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‘नई कविता’ के सशक्‍त हस्ताक्षर शमशेर बहादुर सिंह

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, सितंबर 02, 2011 | शुक्रवार, सितंबर 02, 2011



"ओ मेरे घर
ओ हे मेरी पृथ्वी
साँस के एवज़ तूने क्‍या दिया मुझे
- ओ मेरी माँ?

तूने युद्ध ही मुझे दिया
प्रेम ही मुझे दिया क्रूरतम कटुतम
और क्या दिया
मुझे भगवान दिए कई-कई
मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह!"
(शमशेर; ‘ओ मेरे घर’, इतने पास अपने; पृ.19)

हिंदी साहित्य जगत में ‘नई कविता’ के सशक्‍त हस्ताक्षर शमशेर बहादुर सिंह (13 जनवरी,1911 - 12 मई,1993) का अपना एक सुनिश्‍चित स्थान है। उनका जन्‍म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक गाँव एलम में हुआ था। शिक्षा-दीक्षा देहरादून तथा प्रयाग में हुई। वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। इन तीनों ही भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - दोआब(1948), प्लाट का मोर्चा : काहानियाँ और स्केच(1952), कुछ कविताएँ(1959), कुछ और कविताएँ(1961), चुका भी हूँ नहीं मैं(1975), इतने पास अपने(1980), उदिता : अभिव्यक्‍ति का संघर्ष(1980), बात बोलेगी(1981), काल तुझसे होड़ है मेरी(1988), टूटी हुई बिखरी हुई(1990), कुछ गद्‍य रचनाएँ(1989) तथा कुछ और गद्‍य रचनाएँ (1992)। स्मरणीय है कि शमशेर ‘दूसरा सप्‍तक’ (1952) में सम्मिलित थे तथा उन्हें 1977 में ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का तुलसी पुरस्कार प्राप्‍त हुए थे। 1987 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें मैथिलीशरण गुप्‍त पुरस्कार और 1989 में कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया।

शमशेर और उनकी कविताओं पर कुछ कहना एक चुनौती है क्योंकि उनकी काव्य यात्रा छायावादोत्तर रोमांटिक भावधारा से शुरू होकर प्रगतिवाद और प्रयोगवाद को पार करती हुई नई कविता से जुड़ती है और उसके पार भी चली जाती है। सच तो यह है कि उन्होंने कविता के क्षेत्र में छाए हुए वादों की जकड़न से अपने आपको अलग रखा और काव्य भाषा को चित्रात्मकता, संगीत, बिंब विधान और लय के माध्यम से तराशा। इस संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत द्रष्‍टव्य है - "शमशेर की कविताओं में संगीत की मनःस्थिति बराबर चलती रहती है।एक ओर चित्रात्मकता की मूर्तता उभरती है, और फिर वह संगीत की अमूर्तता में डूब जाती है। भाषा में बोलचाल के गद्‍य का लहजा और लय में संगीत का चरम अमूर्तन।"(रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदान का विकास; पृ.205)। 

 वे अपनी कविताओं में संवेदनाओं का मूर्त चित्रण करते हैं। इस संदर्भ में मुक्‍तिबोध का मत है कि "शमशेर की मूल प्रवृत्ति एक इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार की है। इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार अपने चित्र में केवल उन अंशों को स्थान देगा जो उसके संवेदना-ज्ञान की दृष्‍टि से प्रभावपूर्ण संकेत शक्‍ति रखते हैं।... दूसरे शब्दों में इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार दृश्‍य के सर्वाधिक संवेदनाघात वाले अंशों को प्रस्तुत करेगा और यह मानकर चलेगा कि यदि वह संवेदनाघात दर्शक के हृदय में पहुँच गया तो दर्शक अचित्रित शेष अंशों को अपनी सृजनशील कल्पना द्वारा भर लेगा।" (मुक्‍तिबोध, नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध; पृ.92)

शमशेर कविता में आंतरिक ऊर्जा को महत्व देते हैं। वे खड़ीबोली के बोलचाल के रूप को महत्व देते हैं। उनका मत है कि ‘पाठक के मन की बात को पाठक की ही भाषा में व्यक्‍त करना चाहिए।’ इस संदर्भ में वे उर्दू को भी याद करते हैं और कहते हैं - "मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूँ। मैं वह आईना हूँ जिसमें आप हैं।" (शमशेर, बाढ़)

यहाँ एक बात ध्यान रखने की है कि गद्‍य हो या पद्‍य - शमशेर की भाषा बनावटी नहीं है। वे खड़ीबोली क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसका ठेठ तथा एक सीमा तक खुरदरा अंदाज उनकी भाषा में भी है। खास तौर से उनकी कहानियाँ पढ़ते समय यह साफ दिखाई देता है कि उनका गद्‍य बातचीत की शैली का है। वे जैसे बोलते हैं, वैसे ही लिखते भी हैं। कहने का मतलब यह है कि लिखते समय भी वे बातचीत का खुलापन लाते हैं।

