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'' देशवासी के मन में एक भारतीय भाषा की कल्पना और उसके प्रति आत्मीय प्रेम का अभाव है''-डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 13, 2011 | मंगलवार, सितंबर 13, 2011


(हिंदी दिवस पर विशेष )
भारत की प्रगति के लिए जिन कुछ समस्याओं का तत्काल हल जरूरी है और फिर भी जिनके बारे में हम अब तक एक अक्षम्य उपेक्षा बरत रहे हैं उनमें एक प्रमुख समस्या किसी ऐसी एक भाषा के समुचित विकास की है जिसमें अभिव्यक्त विचार को भारत के किसी भी राज्य के सभी शिक्षित लोग समझ लें, जिसके किसी प्रकाशन को किसी क्षेत्र-विशेष या भाषा- विशेष के प्रकाशन के रूप में नही बल्कि सिर्फ भारतीय प्रकाशन के रूप में देखा जाए, जो भाषा भारत की हर शिक्षण संस्था में शिक्षा का माध्यम हो और जिसे हर भारतीय अपनी राष्ट्रभाषा समझ प्रेम करता हो। राष्ट्रीय एक्य को कोई भी कल्पना ऐसी किसी भाषा के अभाव में कर पाना कितना कठिन है इसे हर उस व्यक्ति द्वारा सहज ही समझा जा सकता है जो मानवीय संपर्क में भाषा के महत्त्व से भलीभांति परिचित है।

सरकारी घोषणाओं और औपचारिकताओं की बात दरकिनार, हमारे हर देशवासी के मन में ऐसी किसी एक भारतीय भाषा की कल्पना और उसके प्रति आत्मीय प्रेम का अभाव इस देश के अब भी कई टुकड़ों में बँटे होने का बहुत बड़ा कारण और इसके विकास के मार्ग में बहुत बड़ी रुकावट है। इसके परिणामस्वरूप भारत के किसी लेखक या विचारक, राजनेता या विधिवेत्ता, वैज्ञानिक या दार्शनिक के सोच का लाभ केवल उसकी भाषा जानने वालों को मिल सकता है। उसकी भाषा से इतर अन्य कोई भी भाषा बोलने या समझने वाले सभी लोग अपने आप उस लाभ के दायरे से बाहर हो जाते हैं। किसी भारतीय विद्वान की रचनात्मक व बौद्धिक ऊर्जा का उपयोग भी इस तरह समूचे देश के वैचारिक-सांस्कृतिक निर्माण हेतु न होकर केवल उन लोगों की प्रगति तक सीमित रह जाता है, जो उस भाषा को भली भांति बोलने और समझने में समर्थ हैं।

प्रकट रूप से चाहे यह कहा जाए या न कहा जाए, भारतीय जनमानस ने यह बात अब भी जैसे स्वीकार कर रखी है कि हमारे यहां अखिल भारतीय संपर्क की भाषा यदि कोई है तो वह केवल अंग्रेज़ी है। जनसामान्य द्वारा इस प्रकार की मूक सहमति के बिना यह संभव नहीं कि दूरदर्शन पर सत्यजित रे की फिल्मों के सबटाइटल अंग्रेज़ी में दिए जाएं ,राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस अंग्रेज़ी में हो, क्रिकेट की कमेन्टरी अंग्रेज़ी में की जाए अथवा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उच्च शिक्षा संबंधी कार्यक्रम अंग्रेज़ी में ही प्रसारित हों। दूरदर्शन या आकाशवाणी पर इस तरह की चीज़ों के लिए हमारा कभी स्पेनिश या तमिल जैसी किसी भाषा के प्रयोग की कल्पना न कर पाना ही इस बात को प्रमाणित करने के  लिए  पर्याप्त है कि अखिल भारतीय संपर्क की भाषा के रूप में हमारे यहां मोटे तौर पर अब भी अंग्रेज़ी को ही सर्वाधिक स्वीकृति व मान्यता प्राप्त है।

