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''आत्मकेन्द्रित अध्यापक कभी भी छात्रों में स्वस्थ प्रतियोगिता को प्रोत्साहन नहीं दे सकता''-डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, सितंबर 26, 2011 | सोमवार, सितंबर 26, 2011


निरन्तर बढ़ती जाती आत्मकेन्द्रिता व स्वार्थपरता की प्रवृत्ति अब हमारे समाज के अन्य क्षेत्रों की भाँति शिक्षा के क्षेत्र को भी प्रभावित करने लगी है। समूचे राष्ट्र, पूरे समाज अथवा समूचे शिक्षा-तंत्र की प्रगति व प्रभावोत्पादकता को लक्ष्य मानने के बजाय अब शिक्षा के क्षेत्र में भी अधिकांश लोग सफलता का अर्थ छात्र विशेष या संस्था विशेष की सफलता समझने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। किसी परीक्षा में कोई उच्च स्थान प्राप्त करना अथवा किसी व्यवसाय विशेष के उच्च अध्ययन हेतु उसे कहीं प्रवेश दिलवा देना ही जैसे अधिकांश अभिभावकों का एकमात्र लक्ष्य होता जा रहा है। संस्था-प्रधान  भी समाज अथवा राष्ट्र के निर्माण या प्रगति में उनकी संस्था के समूचे योगदान को रेखांकित करने के बजाय अब केवल परीक्षा परिणामों के प्रतिशत अथवा योग्यता सूची में दर्ज़ होने वाले उनके छात्रों के नामों को ही उनकी सर्वोच्च उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करने में कोई संकोच अनुभव नहीं करते। 

जो व्यक्ति इस मूलभूत तथ्य की अनदेखी करता है कि कोई छात्र, कक्षा अथवा शिक्षण संस्था एक विशाल राष्ट्र या उसके शिक्षा-तंत्र का केवल एक छोटा सा हिस्सा है वह हमारे व्यापक जनतांत्रिक उद्देश्यों को भूल कर किसी न किसी रूप में उस तंत्र को पुष्ट करने की दिशा में बढ़ने लगता है जो अधिकारप्राप्त व्यक्ति को अधिकारविहीन का शोषण करने की छूट देता है। राष्ट्र और तंत्र की जगह व्यक्ति की चिन्ता करने वाले अभिभावक या अध्यापक का व्यवहार बहुत कुछ उस उद्योगपति जैसा होगा जो तात्कालिक मुनाफ़े के लिए हमारे पर्यावरण को नष्ट करने और इस तरह जन स्वास्थ्य को प्रभावित करने में नहीं हिचकिचाता।

शिक्षा-तंत्र का किसी व्यापक सामाजिक उद्देश्य से विचलन  उसमें कई प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न करके उसे धीरे-धीरे भीतर से खोखला व निरर्थक बना देता है। अभिभावकों या अध्यापकों की आत्मकेन्द्रिता में उन अनेक अनाचारों के बीज ढूँढे जा सकते हैं जिन्होंने धीरे-धीरे हमारी शिक्षा प्रणाली को दूषित किया है।    आत्मकेन्द्रित अध्यापक कभी भी छात्रों में स्वस्थ प्रतियोगिता को प्रोत्साहन नहीं दे सकता। संस्था के सभी छात्रों की प्रगति को समान रूप से अपना लक्ष्य नहीं मानने वाला अध्यापक अपने ज्ञान के श्रेष्ठतम भाग की रेवड़ी को केवल अपने संबंधियों, मित्रों व परिचितों के लिए बचाकर रखना चाहेगा। सार्वजनिक कल्याण के लिए निर्मित किसी तंत्र का उपयोग भी आत्मकेन्द्रित व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति हेतु करने लगता है। ट्यूशन से संबंधित लगभग सभी बुराइयों के मूल में अध्यापक का स्वार्थ और उसकी  आत्मकेन्द्रितता रहती है। वस्तुतः ट्यूशन करने वाले अध्यापक के मन में एक सूदखोर शाइलाॅक आ बैठता है जो अपने छात्र से ट्यूशन की फीस वसूल किए बिना उसे अपनी विद्या देने को तैयार नहीं होता। उसका हृदय उन तमाम छात्रों के प्रति कठोर हो जाता है जो उसकी फीस देने में असमर्थ हैं।

ट्यूशन करने वाले अध्यापक बेहतर पुस्तकें और परीक्षोपयोगी बेहतर सामग्री केवल उनके घर पर पढ़ने वाले छात्रों के लिए सुरक्षित रखते हैं। कुछ अध्यापक तो इन छात्रों केे लिए घर पर छोटी मोटी प्रयोगशालाएं तक बना लेते हैं। उनके साइक्लोस्टाइल किए नोट्स केवल उनके चहेते छात्रों को उपलब्ध होते हैं। उनकी दृष्टि केवल परीक्षा परिणामों पर केन्द्रित हो जाती है और वे अपनी अधिकांश शक्तियाँ प्रत्याशित प्रश्नों के प्रभावोत्पादक उत्तर तैयार करने में व्यय करने लगते हैं। ये अध्यापक अपने छात्रों के अतिरिक्त वाचन, पाठ्येतर गतिविधियों और उनमें सतत् ज्ञान प्राप्ति की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने के बजाय उनकी पाठ्य-पुस्तकों व उनके परीक्षा-परिणामों को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देने लगते हैं। आत्मकेन्द्रित अध्यापक इस तरह किन्हीं समाजोपयोगी अथवा राष्ट्रोपयोगी नागरिकों का विकास करने के बजाय अनजाने ही उन आत्मकेन्द्रित लोगों की पौध तैयार करने के काम में जुट जाते हैं जिनका लक्ष्य समाज अथवा राष्ट्र की कीमत  पर भी किसी तरह अपना उल्लू सीधा करना होता है।

