आलेख:वर्जीनिया का जीवन अवसाद से भरे आख्यान की तरह है - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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आलेख:वर्जीनिया का जीवन अवसाद से भरे आख्यान की तरह है


वर्जीनिया वुल्फ का जन्म 1882 में लंदन में हुआ था। मात्र तेरह वर्ष की उम्र में उनकी माॅ की मृत्यु हो गई, जो उनके जीवन में बहुत बड़ा आघात था। कुछ समय बाद सौतेली बहिन और फिर पिता की मौत ने वर्जीनिया को मानसिक रुप से बहुत विचलित कर दिया। 1913 में उसने मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्या करने का प्रयास किया। 1917 में वर्जीनिया ने हागर्थ प्रेस की शुरुआत की। इसी समय स्त्रियों को कई तरह के अधिकार मिलने लगे थे, जिनसे औरतो को पढ़ने के अधिकार, बाहर जाने के अधिकार, इस तरह के अधिकार औरतों को मिले जिससे उनको अपने बारे में सोचने-समझने को मौका मिला। यह समय समाज में परिवर्तन का समय था, जिसने समाज में बहुत उथल-पुथल मचायी।
  
वर्जीनिया का बचपन कईं तरह के आघातों का शिकार रहा। उनका बचपन उत्तरवर्ती विक्टोरियाई माहौल में गुजरा था। उनके पिता अपने समय के अच्छे लेखक थे और उन्होंने डिक्शरी ऑफ नेशनल बायोग्राफी की स्थापना की। यो कहा जाए कि उनका बचपन साहित्यिक माहौल में हुआ, जीवन के आघात उनके भीतर समाते गये और वे वहीं से अपने को संचालित करती रही। वर्जीनिया इस तरह अपने ही दुखों से समाज को देखने लगी। 1905 से टाइम्स लिटेरी सप्लीमेंट के लिए समीक्षाएं लिखना शुरु किया और 1907 से मोर्ली कालेज में पढ़ाना शुरु कर दिया। उनकी मानसिक बीमारी ने उनका ताउम्र पीछा नहीं छोड़ा। उनके सौतेले भाई ने बचपन में उनके साथ जो दुराचार किया उसके लचते वर्जीनिया को पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने में कोई रुचि नहीं रही।लेकिन वह माँ बनना चाहती थी इसीलिए विवाह किया।

1917 में अपना प्रेस शुरु होने पर उनकी किताबें यहीं से आयी। इस प्रेस से इलियट, . एम. फास्टर जैसे महत्वपूर्ण लेखकों की पुस्तके भी आयी। अपने प्रेस के कारण वर्जीनिया के जीवन में व्यस्तता आयी और उसके कारण जीवन में स्थिरता आयी। 1940 वुल्फ दम्पति को नाजियों के हमलें का भय सताने लगा। इसी साल बमबारी के चलते हागर्थ पे्रस वाला घर नष्ट हो गया और वर्जीनिया का अवसाद बढ़ता गया और इसी भय से अपने को बचाने के लिए 1941 उन्होंने अपने कपड़ों में पत्थर भरा और नदी में डूबकर चल बसी।

वर्जीनिया का जीवन अवसाद से भरे आख्यान की तरह है। जहां शुरु से अंत तक अवसाद ही अवसाद हैं। वह जब भी अवसाद से बाहर निकलने की कोशिश करती है कोई दूसरा अवसाद उसके दरवाजे पर दस्तक देता है और वर्जीनिया फिर वहीं की वहीं। वर्जीनिया का जीवन और लेखन स्त्री की स्वतंत्रता की खोज हैं। वह अपनी मर्जी से अपने काम करते में यकीन रखती है। उसके लिए वह अपनी मर्जी से मौत का चुनाव करती है। उसे बचपन मेें जो अवसाद एक पुरुष से मिला वह सारी उम्र उसके कारणों की खोज करते हुए स्त्री की स्वतंत्र दुनियां का नक्शा तैयार करती है। वर्जीनिया की पुस्तक रुम आॅफ वंस ओनका अनुवाद गोपाल प्रधान ने अपना कमरा नाम से किया है। यह अपना कमरा स्त्री की पहचान का प्रतीक ही है। घर में बेटे का कमरा होता है पर बेटी का नहीं। वर्जीनिया का सवाल यही है कि औरत को बचपन से ही हिकारत में रखा जाता है और उसे, इस बात का अनुभव कराया जाता है, व्यवहारिक स्तर पर कि तुम वह नहीं हो जो तुम होना चाहती हो! तुम को क्या होना है यह समाज तय करेगा। तुम को कैसे रहना है!, कैसे बोलना है, किससे बोलना है, कैसे चलना है, कैसे अपने को ढालना है-सब कुछ तय है! तुम को अपना दिमाग लगाने की कोई जरुरत नहीं है। घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है! तुम को तो पराये घर जाना है। यह तो पड़ाव है! यहां तुम को अपने को वहां जाने की तैयारी करनी है।

अपना कमरा पुस्तक में उनके व्याख्यान हैं। जो उन्होंनेऔरत और कथा-साहित्यविषय पर लड़कियों के काॅलेज में दिये थे। साहित्य में स्त्री को कितनी बड़ी सौंदर्य प्रतिमूर्ति रुप में दिखाया जाता है।काल्पनिक रूप से उसका महत्व सर्वोच्चय है; व्यवहारिक रुप से वह पूर्णतः महत्वहीन है। कविता में पृष्ठ-दर-पृष्ठ वह व्याप्त है; इतिहास में वह अनुपस्थित है। कथा साहित्य में वह राजाओं और विजेताओं की जिंदगी पर राज करती है; वास्तविकता में वह किसी लड़के की गुलामी करती है जिसके माॅ बाप उसकी उंगली में एक अंगूठी ठूस देते हैं। साहित्य में कुछ अत्यंत पे्ररक शब्द, कुछ अत्यंत गंभीर विचार उसके होठों से झरते हैं; असली जिंदगी में वह कठिनाई से पढ़ सकती है, कठिनाई से बोल सकती है और अपने पति की सम्पति है।‘ (पृसं-कवर से) स्त्री वह महज कल्पनाओं में स्वतंत्र होती है। वह आर्थिक रुप से पूरी तरह गुलाम होती है। वर्जीनिया की चिंता स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता में ही है। अगर स्त्री आर्थिक स्वतंत्र होती है तो स्वाभाविक ही वह अपने लिए सोचना शुरु कर सकती है अपने को बना सकती है। उसे हर वक्त अपनी असुरक्षा का भय सताता रहता है। वह दूर हो गया कि वह अपनी स्वतंत्र पहचान बना सकती है।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



कालुलाल कुलमी

(केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर शोधरत कालूलाल
मूलत:कानोड़,उदयपुर के रेवासी है.)

वर्तमान पता:-
महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
पंचटीला,वर्धा-442001,मो. 09595614315
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