचित आज तमाम लोग अपने को ’दलित’ मानते हैं। आज वोट की राजनीति इस कदर हावी है कि सत्ता-सुख के लिए राजनेताओं ने मनुष्य को जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के अलग-अलग खेमों में विभक्त कर दिया है और जाति, धर्म, सम्प्रदाय को बाँधकर रखने वाले साहित्य को भी खंड-खंड कर दिया गया। इतना ही नहीं गैर दलित लेखक, जिन्होंने कभी इस परम्परा की शुरुआत की थी, प्रेमचन्द, निराला, प्रसाद, दिनकर से लेकर जगदीश चन्द्र, मदन दीक्षित आदि तक को खारिज कर यह कहा जा रहा है कि किसी दलित के द्वारा भोगे गए कटु यथार्थ का यथा तथ्य वर्णन, जिस साहित्य में हो, वही दलित-साहित्य है।

दलित-साहित्य या दलित-विमर्श के संबंध में आज-कल यह प्रश्न बार-बार उठाया जा रहा है कि क्या दलित-साहित्य केवल दलित ही लिख सकते हैं ? इस सन्दर्भ में भी स्वानुभूति और सहानुभूति को लेकर अपना-अपना तर्क दिया जा रहा है। स्वानुभूति को लेकर चलने वालों में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, डा. ए. एन. सिंह, डा. सोहनपाल सुमनाक्षर, कँवल भारती, तथा डा. धर्मवीर, श्यौराज सिंह ’बेचैन’ आदि साहित्यकारों का मानना है कि दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा गया साहित्य ही दलित-साहित्य है। सहानुभूति पक्ष को लेकर चलने वाले लोग गैर दलित हैं जो दलितों के विषय में सहानुभूतिपूर्वक लिखे गए साहित्य को भी दलित-साहित्य मानते हैं। इस वर्ग में नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, राजेन्द्र यादव, रत्नकुमार सांभरिया, मनोहर श्याम जोशी, प्रो. निर्मला जैन आदि हैं।

इस सन्दर्भ में राजेन्द्र यादव का कहना है कि ’दलित लेखकों को इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए कि गैर दलित का लेखन दलित साहित्य हो ही नहीं सकता। इससे दलित लेखकों की बड़ी उर्जा इसी बात के खंडन में खर्च हो जाती है। मुझे लगता है कि दलित साहित्यकार तर्कों से कभी इस बात को सिद्ध नहीं कर पायेंगे कि किसका लेखन सच्चा दलित साहित्य है। इसका जवाब वे अच्छी, सशक्त और जिन्दा रचनाएँ लिखकर ही दे सकते हैं जैसा कि óी लेखन कर रहा है। वैसे भी साहित्य एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ हर एक को अपनी बात कहने और लिखने की आजादी है। जो गैर दलित लेखक दलित साहित्य लिख रहे हैं उन्हें दलित न तो रोक पाएंगे न ही रोकना चाहिए। उन्हें वर्णवाद के कटघरे में खड़ा करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि अन्ततः बात इस पर आ जाएगी कि आपकी अपनी उपलब्धियाँ क्या हैं।’1 इसी तरह नामवर जी ने भी लिखा है कि - ’गैर-दलित, दलित-साहित्य लिखते हैं तो उसपर कोई रोकथाम तो की नहीं जा सकती।’2

इस तरह दलितों के विरोध करने पर यह भी प्रश्न उठता है कि भोगे हुए यथार्थ का लेखक ही सच्चा लेखक हो सकता है तब मनुष्येत्तर विषयों पर कौन लिखेगा ? और तब दलित óी-पुरुषों का भी अलग-अलग साहित्य होगा। मेरे विचार से साहित्यकार को सहानुभूति एवं स्वानुभूति के विवाद में नहीं पड़ना चाहिए जो गुणात्मक यथार्थ साहित्य का सृजन करेगा, जो दलितों, शोषितों की पीड़ा को जितनी गहराई से अभिव्यक्ति देगा वही महान दलित साहित्यकार होगा। यहां दलितों को आरक्षण की दीवार नहीं खड़ी करनी चाहिए क्योंकि पराई पीड़ा को जब तक कोई अपनी पीड़ा नहीं समझेगा तब तक वह यथार्थ साहित्य का सृजन कर ही नहीं सकता है। साहित्य का सृजन जाति, धर्म, लिंग, वर्ण के परे होता है।