    व्यापक उद्देश्यों की जगह केवल अपनी कक्षा पर केन्द्रित दृष्टि और भी कई तरह की विकृतियों को जन्म देती है। किसी एक कक्षा अथवा उसके परिणामों को ही सर्वश्रेष्ठ ठहराने के प्रयत्न में लगा अध्यापक कभी-कभी उसकी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने की कोशिश भी करने लगता है। जिस अध्यापक को केवल अपनी कक्षा की छवि और परीक्षा परिणामों की चिन्ता रहती है वह दूसरों की आलोचना को भी स्वस्थ भाव से स्वीकार नहीं कर सकता। आलोचक को उसकी आलोचना के लिए धन्यवाद सिर्फ वही व्यक्ति दे सकता है जिसे इनाम पाने से अधिक फि़क्र इनाम का अधिकारी होने की रहती है। केवल पुरस्कार की चिन्ता करने वाले अध्यापक का उद्देश्य शिक्षा की गुणावत्ता में वृद्धि करना नहीं रह जाता। 

लोगों की दृष्टि इसी तरह जब केवल अपनी संस्था पर केन्द्रित हो जाती है तब वे उस संस्था को वास्तविक रूप से उपयोगी व प्रभावशील बनाए बिना ही उसके लिए प्रतिष्ठा व पुरस्कार अर्जित करने के प्रयास में लग जाते हैं। ऐसी संस्थाओं के प्रधान अक्सर वास्तविक उपलब्धियों की जगह केवल आँकड़ों के प्रदर्शन में अपनी शक्ति और समय खर्च करते हैं। अपनी संस्थाओं की ख़ामियों और समस्याओं को खुले तौर पर सामने रखने  और उनका हल खोजने के बजाय ये संस्था-प्रधान उनके उच्चाधिकारियों द्वारा निरीक्षण के समय अपनी आंतरिक अव्यवस्थाओं व कुरूपताओं को किसी फूलदार चद्दर से ढकने की कोशिश करते हैं। ऐसी संस्थाएं प्रतिष्ठादायक उपलब्धियों से अधिक प्रतिष्ठा के पीछे भागती हैं और काम से अधिक नाम की इच्छुक हो जाती हंै। इनके प्रधान अपने उच्चाधिकारियों को ख़ुश करने और उनकी रिपोर्टों में अपना व अपनी संस्था का गुणगान करवाने के लिए हर संभव हथकंडे का उपयोग जायज मानते हैं।

पहले हमारे समाज में लोग व्यक्ति की तुलना में तंत्र को महत्त्व देते थे और तंत्र के स्वास्थ्य व उसकी शक्ति को बनाए रखने के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की कु़र्बानी में भी नहीं हिचकते थे। तंत्र कमजोर न हो इसकी ख़ातिर वे अपने ही लोगों के उस तंत्र द्वारा दंडित होने की पीड़ा को भी अपना नैतिक दायित्व मान कर सहन कर लेते थे। किन्तु अब लोगों के झुकाव की दिशा में बदलाव आ गया है। आज यदि कोई अध्यापक किसी छात्र को दंडित करता है तो अभिभावक को पहला संदेह छात्र के बजाय अध्यापक की नीयत पर होता है। बहुत कम ही अभिभावक ऐसे होंगे जो अपने पुत्र या पुत्री को परीक्षा में प्रथम स्थान पर लाने के लिए उस छात्र को दूसरे स्थान पर धकेल देने में बहुत आगा-पीछा करें जो वास्तविक रूप में प्रथम स्थान का अधिकारी है। इस प्रकार की नैतिक गिरावट हमारी शिक्षा को उसके परम्परागत मध्यवर्गीय उद्देश्यों से भी दूर ले जाने लगी है। 

   एक  दोषयुक्त  व  अपूर्ण परीक्षा प्रणाली में अपने छात्र को सर्वोच्च अंक दिलवाने भर की लालसा रखने वाला अध्यापक या संस्था-प्रधान शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों के लिए कदापि कार्य नहीं कर रहा है। इसी तरह अपने बच्चे को अधिकतम अंक दिलवाने, अमुक विषय पढ़वाने अथवा किसी विशिष्ट संस्था या विशिष्ट व्यवसाय में  प्रवेश दिलवाने को ही अपना चरम लक्ष्य समझने वाला अभिभावक भी हमारी वर्तमान स्थिति पर संपूर्णता से विचार न कर केवल एक भ्रम में जीना चाहता है। हम यह न भूलें कि व्यक्ति का स्वास्थ्य भी अंततः एक समूचे तंत्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। शिक्षकों व अभिभावकों को इसीलिए अपने प्रेम का दायरा केवल अपनी संस्था अथवा अपने घर-परिवार तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। प्रतिभा आखिर राष्ट्रीय संपत्ति है और हमें हर जगह उसके प्रस्फुटन की संभावना पर विचार करना होगा। आखि़र आज इस बात का क्या महत्त्व है कि गांधी या रवीन्द्रनाथ या रमन या रामानुजन किस परिवार में पैदा हुए या किस संस्था में पढ़े ? हर व्यक्ति अंततः समाज का ही एक अंग है और हर प्रतिभाशाली छात्र अंततः राष्ट्र की संपत्ति है। समाज या राष्ट्र के व्यापक हितों को भुला कर व्यक्ति का सही मायने में सफल हो पाना इसीलिए कदापि संभव नहीं है।  


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: सितम्बर, 1993 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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