     हम लोग इस बात से भी भलीभांति वाक़िफ़ हैं कि इस देश में अंग्रेज़ी समझ सकने और उसे बोल सकने वालों की संख्या बमुश्किल आधा प्रतिशत होगीं। इस देश के अमीरों और ग़रीबों, सुविधासंपन्नों और सुविधाविहीनों को एक दूसरे से अलग करने का काम अंग्रेज़ी जितनी ख़ूबसूरती से करती है उतनी ख़ूबसूरती से शायद कोई अन्य भाषा नहीं कर सकती। भारत की कोई क्षेत्रीय भाषा यदि लोगों को विभाजित करती है तो वह ऐसा केवल उनके भाषा भेद के आधार पर करती है, वर्ग भेद के आधार पर नहीं। किसी एक भाषा का प्रयोग करने वाले क्षेत्र के तमाम लोग अमीर-गरीब, बड़े-छोटे, शिक्षित-अशिक्षित ,दूसरे भाषा क्षेत्र के वैसे ही लोगों से तो अलग हो जाते हैं किन्तु अपने क्षेत्र के सभी वर्गाें के बीच भाषा का  यह सेतु फिर भी बना रहता है। इसके विपरीत अंग्रेज़ी हमारे यहां हर भाषा क्षेत्र के अधिक शिक्षित, अधिक सुविधासंपन्न और उच्चवर्गीय लोगों को उसी क्षेत्र के अशिक्षित, सुविधाविहीन और नीचे तबके के लोगांे से अलग कर देती है। अंग्रेज़ी हमारे यहां एक भाषा क्षेत्र के लोगों को अलग-अलग हिस्सों में बाँटने के साथ ही विभिन्न भाषा क्षेत्रों के उच्चवर्गीय लोगों को फिर से जोड़ने का काम भी करती है। इस तरह इस समूचे देश का वह हिस्सा जो वस्तुतः उसे अधिक सुन्दर बनाने और उसे ऊंचा उठा सकने की  सामर्थ्य रखता है उस वर्ग से ही दूर पड़ता है जिसे ऊँचा उठाने में उसकी सर्वाधिक सक्रिय भूमिका हो सकती है। यह किसी गाड़ी के इंजिन को ही उस गाड़ी से अलग कर देने जैसा है। हमारे राष्ट्र के लिए अंग्रेज़ी की इस विशिष्ट भूमिका को भलीभांति समझे बिना हम शायद कभी भी अंग्रेज़ी के सम्मोहन से मुक्त नहीं हो सकते। 

अंग्रेज़ी की मोहिनी भारतवासियों पर कुछ इस तरह पड़ी है कि वे उसके वास्तविक रूप को जैसे देख ही नहीं पाते। सच पूछा जाए तो अंग्रेज़ी हम भारतीयों के लिए जो कुछ बन गई है वह तो वह उसके अपने देशवासियों के लिए भी नहीं है। ब्रिटेन या अमरीका में तो वह विचारों के आदान प्रदान का एक माध्यम भर है जैसा कि सभी भाषाएं हुआ करती हैं- एक अदृश्य व पारदर्शी माध्यम जो अपने आप में कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं होता, क्योंकि भाषा में महत्त्वपूर्ण तो सामान्यतः वह होता है जिसे भाषा संप्रेषित करती है। ग़ौर से देखा जाए तो हमारे यहां अंग्रेज़ी केवल ऐसा एक पारदर्शी माध्यम होने के बजाय अपने आप में जैसे एक गुलदस्ता बन गई है। अंग्रेज़ी हमारे लिए महज़ भाषा न होकर जैसे एक डाइनर्स कार्ड है जिसे दिखाने मात्र से आप एक विशिष्ट उच्च वर्ग का अंग मान लिए जाते हैं और  जिसकी मदद से आप कुछ विशिष्ट सुविधाएं पाने के अधिकारी हो जाते हैं। 

