''रामाज्ञा शशिधर किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं ''-मदन कश्यप - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''रामाज्ञा शशिधर किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं ''-मदन कश्यप


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वरवर राव की राय में ये संग्रह
जब मैंने पहली बार दिल्ली के 'आकाश दर्शन' में एक युवा स्वर को उत्पीडि़त पृथ्वी के गीत—बिहार के जमीनी दलित के गीत—गाते हुए सुना तो मैं सम्मोहन से भर गया। कुछ देर के लिए ऐसा लगा जैसे भोजपुर का कोई नंगे पाँव दलित भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शहादत दिवस पर मयूर विहार के अभिजन, सभ्य समाज को आंदोलित करने चला आया हो।

शशिधर की इन कविताओं को जब मैंने सुना तो ऐसा महसूस हुआ कि भूमिहीन गरीब का जीवन उसी की भाषा, उसी के अंदाजे बयाँ में पूरे हाड़-मांस के साथ जीवंत हो गया है। यही कारण है कि शशिधर मेरे प्रिय कवि हो गए हैं, और मैं उनका मुरीद बन गया हूँ।




मदन कश्यप जी के क्या कहा
रामाज्ञा शशिधर की कविताएँ संवेदना की नई बनावट केसाथ-साथ यथार्थ को देखने परखने के अपने नज़रिए के कारण भी प्रभावित करती हैं। यह नई रचना दृष्टि आम आदमी के संघर्षों में उनकी सक्रिय भागीदारी की देन है। आज की कविता और कवियों को देखते हुए इसे दुर्लभ ही माना जाएगा। इसीलिए रामाज्ञा अपने समकालीनों में सबसे अलग हैं। 

वे किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं और इस रूप में नागार्जुन की परंपरा का विकास उनमें देखा जा सकता है। वे जानते हैं कि खेत में सिर्फ अन्न ही नहीं पैदा होते हैं, बल्कि फाँसी के फंदे के धागे, कफन के कपड़े और श्रद्धांजलि के फूल के उत्स भी खेत ही है। इस तरह किसान जीवन के संघर्ष ही नहीं, त्रासदी और विडंबनाओं की गहरी समझ भी शशिधर के पास है।  शशिधर की संवेदना किसानों और बुनकरों की त्रासदी के चित्रण तक ही सीमित नहीं है। वे वर्तमान राजनीति के पाखंड को उजागर करने के साथ-साथ आज की कविता, कला और भाषा को लेकर भी गहरे सवाल उठाते हैं। जीवन-दृष्टि की यह व्यापकता ही उन्हें एक अलग काव्य व्यक्तित्व प्रदान करती है।

 रामाज्ञा शशिधर कौन है...?
02 जनवरी, 1972 को बेगूसराय जि़ले (बिहार) के सिमरिया गाँव में निम्नवर्गीय खेतिहर परिवार में जन्म। चार बहन-भाइयों  में अग्रज। दिनकर उच्च विद्यालय सिमरिया के बाद लनामिवि, दरभंगा से एम.ए. तक की शिक्षा। एम.फिल. जामिया मिल्लिया इस्लामिया एवं पीएच-डी. जेएनयू से। 

2005 से हिन्दी विभाग, बीएचयू में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।गाँव में दिनकर पुस्तकालय के शुरुआती सांस्कृतिक विस्तार में 12 साल का वैचारिक नेतृत्व, कला संस्था 'प्रतिबिंब' की स्थापना एवं संचालन तथा इला$काई किसान सहकारी समिति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष। जनपक्षीय लेखक संगठनों के मंचों पर दो दशकों से सक्रिय। इप्टा के लिए गीत लेखन।

लगभग आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन। दिल्ली से प्रकाशित समयांतर (मासिक) में प्रथम अंक से 2006 तक संपादन सहयोगी। ज़ी न्यूज, डीडी भारती, आकाशवाणी एवं सिटी चैनल के लिए छिटपुट कार्य।प्रकाशित पुस्तकें : 'आँसू के अंगारे, 'विशाल ब्लेड पर सोई हुयी लड़की' (काव्य संकलन), 'संस्कृति का क्रान्तिकारी पहलू' (इतिहास), 'बाढ़ और कविता' (संपादन)। पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं के अलावा आलोचना, रिपोर्ताज और वैचारिक लेखन। 'किसान आंदोलन की साहित्यिक भूमिका' शीघ्र प्रकाश्य।
फिलहाल बनारस के बुनकरों के संकट पर अध्ययन।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
अंतिका प्रकाशन
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एक्‍सटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन: 0120-2648212,मोबाइल. 9871856053, 9891245023, ई-मेल: antika56@gmail.com          

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