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इतिहास के गोखड़े में :-मणिपुरी और भारतीयों के बीच सह-संबन्ध

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, सितंबर 17, 2011 | शनिवार, सितंबर 17, 2011


मणिपुरी और भारतीयों के बीच सह-संबन्ध इतिहास की दृष्टि में 17 वीं शताब्दी से हैं। इसके पहले ईसा पूर्व कपिलवस्तु के साक्य राजाओं ने मैत्रबाक  से गुजरते हुए अवा  देश पर विजय पाने और बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से उस समय पूर्व एशिया के अधिकांश भाग में भ्रमण करते हुए पहुँचने की कहानी इतिहास से ज्ञात है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि उस समय बौद्ध धर्म का प्रभाव मणिपुर में नहीं था। मणिपुर के प्राचीन साहित्यिक ग्रथों से पता चलता है कि-मणिपुर के आदिवासी मीतै या मैतै है। यह जाति निर्गुण और सगुण उपासना को मानती चली रही है। इसका प्रमाण मीतै के प्रत्येक घर में बड़ी श्रद्धा के साथ रखा जानेवाला देव-पीठ का स्थान है। उस स्थान के भगवान को मणिपुरी भाषा मेंसनामहीके नाम से पुकारते हैं। पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में मणिपुर मेंपाखंबानाम के राजा शासन करते थे। वे सनामही देवता के छोटे-भाई है। उनकी सात रानियाँ थी। उन सात रानियों के गर्भ से सात पुत्रों का जन्म हुआ। उनके नामों से मीतै समुदाय के सात गोत्र बनाये गये। गोत्रों को मणिपुरी भाषा मेंशलाइकहा जाता है। गोत्र-कथा के संदर्भ में दो-तीन कथाएँ पायी जाती है। इस गोत्र व्यवस्था के अनुसार एक गोत्र का युवक समान गोत्र की युवती से विवाह नहीं कर सकता है। लोग मानते हैं कि इसी जाति प्रथा के उल्लंघन करनेवालों कोगुरू शिदबा’ (सनामही और पाखंबा देवता) ने एक भयंकर अभिशाप रख छोड़ा था कि- ‘जो व्यक्ति समान गोत्रवाले के साथ विवाह करेंगे तो उनकी आठवीं पीढ़ी का इस मानव-संसार में नामोनिशान नहीं रहेगा।उस समय इस रीति के विपरीत अगर कोई विवाह करें तो उन्हें समाज में हेय की दृष्टि से देखते थे।  

वैष्णव धर्म के आगमन के साथ मणिपुर प्रदेश पर विभिन्न क्षेत्रों में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इस परिवर्तन ने इतिहास को पलटकर रख दिया था। संवत् 1600-1709 के आसपास संभवतः महाराज चाइरोंबा के शासनकाल में वैष्णव धर्म प्रचारक रमान्दी का मणिपुर में आगमन हुआ था। संवत 1704 के शजिबू  माह के बुधवार के दिन महाराज चाइरोंब नेसख्य हिन्दू सम्प्रदायको अपनाकर धर्म-परिवर्तन किया था। यह धर्म गंगाधर नामक एक ब्राह्मण से ग्रहण किया था। चाइरोंबा महाराज के निधन होने के पश्चात पामहैबा  मणिपुर के राजा बना। संवत 1716 में गरिबनीवाज महाराज के शासन काल में श्रीहट्ट जिला की नरसिंह टिला से भ्रमण करते हुए शान्तिदास गोसाइ अपने दो अनुयायी भगवान दास और नरायण दास के साथ मैतैलैपाक (मणिपुर प्रदेश) पहुँचे। शान्तिदास गोसाइ के षड़यन्त्र से संवत 1717 में चक्रकन्दारि ने वेद-मंत्र से पामहैबा महाराज को अपने वश में कर लिया तथा रमायेत अर्थात रमान्दी धर्म पर धर्म-परिवर्तन करवाया था। इस ब्राह्मण के गलत मार्गदशन से गरिबनीवाज महाराज ने मैतै येक-सलाइयों  को गोत्र में परिवर्तित किया था जैसे- निंथौजा को वैष्णव धर्म के शान्दिलय में, लूवां को काशयप, खूमन को मधूगालय, अङोम को कौमिकी में, मोइरां को अत्रैय, और शरां लैशांथेम को भरद्वाज में।

