वीरेन डंगवाल, हेमंत कुकरेती औए उस्मान खान का कविता पाठ - अपनी माटी

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गुरुवार, सितंबर 22, 2011

वीरेन डंगवाल, हेमंत कुकरेती औए उस्मान खान का कविता पाठ


उस्मान खान

जैसे कोई कहे - प्यार 
तो किनारे पड़ी एक नाव में उतरी शाम और 
जंगली पफूलों का गुच्छा तोहप़फे में 
उदास रतजगों के मोड़ पर 
अकेला खड़ा नीम 

जैसे कोई कहे - घर 
तो सिलाई मशीन की घड़-घड़ 
डम्मर लगे तीर 
दांत काटे सिक्के 
रोज़गार कार्यालय के सामने खड़ा खजेला कुत्ता एक


जैसे कोई कहे - देश 
तो श्मशान में एक ईमली का पेड़ 
जिस्म से जान खेंचता चाँद 
घर लौटी औरतें 
और घर नहीं लौटी औरतें 
जो कहा गया था 
सारे जहाँ से अच्छा’ 
उसके अलावा भी बहुत कुछ 
एक साथ कौंध्ता है बहुत कुछ 
हालाँकि
पर्यायवाची नहीं
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हेमन्त कुकरेती

मैं दुनिया का नागरिक हूं 
यह देश मेरा निवास है 

मुझमें पराजय का क्रोध है 
और लड़ने की हमेशा बची इच्छा 
जब हम इतने अलग हैं
तो प्रेम कैसा
जब एक नहीं हैं तो किसका 
यह देश और इसका प्रेम
जो ऐसे प्रेम के नाम पर दी जाती है 
मैं उस यातना के खिलाफ हूं 
मैं जीवित हूं कि सोचता भी हूं 
दूसरे के समान जीवन 
जीने के बारे में।
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वीरेन डंगवाल

कुछ कद्दू चमकाए मैंने 
कुछ रास्तों को गुलज़ार किया 
कुछ कविता-टविता लिख दी तो 
हफ़्ते भर ख़ुद को प्यार किया


अब हुई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ

हाँ जीं हाँ वही कनफटा हूँ, हेठा हूँ 
टेलीफ़ोन की बग़ल में लेटा हूँ 
रोता हूँ धोता हूँ रोता-रोता धोता हूँ 
तुम्हारे कपड़ों से ख़ून के निशाँ धोता हूँ


जो होना था वही सब हुवाँ-हुवाँ 
अलबत्ता उधर गहरा खड्ड था इधर सूखा कुआँ 
हरदोई मे जीन्स पहनी बेटी को देख 
प्रमुदित हुई कमला बुआ


तब रमीज़ कुरैशी का हाल ये था 
कि बम फोड़ा जेल गया 
वियतनाम विजय की ख़ुशी में 
कचहरी पर अकेले ही नारे लगाए 
चाय की दुकान खोली 
जनता पार्टी में गया वहाँ भी भूखा मरा 
बिलाया जाने कहॉ 
उसके कई साथी इन दिनों टीवी पर चमकते हैं 
मगर दिल हमारे उसी के लिए सुलगते हैं


हाँ जीं कामरेड कज्जी मज़े में हैं 
पहनने लगे है इधर अच्छी काट के कपडे 
राजा और प्रजा दोनों की भाषा जानते हैं 
और दोनों का ही प्रयोग करते हैं अवसरानुसार 
काल और स्थान के साथ उनके संकलन त्रय के दो उदहारण

उनकी ही भाषा में :

" रहे कोई तलब कोई तिश्नगी बाकी 
बढ़ा के हाथ दे दो बूँद भर हमे साकी
"मजे का बखत है तो इसमे हैरानी क्या है 
हमें भी कल्लैन द्यो मज्जा परेसानी क्या है "
  
अनिद्रा की रेत पर तड़ पड़ तड़पती रात 
रह गई है रह गई है अभी कहने से

सबसे ज़रूरी बात।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

पुखराज जाँगिड़ 
शोधार्थीभारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
 नई दिल्ली-67.  ईमेल-pukhraj.jnu@gmail.com
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