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डा. मनोज श्रीवास्तव की दो नई कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, सितंबर 30, 2011 | शुक्रवार, सितंबर 30, 2011


शोख सैलानी 
सनकी सैलानी
फ़लांग जाएंगे 
कांटेदार मौसमों की अभेद्य दीवारें
सागर, महासागर
पर्वत-पठार,
पार कर जाएंगे 
भाषाओं की भूल-भुलैया,
लेकिन, पल भर 
ठिठक जाएंगे वहां,
दहशगर्दी बरसती होगी 
मूसलाधार जहां

बारूदी छतों के नीचे 
पूछेंगे तसल्ली से वे
सहक्रोधी बाशिंदों से--
"अजी! कैसा है
तुम्हारे आवाम में 
दहशत का मौसम?"
तब, वे यह उत्तर पाकर
राहत की सांस लेंगे--
"कोई भीषण धमाका हुए
हफ़्तों गुजर गए हैं,
हां, एकाध घंटे के अंतर पर
पार्कों में या चौराहों पर
भनभनाती मक्खियों सरीखी
गोलियां भर चल जाती हैं,
मलवों में खर्राटे भर रहा 
कोई लावारिस बम
जग पड़ता  है,
यह काहिल शहर 
सुबह से शाम तक 
कोई दर्ज़न भर लाशें ही
उत्पादित कर सका है
और मंडराते अखबारनवीस बेचारे
किसी शानदार मानव बम की उम्मीद में
बड़े उदास फ़िर रहे हैं
भीड़ -भाड़ में, 
सोच रहे हैं
कि निकम्मा अंडरवर्ल्ड
कितनी सुस्ती से विकास कर रहा है
सभ्यता का इतना धीमा विनाश कर रहा है

पत्थरों पर इतिहास पढ़ने वाले 
धूल में पुराण सूंघने वाले 
विदेशियों में ऐतिहासिक पुरखे देखने वाले 
पुरातात्विक धूप सेंकते 
ये शोख शूरवीर सैलानी 
बाज नहीं आएँगे 
अपने अनुभव पकाने से.

युद्ध आयोजित होते हैं

तब युद्ध होते रहे होंगे 
आपद, अनिश्चित दुर्घटनाएं,
मज़बूरियाँ झोंक देती रही होंगी युद्धाग्नि में 
जिसकी तपिश सोख लेती थी इतिहास के आंसू
मौनधारण कर लेती थी
इतिहासकार की विलापरत कलम

अब, युद्ध की नींव डालने से पहले
लाभ की बहुमंजिली इमारत 
खड़ी कर दी जाती है,
युद्ध का निष्कर्ष निकालने से पहले 
उसकी आयु  बता दी जाती है, 
युद्ध का एजेंडा लाने से पहले 
उसकी उपलब्धियां गिना दी जाती है,
युद्ध-तालिका बनाने से पहले 
हताहतों की दाशमिक गणना 
कर ली जाती है,

बेशक! इस युद्ध-नीति की पहेली से
विधाता हतप्रभ और आकुल  है,
क्योंकि युद्ध खेले जाने लगे हैं--
व्यावसायिक पंडालों में,
गाजे-बाजे समेत मंचित होने लगे हैं--
फिल्मी कैमरों में 
अंकित होने के लिए 

हाँ, युद्ध प्रायोजित होते हैं,
परदों पर चलचित्रित होने से पहले
निर्माताओं की 
जेब गरम कर देते हैं.


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव 
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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