अंग्रेज़ी का प्रयोग कर सकना हमारे यहां जैसे एक सरकस का करतब है जिसे थोड़ा बहुत सीख-दिखा कर भी लोगों की प्रशंसा अर्जित की जा सकती है। यदि अंग्रेज़ी को हमारे यहां वस्तुतः एक भाषा के रूप में ही देखा जाता हो तो कोई कारण नहीं कि रेपिडेक्स जैसी अवैज्ञानिक ढंग से अंग्रेज़ी सिखाने वाली पुस्तक की एक करोड़ से भी अधिक प्रतियां बिक जाएं  और बच्चों के मां बाप उनका दाख़िला किसी ‘‘इंगलिश मीडियम स्कूल‘‘ में हो जाने अथवा अपने मेहमानों को उनके मुंह से कोई अंग्रेज़ी नर्सरी राइम सुनवाने मात्र में गर्व व आत्मसंतोष अनुभव करने लगें। यह हमारे लिए सचमुच लज्जा व आत्मग्लानि की बात है कि विदेशी अंग्रेज़ी हमारे यहां अपने आप में एक विशिष्टता का प्रतीक बन गई है जबकि हमारे देश की किसी भी भाषा को विशिष्टता और उच्च सम्मान का यह दर्ज़ा कभी प्राप्त नहीं हो पाया।

   अंग्रेज़ी पर हम लोगों का आश्रित रहना पूर्णतः निरापद व सुरक्षापूर्ण भी नहीं है। भाषा वस्तुतः उतनी भोली भाली चीज नहीं है जितनी कि सामान्यतः लोग उसे मानते हैं। भाषा में लोगों की मानसिकता बदल डालने और उनके व्यक्तित्व व व्यवहार में अत्यन्त सूक्ष्म व जटिल तरीके से परिवर्तन लाने की अद्भुत क्षमता होती है। वेल्श मूल के हमारे ही  समय के एक अंग्रेज़ी के कवि आर.एस. टॉमस ने अंग्रेज़ी के संबंध में बड़ी पते की बात कही है। उनका कहना है कि अंग्रेज़ी भाषा से शब्द उधार लेने का अर्थ केवल शब्द लेना भर नहीं है। शब्द उधार लेने के साथ ही आप उससे जुड़ा अंग्रेज़ी विचार भी उधार ले लेते हैं और इससे  पूर्व कि आपको अपनी वास्तविक स्थिति का भान हो एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में आपका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। तब आप ऐसी एक अलग इकाई के रूप में जीवित नहीं  रह पाते जिसके लिए स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज कर पाना संभव हो। 
अंग्रेज़ी वैसे भी हमारे यहां लगा वह अप्राकृतिक पेड़ है जिसकी जड़ें इस देश के बाहर हैं। इसकी उपस्थिति हर उस भाषा वृक्ष के विकास में बाधक है जो जीवंत रूप से इसी देश की धरती से जुड़ा और इसी देश के जलवायु की उपज है। हम यह भी जानते हैं कि मात्र किताबों से भाषा सीखने वाला कभी उसके उच्चारण व प्रयोग को पूरी तरह नहीं सीख सकता। फिर भाषा में जिस तरह नए शब्द आते रहते हैं अथवा जिस तरह उसके शब्दों के अर्थ समय के साथ-साथ बदलते रहते हैं उससे किसी जीवंत भाषा पर संपूर्ण अधिकार का दावा उससे लगातार सम्पर्क बनाए रख सकने वाला व्यक्ति ही कर सकता है। इसीलिए अंग्रेज़ी पर हमारा आश्रित रहना आगे रह कर अपने लिए एक प्रकार की विकलांगता को निमंत्रण देने जैसा है। बहुत कोशिश करके हममें से अंग्रेज़ी पर उसके मूल प्रयोगकर्ताओं जैसा अधिकार प्राप्त कर लेने वाले व्यक्ति भी इन मूल प्रयोगकर्ताओं की नज़र में अधिक से अधिक उन विकलांगों जैसे रहेंगे जिन्होंने अपने संकल्प और अध्यवसाय द्वारा लगभग स्वस्थ व्यक्ति जैसी ही कार्यक्षमता हासिल कर ली है। 