शमशेर बहादुर सिंह को भली भाँति उनके साहित्य के माध्यम से जाना जा सकता है चूँकि उनका जीवन और साहित्य वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पाखंड और दिखावा न तो उनके व्यक्‍तित्व में था और न ही उनके साहित्य में । उनका संसार निजीपन का संसार है। अनुभव का संसार है। जीवन के ताप को सहकर वे सहज बने। यही सहजता उनके व्यक्‍तित्व और रचनाओं में मुखरित है। इसी के कारण उनके विचार भी उदात्त बने। वे हमेशा अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हैं और कहते हैं - "भूल कर जब राह - जब-जब राह... भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तुम ही आँख बन मेरे लिए।"

शमशेर का समूचा जीवन अभावों के कटघरे में बीता पर उन्होंने कभी उफ तक नहीं की। हालात के आगे घुटने टेकना तो शायद वे जानते ही नहीं थे। शमशेर के साथ बिताए तीन वर्षों को याद करते हुए हेमराज मीणा बताते हैं कि "शमशेर जी साधारण चाय के स्थान पर हल्दी की चाय खुद बनाकर पीते थे और आर्थिक विपन्नता का आलम यह था कि घिसे और फटे हुए कुर्ते को हाथ से सिलकर काम चलाना पड़ता था।" ऐसी स्थिति में भी शमशेर टूटे नहीं, बिखरे नहीं। अड़िग होकर आगे बढ़ते रहें। यही आस्था और जिजीविषा उनकी रचनाओं में भी मुखरित है - "मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल/ जीवन:/ कण-समूह में हूँ मैं केवल/ एक कण।/ -कौन सहारा!/ मेरा कौन सहारा!"

शमशेर की कविताओं में एक ओर प्रेम की आकांक्षा, नारी सौंदर्य की कल्पना और निराशा से उत्पन्न व्यथा का मार्मिक चित्रण है - "गोद यह/ रेशमी गोरी/ अस्थिर/ अस्थिर/ हो उठती/ आज/ किसके लिए? जा/ ओ बहार/ जा! मैं जा चुका कब का/ तू भी-/ ये सपने न दिखा?"  तो दूसरी ओर उनका मिज़ाज इन्क़लाबी है - "सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं।? हमारे अपने नेता भूल जाते हैं हमें जब,? भूल जाता है ज़माना भी उन्हें, हम भूल जाते हैं उन्हें खुद/ और तब/ इन्क़लाब आता है उनके दौर को गुम करने।"

शमशेर कम बोलनेवाले व्यक्‍ति थे। उनकी धारणाएँ उनकी कविता में बोलती हैं। उनकी प्रसिद्ध उक्‍ति है कि "बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी/ बात ही।/ सत्य का/ क्या रंग/ पूछो, एक रंग/ एक जनता का दुःख एक/ हवा में उड़ती पताकाएँ अनेक।" (बात बोलेगी)। कभी कभी यह भी प्रतीत होता है कि शमशेर आधुनिक मानवीय दाह को शांत करनेवाले कलाकार हैं - "आधुनिकता आधुनिकता/ डूब रही है महासागर में/ किसी कोंपले के ओंठ पे/ उभरी ओस के महासागर में / डूब रही है/ तो फिर क्षुब्ध क्यों है तू।" (‘सारनाथ की एक शाम’ (त्रिलोचन के लिए); चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.21)

शमशेर ने बदलती हुई जटिल और भयावह दुनिया में मनुष्‍य की पीड़ा और मूल्यहीनता को चित्रित किया है। मनुष्‍य परिस्थितियों और उनके सुख-दुःख को विविध धरातलों पर अभिव्यक्‍त किया है। उनकी कविता का केंद्र व्यक्‍ति है। उन्होंने अपने आप को व्यक्‍ति के प्रति समर्पित कर दिया है - "समय के/ चौराहों के चकित केंद्रों से।/ उद्‍भूत  होता है कोई : "उसे-व्यक्‍ति-कहो" :/ कि यही काव्य है।/ आत्मतमा/ इसलिए उसमें अपने को खो दिया।" (‘एक नीला दरिया बरस रहा’; चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.13)। 

उन्होंने मध्यवर्ग की अधकचरी स्थिति को ऐतिहासिक संदर्भों में देखते हुए कहा है कि - "इतिहास में भी तू/ असहनीय रूप से दयनीय।" इसी प्रकार साम्राज्यवाद के नाम पर आम लोगों को धोखा दिए जाने पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं कि "बनियों ने समाजवाद को जोखा है/ गहरा सौदा है काल भी चोखा है/ दुकानें नई खुली हैं आजादी की/ कैसा साम्राज्यवाद का धोखा है!" (‘बनियों ने समाजवाद को जोखा है’; सुकून की तलाश; पृ.56)।

