Latest Article :
Home » , , , » यशवन्त कोठारी का व्यंग्य-शोधार्थीजी

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य-शोधार्थीजी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, सितंबर 04, 2011 | रविवार, सितंबर 04, 2011


शोधार्थीजी विश्वविद्यालय के बाहर ही मिल गये। चेहरे पर शोष के कारण शोध थी। वे बिलबिला रहे थे और शोध की अर्थी निकालने पर उतारू थे। मैंने पूछा क्या हुआ? बोल पड़े ‘‘होना क्या था, मेरा सिनोपसिस उस लड़की को दे दिया, अब मैं क्या करूं?’’

अरे भाई यह परम्परा है जब ये तुम्हारे गाइड रिसर्च कर रहे थे तब उनके गाइड भी इतने ही उतावले थे। ये जिन्दगी भर गाइड के घर सब्जी लाते रहें। रेलवे हवाई जहाज के टिकट बनवाते रहे, बच्चों को स्कूल छोड़ते रहे, स्कूल से लाते रहे। घर वालों को बाजार ले जाते रहे तब न जाकर पीएच.डी. हुए है। पीएच.डी. कोई मामूली चीज है क्या? तुम्हें तो अभी काफी पापड़ बेलने है गाइड के घर पर जाओ, आटा रख कर आओ, फिर भले विभाग में मत आना। शोधार्थीजी को बात जम गयी। झोला कन्धे पर डाला गुरू के नाम पर कुछ गालियां दी और गाइड के घर की तरफ दौड़ पड़े।

शाम को वापस मिले  मैंने पूछा ‘‘गुरू तुम्हारी सिनापसिस का क्या हुआ?’’ बोले ‘‘होना क्या था, तुम्हारा नुस्खा काम कर गया। अब गाइड सिनोपसिस लिख रहे हैं और मैं थड़ी पर बैठ कर चाय पी रहा हूँ.।’’आखिर विश्वविद्यालयों में शोध की हालत इतनी खराब क्यों हैं? सैकड़ों थिसिस विश्वविद्यालय के भण्डार में धुल खा रही है। छपे हुए पेपर्स आगे जाकर दूसरों के साबित हो जाते है। एक ही विश्वविद्यालय की थिसिस किसी दूसरे विष्वविद्यालय में भी दूसरे छात्र को पीएच.डी. दिला देती है। एक ही टॉपिक पर कई पीएच.डी. हो जाते हैं। शोध का मतलब ही बदल गया है। एक प्रोफेसर ने स्पप्ट कहा असली शोध तो ये है कि कुलपति तुम्हें जानता हैं या नहीं, राजभवन से सम्बन्ध अच्छे बनाना ही पोस्ट डाक्टरल शोध हैं। असली शोध, अच्छा शोध पत्र और अच्छी पीएच.डी. बीते जमाने की बात हो गयी है। अब अपराधी, मंत्री, अफसर, व्यापारी आदि षोध करते है और उनके नाम से शोध निबन्ध जमा हो जाते है। वे डाक्टर हो जाते है और असली शोध लेखक टापता रह जाता हैं। शोध लेखन की दरें तक तय हो जाती हैं। अक्सर गम्भीर अध्येता जिन्दगी भर रोते रह जाते हैं और उनका शोध  कार्य कोई अन्य छपवाकर मशहूर हो जाता हैं। पैसे में बिकती शोध का स्तर गिरना स्वाभाविक हैं। जो शोध के गिरते स्तर को लेकर चिन्तित है उनसे विनम्र निवेदन है कि इस पर एक सेमिनार करें। वैसे भी मेरे शोधार्थी  मित्र का कहना है कि यदि एक मर्डर फ्री करने की इजाजत हो तो अपने गाइड का मर्डर करना चाहेगा।

शोध निबन्ध की दयनीय दशा पर शायर का कहना है-

दुकानदार तो मेले में लुट गये यारो।
तमाशबीन दुकाने लगाकर बैठ गये।।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


तीक्ष्ण व्यंग्यकार 

86, लक्ष्मी नगर,
ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर
फोन - 2670596ykkothari3@yahoo.com
SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template