अंग्रेज़ी का सूर्य वैसे भी इस देश में अब लगभग अस्त हो चला है। यदि इस बात में किसी को संदेह हो तो वह एक बार हमारे देश के उन हज़ारों स्कूलों और कॉलिजों का मुआइना कर आए जिनकी कक्षाओं में इस समय अंग्रेज़ी भाषा और उसका साहित्य पढ़ाया जा रहा है। जो अध्यापक पहले इन कक्षाओं में अंग्रेज़ी के अलावा अन्य किसी भाषा के प्रयोग को किसी सर्वस्वीकृत नैतिक नियम का उल्लंघन मानते थे वे ही अब उनमें से अधिकांश में धड़ल्ले से स्थानीय भाषा का प्रयोग करते मिलेंगे और उनके ऐसा करने का कारण भी उनके शिक्षण को उनके छात्रों के लिए अधिक बोधगम्य बनाना न होकर सामान्यतः इस उल्लंघन को स्वयं उनके लिए अधिक अनुकूल व सुविधापूर्ण पाना होगा। अब वह समय तो लौटकर आने वाला नहीं जबकि विश्वविद्यालयों और बड़े महाविद्यालयों में अंग्रेज़ी पढ़ने वालों को यदि सीधे किसी अंग्रेज़ से नहीं तो किसी अंग्रेज़ के शिष्यों या कम से कम उसके शिष्यों के शिष्यों से तो अंग्रेज़ी पढ़ने का अवसर मिल ही जाता था। और इसीलिए अंग्रेज़ी के नित्य परिवर्तनशील रूप से उनका बहुत कुछ सीधा सम्पर्क बना रह पाना संभव था। पर अब हमारे यहां शिक्षा की बदलती हुई परिस्थितियों में अंग्रेज़ी को शुद्ध रूप से बोलने और ठीक से समझ पाने वालों की संख्या लगातार कम ही होती जाएगी। इन बदलती परिस्थितियों में अंग्रेज़ी भाषा पुस्तक समिति (ई.एल.बी.एस.) द्वारा सस्ती पुस्तकें प्रकाशित करने, केन्द्रीय अंग्रेज़ी व विदेशी भाषा संस्थानों (सी.आई.ई.एफ.एल.) के प्रतिवर्ष अनेक अंग्रेज़ी अध्यापकों को प्रशिक्षित करने और केबल टी.वी. द्वारा बी.बी.सी. के कार्यक्रम घर-घर में दिखाए जाने के बावजूद इस बात की संभावना बहुत कम है कि अंग्रेज़ी का अस्ताचलगामी सूर्य फिर से कभी इस देश के आकाश में ऊंचा चढ़ पाएगा।

भाषा के मामले में इस देश के ऐक्य में दो ही प्रमुख बाधाएं हैं- एक तो अंग्रेज़ी और दूसरा हमारी प्रादेशिक भाषाओं के प्रति हमारा विशेष प्रेम। प्रादेशिक भाषा के प्रति हमारा विशेष अनुराग इसलिए स्वाभाविक है कि हम प्रादेशिक भाषा को ही अपनी मां के दूध के साथ पीते हैं, वही घनिष्ठतम रूप से हमारी स्थानीय संस्कृति और उसके साहित्य से जुड़ी रही है और उसी में हम अपने आपको सर्वाधिक सहज रूप से अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम पाते हैं। यह बात न केवल तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ के साथ बंगाली, गुजराती, मराठी, पंजाबी और असमिया जैसी भाषाओं के बारे में कही जाएगी, यह वस्तुतः राजस्थान, उत्तरप्रदेश और बिहार के उन हिन्दी भाषी लोगों पर भी बहुत कुछ लागू होगी जिनके घरों में पारम्परिक रूप से अब भी राजस्थानी, ब्रजभाषा, भोजपुरी या मैथिली बोली जा रही है। यह स्वाभाविक ही है कि हमारा सर्वाधिक प्रेम और हमारी सर्वाधिक भक्ति हमारी इस मातृभाषा के प्रति ही रहे।  पर यह भी सच है कि यदि हमें राष्ट्रभाषा के प्रश्न को गंभीरतापूर्वक हल करना है तो हमारी प्रादेशिक भाषा के प्रति हमारे इस प्रेम और भक्ति का कुछ अंश हमें अपनी किसी राष्ट्रभाषा के लिए भी बचा कर रखना होगा। राष्ट्रभाषा के प्रश्न को हल करने का इस एक के अलावा कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता। 