शमशेर ने अनेक रचनाओं में सामाजिक सच्चाई और लोकतंत्र की ताकत को स्वर प्रदान किया है। उनकी दृष्‍टि में "दरअसल आज की कविता का असली भेद और गुण उन लोक कलाकारों के पास है जो जन आंदोलान में हिस्सा ले रहे हैं।"((सं) वक्‍तव्य; दूसरा सप्‍तक; पृ.77)। 

भारत-चीन युद्ध के समय कवि ने ‘सत्यमेव जयते’ पर जोर दिया - "शिव लोक में चीनी दीवार न उठाओ!/ वहाँ सब कुछ गल जाता है/ सिवाए सच्चाई की उज्ज्वलता के!/ असत्य कहीं नहीं है!/ शक्‍ति आकार में नहीं,/ सत्य में है!/ हमारी शक्‍ति/ सत्य की विजय/ ...याद रखो/ सत्यमेव जयते!/ सत्यमेव जयते!/ सत्यमेव जयते!" (‘सत्यमेव जयते’(भारत-चीन युद्ध); चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.43)

 कवि की मान्यता है कि मानव मात्र के लिए बुनियादी चीज है-शांति। अतः वे कहते हैं - "अगर तुमसे पूछा जाय कि/ सबसे बुनियादी वह पहली चीज़ कौन-सी है/ कि मानव मात्र के लिए जिसका होना आवश्यक है?/ तो एक ही जवाब होगा तुम्हारा :/ एकदम पहली ही बार,/ फिर दूसरी बार भी,/ और अंतिम बार भी/ यही एक जवाब :-/ शांति!" (‘शांति के ही लिए’; चुका भी हूँ नहीं मैं; पृ.57)

समाज में धर्म के नाम पर होनेवाले पाखंड पर भी शमशेर कुठाराघात करते हैं - "जो धर्मों के अखाड़े है/ उन्हें लड़वा दिया जाए!/ जरूरत क्या कि हिंदुस्तान पर/ हमला किया जाए!!/ ***/ मुझे मालूम था पहले ही/ ये दिन गुल खिलाएँगे/ ये दंगे और धर्मों तक भी/ आख़िर फैल जाएँगे/ ***/ जो हश्र होता है/ फ़र्दों का वही/ क़ौमों का होता है/ वही फल मुल्क को/ मिलना है, जिसका/ बीज बोता है।" (‘धार्मिक दंगों की राजनीति’, सुकून की तलाश; पृ.71)। वे यह भी कहते हैं कि "जितना ही लाउडस्पीकर चीखा/ उतना ही ईश्‍वर दूर हुआ :/ (-अल्ला-ईश्‍वर दूर हुए!)/ उतने ही दंगे फैले, जितने/ ‘दीन-धरम’ फैलाए गए।" 

(‘राह तो एक थी हम दोनों की’, सुकून की तलाश; पृ.33)। शमशेर बौद्धिक स्तर पर मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद से प्रभावित है। उनकी कविताओं में मार्क्स के विचारों के साथ साथ कला, प्रेम और प्रकृति के विविध रंग विद्‍यमान है। इस संदर्भ में उन्होंने अपने आत्मसंघर्ष को व्यक्‍त करते हुए कहा कि - "वाम वाम वाम दिशा,/ समय साम्यावादी।/ पृष्‍ठभूमि का विरोध अंधकार - लीन। व्यक्‍ति .../ कुहास्पष्‍ट हृदय-भार, आज हीन।/ हीनभाव, हीनभाव/ मध्यवर्ग का समाज, दीन।/ पथ-प्रदर्शिका मशाल/ कमकर की मुट्ठी में किंतु उधर :/ लाल-लाल/ वज्र कठिन कमकर की मुट्ठी में / पथ प्रदर्शिका मशाल।" (‘वाम वाम वाम दिशा’; कुछ और कविताएँ)

कलासृजन, संरचना और शिल्प की दृष्‍टि से शमशेर की लंबी कविता ‘अम्न का राग’को विशेष रूप से  उल्लेखनीय माना जाता है। इसमें कवि ने समाजशास्त्रीय संबंधों को बखूबी उकेरा है। इस कविता में उन्होंने दो राष्‍ट्रों की संस्कृतियों को प्रतिबिंबित किया है तथा वैश्‍विक दृष्‍टिकोण को उभारा है। शमशेर शोषण, हिंसा और युद्ध का विरोध करते हैं और यह चाहते हैं कि सर्वत्र शांति कायम हो। ‘अम्न का राग’ की शुरुआत में ही बसंत के नए प्रभात की ओर संकेत किया  है - "सच्चाइयाँ/ जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं/ हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्‍मुक्‍त नाचते/ परों में झिलमिलाती रहती हैं/ जो एक हजार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है/ उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ/ कि बसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।" 