गरीबनवाज महाराज द्वारा वैष्णव-धर्म अपनाने के विस्तारपूर्वक विवरणसनामही लाइकन’, ‘निंथौरोलऔरमीयाटआदि पौराणिक ग्रन्थों में लिखा हुआ मिलता है। उसके शासन काल में कालिका, रामजी प्रभू, महाबली वन पर स्थित हनुमान ठाकुर जी की मंदिर और श्री कृष्ण के कियों शंगाइ  बनवाकर धर्म-प्रचार तेजी से हुआ। वैष्णव धर्म को मणिपुर प्रदेश के सार्वजनिक धर्म घोषित करते हुए ब्राह्मण के शिक्षा-धाम और गुरूकुल का निर्माण करवाया। धर्म परिवर्तन के विरोध में आवाज उठानेवालों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था और दंड के रूप में दूर दराज इलाकों में बसाने का नवीन रिवाज शुरू हुआ। बहिष्कृत व्यक्तियों के ऊपर कई नियम लागु होते थे जैसे- राजधानी में प्रवेश निषेध, वार्षिक ऋण अदा करना अनिवार्य, उन्हें सहयोग करनेवालों को मृत्यु दंड, उनके छूए हुए चीजों की उपेक्षा आदि। बहिष्कृत लोगों द्वारा बसनेवाले गाँव या क्षेत्र कोलोइ-लम’  नाम दिया गाया। हिंदू धर्म को माननेवालों को लोइलम में भेज दिया जाता था। संवत 1646 से मैतै (मणिपुर के मुख्य समुदाय का नाम) निंथौ  के लिए प्रयुक्त होनेवाले सम्मानजनक शब्दलाइनिंथौके स्थान पर महाराज शब्द प्रयोग करने लगा। इस तरह मैतै लैपाक (मणिपुर) में वैष्णव धर्म के आगमन और ब्राह्मणवादी मानसिकता का जन्म से मणिपुरी मैतै समुदाय के संस्कृति, साहित्य का पतन तथा राष्ट्रीय एकता में दरारें पैदा हुई। संवत 1726 इङा (आषाढ़) मास में शान्तिदास गोसाइ के योजनानुसार मैतै के उमंलाइ (वन देवता) कोनमाय  और कोलूमखै (पूजा के सामग्री) को अनुयायी और सेनाओं द्वारा इकट्ठा करवाकर वर्तमान महाबली हनुमान मंदिर के पास हैबोंग वृक्ष के पास जमीन में दफनाकर यज्ञ हवन किया गया। इस वर्ष इङेन-था (सावन मास), सोमवार के दिन पानथोइबी, सनामही, सोरारेन, होइदेनपोकपी  आदि के पवित्र स्थान को नष्ट किया गया। 