    भाषा का एक विशेष पक्ष जिसकी ओर समुचित ध्यान दिए बिना हम कभी उसकी उन्नति की यथार्थपूर्ण कल्पना नहीं कर सकते उसका हमारी वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ ही हमारे दैनिक उपभोग की एक वस्तु होना भी है। अंग्रेज़ी के प्रति लोगों के आकर्षण के कारणों का विश्लेषण करते समय हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ज्ञान का मानक, निर्भर योग्य और अधिकांश समृद्ध प्रकाशन इस देश में आज भी अंग्रेज़ी में हो रहा है। सभी सम्पन्न और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग तो अपने वैचारिक आदान-प्रदान के लिए उसे अपने गले का हार बनाए ही हुए हैं, पत्रकारिता, विज्ञान, तकनीकी, कानून आदि के संबंध में अधिकांश उच्चस्तरीय सामग्री हमें अब तक केवल अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। केवल राष्ट्रभाषा और राष्ट्रप्रेम की दुहाई देकर हम उस भाषा के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं कर सकते जिसमें उन्हें बेहतर क़िस्म का माल उपलब्ध है। इसीलिए जिस भाषा को हम इस देश की आम संम्पर्क भाषा बनाना चाहते हैं उसकी समृद्धि के प्रयत्न में हमारा उसी आत्मोत्सर्ग की भावना के साथ जुटना ज़रूरी होगा जिस आत्मोत्सर्ग की भावना के साथ कभी हम इस देश के स्वातंÛय के लिए जुटे थे। यदि इस सम्पर्क भाषा में किसी ऐसे मानक और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त एक विश्वकोश का ही निर्माण हो जाए जिसमें लगभग हर विषय पर पूर्णतः भारतीय दृष्टि से, सर्वथा वैज्ञानिक व वस्तुनिष्ठ ढंग से उसी विषय के अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखित सामग्री उपलब्ध हो तो शायद अकेला यह काम उस सम्पर्क भाषा के प्रति सभी देशवासियों को आकर्षित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयत्न होगा। उस भाषा में हर विषय पर सुन्दर, आकर्षक और निर्भर योग्य सामग्री उपलब्ध होने पर ही यह संभव है कि इस देश की माताएं अपने बच्चों के उस भाषा के अज्ञान पर उसी तरह अफ़सोस करें जिस तरह वे आज उनके अंग्रेज़ी भाषा के अज्ञान पर करती हैं।

आज जबकि दुनिया अधिकाधिक क़रीब आती जा रही है हम लोग विदेशी भाषाओं के ज्ञान के बिना अपना काम नहीं चला सकते। हमारी अपनी स्थितियों के भी तटस्थ और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के लिए यहआवश्यक होगा कि हम उन्हें केवल अपनी परम्पराओं और अपने पूर्वाग्रहों की खिड़कियों से ही न देखें बल्कि उन पर अन्य देशों के लोगों, अन्य विचारधाराओं और अन्य संस्कृतियों की दृष्टि से भी विचार करने में समर्थ हों। दुनिया से नहीं कटने के लिए हमें उसकी ओर अपनी कई स्वतंत्र खिड़कियां खोलनी होंगी और ये खिड़कियां सिर्फ अंग्रेज़ी की न होकर अन्य भाषाओं की भी होंगी। अंग्रेज़ी से हमारा रिश्ता अब प्रेम या घृणा का न होकर केवल एक विदेशी भाषा का रहना चाहिए। जिस दिन हम चीनी, जापानी, पश्तो, अरबी, स्पेनिश, फ्रेंच और जर्मन आदि विदेशी भाषाओं को भी अंग्रेज़ी जितना ही महत्त्व दे सकेंगे और जिस दिन उन्हें सीखने में भी हम अंग्रेज़ी जितने ही उत्साह का प्रदर्शन कर सकेंगे उसी दिन हम सही मायने में अंग्रेज़ी दासता से पूर्णतः मुक्त कहलायेंगे। राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए जिस दिन हम पूर्णतः अपनी ही किसी भाषा पर निर्भर रहने की स्थिति में होंगे उस दिन हम सच्चे अर्थों में वे भारतीय कहे जा सकेंगे जो मेकॉले की साज़िश के फलस्वरूप न सिर्फ ख़ू़न व रंग में भारतीय हों वरन् जो अभिरुचियों और विचारों, नैतिक आचरण और बुद्धि से भी शत प्रतिशत भारतीय हों।    
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: सितम्बर, 1992 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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