इस काव्यांश में कवि ने प्रतीकों के माध्यम से सत्य और शांति को उजागर किया है। आगे देश की सीमाओं को अतिक्रमित करते हुए कहते हैं कि - "ये पूरब-पश्‍चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं/ मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द लपेट लिया।" शमशेर भारतीय एवं पाश्‍चात्य संस्कृतियों को अपनी आत्मा मानते हैं। उनक दृष्‍टिकोण वैश्‍विक है। इसी वैश्‍विक परिदृश्‍य को उकेरते हुए वे कहते हैं कि "मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव पर/ बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूँ/ सब संस्कृतियाँ मेरे संगम में विभोर हैं/ क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख शांति का राग हूँ/ बहुत आदिम, बहुत अभिनव।" 

इतना ही नहीं भारतीय एवं पाश्‍चात्य विचारकों, शायरों, दार्शनिकों, संगीतकारों और रचनाकारों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि - "देखो न हक़ीकत हमारे समय की जिसमें/ होमर एक हिंदी कवि सरदार जाफ़री को/ इशारे से अपने क़रीब बुला रहा है/ ***/ और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज मेरा तुलसी मेरी/ ग़ालिब/ एक एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का/ कुशल आपरेटर हैं।" 

शमशेर को अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है जितना मास्को का लाल तारा। पीकिंग का स्वर्गीय महल मक्का मदीना से कम पवित्र नहीं - "मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है/ जितना मास्को का लाल तारा/ और मेरे दिल में पीकिंग का स्वर्गीय महल/ मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं/ मैं काशी में उन आर्यों का शंख-नाद सुनता हूँ/ जो वोल्गा से आए/ मेरी देहली में प्रह्‍लाद की तपस्याएँ दोनों दुनियाओं की/ चौखट पर/ युद्ध के हिरण्यकश्‍य को चीर रही हैं।" यह कविता उनकी अद्‍भुत सृजनात्मक प्रतिभा का परिचायक है।

शमशेर समस्त संसार में शांति कायम करना चाहते हैं। उन्होंने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य के सपने को एक साथ पिरोया है - "ये आँखें हमारे माता-पिता की आत्मा और हमारे बच्चों/ का दिल है/ ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी/ और हमारी कला का सच्चा सपना हैं/ ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं/ ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और/ हक़ीक़त का अमर सपना हैं/ इनको देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ/ पाना है।/ हम मानते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों।"

शमशेर संवेदनशील ही नहीं अपितु भावुक भी थे। नामवर सिंह ने उनकी भावुकता का जिक्र करते हुए हैदराबाद में एक समारोह में बताया था कि कैसे एक बार नरेंद्र शर्मा की गिरफ्तारी की सूचना ने उन्हें विचलित कर दिया था। प्रेमलता वर्मा शमशेर के व्यक्‍तित्व के कुछ आयामों को सामने रखते हुए कहती हैं कि शमशेर की दुनिया ‘वाइब्रेंट’ थी। वे छलरहित मगर चुंबकीय आकर्षण वाले व्यक्‍ति थे। वे हमेशा कहा करते थे कि "कविता के माध्यम से मैंने प्यार करना - अधिक से अधिक चीजों को प्यार करना - सीखा है। मैं उसके द्वारा सौंदर्य तक पहुँचा हूँ।" अनेक विद्वानों ने शमशेर को अनेक तरह से संबोधित किया है। मलयज के लिए वे ‘मूड्स के कवि’ हैं तो अज्ञेय के लिए ‘कवियों के कवि।’ रामस्वरूप चतुर्वेदी उन्हें ‘एब्स्ट्रैक्‍ट के कवि’ मानते हैं तो नामवर सिंह ‘सुंदरता के कवि।’ गोपाल कृष्‍ण कौल ने उन्हें ‘फार्मलिस्ट’ माना है तो मधुरेश उन्हें ‘तनाव और अंतर्द्वन्द्वों के कवि’ मानते हैं। विजय देव नारायण साही ने उन्हें ‘बिंबों का कवि’ घोषित किया है तो सत्यकाम ने ‘कवियों का पुंज’ तक कह दिया है। पर शमशेर कहते हैं - 

" मैं समय की लंबी आह
मौन लंबी आह...
होना था - समझना न था कुछ भी शमशेर...
आत्मा है
अखिल की हठ - सी..."

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


साहित्यधर्मी व्यक्तित्व

(शताब्दी संदर्भ के अंतर्गत १७ जुलाई, २०११ को कादंबिनी क्लब में प्रस्तुत किया गया आलेख  )
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