शान्तिदास गोसाइ ने तत्कालीन मैतै महाराज को- ‘मणिपुरी मैतै मयेक (मणिपुरी भाषा और लिपि) केवल ईश्वर की भाषा है मैतै लिपि में लिखित रचना मनुष्य के नहीं हो सकते, आम व्यक्ति द्वारा इसका प्रयोग पाप है।कहर गलत मार्गदर्शन किया था। परिणामस्वरूप राजा ने संवत 1732 में मैतै समुदाय के पवित्र धार्मिक ग्रंथ, पुराण, इतिहास तथा अन्य साहित्यिक रचनाओं को सैनाओं द्वारा इकटठा करवाकर कंला उटकल  के समक्ष ढेर बनाकर आग दी गयी। इस घटना से मणिपुर प्रदेश के अन्मोल सम्पत्ति राख में परिवर्तित हो गई, परिणामस्वरूप कई शताब्दियों से आज तक मणिपुर में शिक्षण और लेखन का कार्य बंगाली लिपि में प्रयोग होता आया है। उक्त घटना को मणिपुरी भाषा मेंपुया मै थाबानाम से जाना जाता है। इस दौरान अङोम गोपी द्वारा कृतीबास के रामायण और गंगादास सेन के महाभारत के कई अध्यायों का अनुवाद मणिपुरी भाषा में हुआ। मैदिंङू भैग्यचन्द्र महाराज के समय(संवत 1776) पंचरन नामक ब्राह्ममणों के लिए धर्म से संबंधित शिक्षालय तथा न्यायालय स्थापित किया गया। संवत 1790 के आस-पास लंथबाल में भैग्यचन्द्र महाराज के शासन काल में विवाह के संदर्भ में लिखित लक्षण ग्रंथसम्बन्ध निर्णयका नियम अनिवार्य रूप में ऐलान करवाकर सम्पूर्ण समुदाय को पालन करवाया था। इसी शोषण और विषम परिस्थितियों में धीरे-धीरे मणिपुर में मुख्यतः मैतै समुदाय ने हिंदू धर्म को अपनाया था। इस तरह के परिवेश में आस्था और सम्मान की भावनाएँ मनुष्य के हृदय में उत्पन्न होना स्वाभाविक है। क्योंकि धर्म तो समाज की पोशाक है।18वीं शताब्दी में पूर्व पीढ़ी द्वारा हिंदू धर्म को अपनाने की घटना एवं भूल को आज की या आनेवाली पीढ़ी हमेशा याद करेंगी। 

इतिहास की पृष्ठभूमि को जानने के लिए इतिहासकार तथा शोधार्थी को तत्कालीन घटनाओं को उजागर करनेवाला प्रमाणिक तथ्य की अवश्यकता होती है। हम आज की बात करें तो आज पुर्नस्थापित अपने लिपि और इतिहास के नवीन तथ्यों के खोज से प्राप्त सामग्रियों के सहारे नवीन इतिहास ग्रंथ स्थापित करने की कोशिशें सफलतापूर्वक जारी है। लिपि के विवादों को समाप्त कर शिक्षण सामग्री टंकन रूप मैतै लिपि में हो रही है। हिंदू धर्म के अनुयायीओं द्वारा किसी समुदाय के संस्कृति, आस्था अस्मिता तथा इतिहास ग्रंथों के साथ छेड़खानी विश्व में एक बहुत बड़ा अपराध ही माना जाएगा। इस अपराध से मुक्ति पाने के लिए कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि समय और तथ्य का पुनः लौट पाना या सृजन कर पाना असंभव है। सवर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता ने मणिपुरी समाज में छूआछूट, वर्ण-वर्ग भेद जैसे अमानवीय अवधारणाएँ स्थापित कर एक शोषक के रूप में शोषण करना शुरू किया। केवल अपनी फायदा और मनोरंजन के लिए स्त्री शोषण, निम्न वर्गों पर आर्थिक सामाजिक अत्याचार कोई नवीन संदर्भ नहीं है। 

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक समरूप समाज का निर्माण करने के लिए पूर्वाग्रह से मुक्ति पाना आवश्यक है क्योंकि समाज केवल किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता, कई व्यक्तित्वों के सम्मिलित होने से समाज बनता है। अतः समाज के नियम समाज में रहनेवाले लोक जन के लिए समान होना चाहिए। अतः समाज में अनुशासन बनाने का कार्य खास वर्ग के खास लोगों के हाथों में होकर बहुमत द्वारा चुने गये लोगों के हाथ में होनी चाहिए। जिससे अत्याचार, वर्ग-वर्ण भेद, छुआछूट जैसे भ्रष्ट मानसिकता समाज में पनप सकें। इस परिवर्तन से उम्मीद की जा सकती है कि विभिन्न क्षेत्रों में विकास के द्वार खुलेंगे।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
गुणचन्द्र नोंथोमबम
सहायक हिन्दी अध्यापक,सैनिक स्कूल इम्फाल,लुवांशंबम मखा लैकाइलिबरल कोलेज के पास,पोस्ट ऑफिसमंत्रिपुख्री
पीन नं. 795002(मणिपुर)
इम्फालइष्ट,फोन नं- 08974026862
-मेलःgunna.meitei@gmail.com,
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