ऐसे तो दलित-साहित्य की शुरुआत संत परम्परा के कवियों द्वारा कर दी गई थी। बाद में आधुनिक काल में प्रेमचन्द, निराला, प्रसाद, नागार्जुन आदि गैर-दलित लेखकों ने इस परम्परा को समृद्ध किया। किन्तु दलित-लेखक डा. अम्बेदकर की विचारधारा को अपना मूल óोत मानते हैं। महाराष्ट्र में 1920 के बाद दलित आन्दोलन के सूत्रधार बाबा साहब की बातें ’मूक नायक’ पत्र के माध्यम से लोगों तक पहुँचने लगी थीं। बाबा साहब भीम राव अम्बेदकर का विचार था कि भारत में सारी सामाजिक गड़बड़ी की जड़ वर्ण व्यवस्था है। उसे समाप्त किए बिना न तो जातिवाद समाप्त किया जा सकता है और न छुआछूत। यह तभी संभव होगा जब दलित वर्ग शिक्षित, संगठित और स्वाभिमानी बनेंगे। सर्वप्रथम मराठी भाषी क्षेत्र के लोग डा. अम्बेदकर की बातों से प्रभावित हुए। वहीं से लोगों ने संगठित होकर आन्दोलन की शुरुआत की। यही आन्दोलन धीरे-धीरे जनसंघर्ष का रूप ले लिया। बाद में उन्हीं जनसंघर्षो से दलित-साहित्य या दलित-विमर्श की परम्परा विकसित हुई।

दलित चिंतकों का मानना है कि मराठी भाषा एवं साहित्य में दलित विमर्श की शुरुआत एक सांस्कृतिक विस्फोट के रूप में हुआ। डा॰ अम्बेदकर ने इस संबंध में मार्क्सवादियों को भी प्रभावित किया। उन्होंने भी स्वीकार किया कि जहाँ तक दबे, कुचले, वंचित, शोषित लोगों के अधिकारों की लड़ाई का प्रश्न है, वहाँ हमदोनों को एक-दूसरे से दूर नहीं जाना चाहिए। मराठी के बाद अन्य भारतीय भाषाओं में यथा तमिल, तेलुगु, मलयालम, पंजाबी आदि भाषाओं में भी धीरे-धीरे दलित विमर्श का प्रभाव विकसित हुआ। हिन्दी में दलित साहित्य का प्रवेश काफी विलम्ब से 1980 में मराठी दलित कथाकार दयापवार की आत्मकथा ’बलूत’ का हिन्दी अनुवाद, ‘अछूत’ के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड प्राप्त होने के पश्चात् लोगों में इस विषय के प्रति उत्सुकता जगी। 1981 में ग्वालियर में इस विषय पर एक सेमिनार भी हुआ जिसमें हिन्दी एवं मराठी भाषा के चिंतकों एवं साहित्यकारों ने भाग लिया। यहाँ भी हिन्दी के लिए दलित-विमर्श की दिशा तय की गई।

वस्तुतः भारतीय मार्क्सवादियों ने साम्यवादी आन्दोलन के द्वारा वर्ग संघर्ष को आर्थिक सतह तक ही सीमित रखा। इस कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। इस स्थिति से अवगत डा. अम्बेदकर ने यह सोचा कि वर्ग संघर्ष द्वारा जाति भेद नहीं मिट पाएगा और जातिगत भेद-भाव समाप्त हुए बिना अछूतों का उद्धार संभव नहीं है। इसलिए आर्थिक तत्व को स्वीकार करते हुए डा. अंबेदकर ने वर्ण संघर्ष पर ही बल दिया और दलित मुक्ति का आन्दोलन जारी रखा। इस वर्ण संघर्ष की जिम्मेदारी उन्होंने दलितों को सौंप दी। इसी जिम्मेदारी को लेकर दलित-विमर्श या दलित साहित्य चल रहा है।

जैसा कि मैनेजर पांडेय ने कहा है - ’आजकल जो दलित साहित्य विकसित हो रहा है उसमें आक्रोश अधिक है जबकि प्रायः लोगों की आदत साहित्य में करुणा और सहानुभूति खोजने की रही है। आक्रोश में प्रायः आवाज कर्कश हो जाती है। इसलिए जो लोग साहित्य में सधे हुए स्वर और सुरीली आवाज की खोज करते हैं, उन्हें दलित साहित्य से निराशा हाथ लगती है।’3 अतः आवश्यकता है दलित-विमर्श या दलित-साहित्य की - एक समन्वयपूर्ण उचित दिशा की, जिससे साहित्य एवं समाज दोनों का कल्याण होगा। 
संदर्भ संकेत:-
1. ‘युद्धरत आम आदमी’ (दलित चेतना सोच विशेषांक) 1996, पृ0 203
2. ‘हंस’ (दलित विशेषांक), साक्षात्कार नामवर सिंह, अगस्त 2004, पृ0 194
3. ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’, मैनेजर पाण्डेय


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ0 केदार सिंह
स्नातकोत्तर, हिन्दी विभाग
विनोबा भावे विश्वविद्यालय,
हजारीबाग (झारखण्ड)
मो0: 09431797335
kedarsngh137@gmail.com
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