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कविता संग्रह 'चाहता हूँ पागल भीड़' से चुनिन्दा कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, सितंबर 21, 2011 | बुधवार, सितंबर 21, 2011


(ये कवितायेँ मनोज जी की लगभग एक दशक पहले लिखी रचनाओं में से हैं जो उनके कविता संग्रह 'चाहता हूँ पागल भीड़' से ली गयी है.)


१. शहर के कदमों पर मरती नदी का विलाप
धूप-छांव के
बारहमासे संगीत में
खोया हुआ शहर
इत्मिनान से चौराहों पर,
माडलिंग करने वाली औरतों की
नस्ल वाली लौंडियों से
छेड़खानी करते हुए
निपटा रहा हैं सदियां
पलकों में

हवा की पिठकुइयां सवारी करके
गैर-सामाजिक परिवर्तन का जुलूस देखते हुए
कत्लेआम वाले मोहल्ले की गली पारकर
फ़िल्मी शूटिंग वाले पंडाल में
सेक्स का आम चिचोरते हुए
वेश्यालयों के कूड़ेदान में
शुचिता की गुठली डाल रहा हैं

धुआये शोर-शराबों की
बदबूदार पोशाक पहन,
अपने लादेनी कदमो तले
दम तोड़ रहे
मिमियाते गांवो को कुचल-मसल रहा है

हां, यह कैक्टसी गबरू शहर
मेरी जर्जर बांहो में निडर
अपनी विष-बुझी जड़ें
चुभो-चुभोकर,
अपनी हबशी भुजाओं में खींच
और दैत्याकार जिस्म से दबोच
शिवालय की निचाट छाया में
मेरा घातक बलात्कार कर रहा है

फिर, जूठे पत्तल-सा तिरस्कृत कर
दोबारा पछुआ हवाओं से
कामोन्मत्त होने तक,
वह चला जा रहा है अनवरत
पार्कों, विहारों, उद्यानों में प्रेमयोगरत
उदार-तन, उदार-मन मादाओं के साथ
और समय को झांसा देते हुए
अप्रासंगिक वर्तमान को
खदेड़े गए अतीत के
डस्टबिन में डाल रहा है,
कई सौ सालों के
बराबर की छलांग लगाने के लिए
सारे अतिमानवीय हथकंडे अपना रहा है

पर, मैं इन सतत यातनाओं से मरणासन्न
लेटी रहूँगी यहाँ खिन्न-मन,
याददाश्त के घर्र-घर्र चलते रहने पर
कुछ मीठी पौराणिक यादों में खोने की
दमतोड़ कोशिश करती रहूँगी,
आख़िरी सांस तक
इस शहर के काले करतूतों से
जूझती रहूँगी.

२. भगवान का उद्व्रजन 
वे भगवान थे...
हां, भगवान ही तो थे

ऊब गए थे
नगरवासियों से,
नफ़रत हो गई थी
इन्सानों से,
तब, चढ़ने लगे थे
ऊंचे-ऊंचे हत्यारे पहाड़,
भागने लगे थे
दुर्गम वनों, रेगिस्तानों में,
बनाने लगे थे अपने घर
हिम कंदराओं, पथरीली गुफाओं में
और सागर-महासागर के मध्यस्थ,
रहने लगे थे
जंगली जानवरों की पहरेदारी में,
छिपने लगे थे
घटा-छेदक पेड़ों की शाखाओं पर

क्यों ऊबने लगे थे
अपने अन्धभक्तों से वे
जो उनके दर्शन-सुख के लिए
अनुप्रस्थ भेद देते रहे हैं
नदी-नाले, पर्वत-पठार
और उत्तुंग शिखर,
बावले हो
उनके भजन-कीर्तन गाते
बुढ़ापा, बीमारी और दैहिक तापों पर
होकर सवार
चल पड़ते हैं हजारों मील--
दुर्भेद्य उत्तल-अवतल मार्गों पर
सिसकारियों को मुंह में दबोचे
और टींसते घुटनों में
इच्छाशक्ति की करेन्ट का
झटका देकर

आखिर, क्यों भगवान
त्रास देने लगा दूर जाकर,
अपनी भवितव्यता-संभाव्यता से
छल-प्रपंच करके,
अपनी दिव्यता की चकाचौंध से
आमन्त्रित करने लगा उसे

आह...
इतनी!
इतनी दूर से!!
खेलता है भगवान हमसे!!!
धकेल देता है--
पहाड़ों के नीचे
जमीन खिसकाकर
पैरों तले से--
भू-स्खलन भूस्खलन खेलकर,
या, कर देता है--
बादल-विस्फोट हम पर,
दौड़ा देता है--
तूफानों के खौफनाक घोड़े,
सत्संगी पंडालों को
अग्निवेदी बनाकर,
भर लेता है अपना पेट
मानावाहुति से--
दीर्घायु के कामनार्थियों को
अल्पायु के शूलों वाले खड्ड में
अकस्मात् धकेलकर

उसकी ध्वंस-क्रीड़ा से
कौन रोक सकेगा उसे?

वह शून्य से शून्य तक
यानी, अनन्त, अज्ञेय काल तक
लुढ़काता रहेगा
उल्काएं हमारी ओर,
फिर भी हम प्रार्थना करते रहेंगे
उसमें शत-प्रतिशत ध्वंसात्मक ईश्वरत्त्व से,
एक सच्चे झूठ से
सत्य होने का
गुहार-मनुहार करते रहेंगे--
पूरी श्रद्धा और कर्मकांडों से. 
 
३. मेरी मौत के बाद
मेरी मौत के बाद
वही सब रहेगा आबाद
यानी, जम्हूरियाई बाजार में
हुकूमत की मुनाफेदार दुकान
बेचती रहेगी
मुर्गियाँ हलाल,
होती रहेंगी
सफेदपोशों की जेबें गरम,
इलेकट्रानिक डिब्बे
उनकी हरामखोरी के
प्रशस्तिगान आलाप-आलाप
करते रहेंगे भेदों को आह्लादित
चन्द सड़कों, गली, चौबारों
कस्बों, नगरों, शहरों
के नाम बदलकर
महापरिवर्तन की वाहवाही लूटी जाएगी
और भोपाल, लातूर, ओडीसा, भुज में
चढ़े दान-दक्षिणाओं से
चन्द घर तब्दील होते रहेंगे
महलों, प्रासादों, शाही हरमों में

पतझड़ में
जमीन पर वैसे ही
अनाथ-अपाहिज पत्ते
खिसक-खिसक बजते रहते रहेंगे,
बरसात का गिरगिट
बूंदों की टांगों से
सर्र सर्र रेंगता फिरेगा,
बूढ़ी बाँझिन को अप्रत्याशित
माँ बनने के सुख की भाँति
बसंत सालों-साल
उसके गिने-गिनाए दांतों की सुराखों से
फिस्स फिस्स मुस्कराता जाएगा,
ठण्ड की बर्फीली कटार के
अनवरत प्रहार से
यमदूत को विहंस-विहंस
अंगूठा दिखाते
बेहया लावारिस बच्चे
प्लेटफार्मों पर स्वच्छंद लोटने
नालियों की शीतल बांह में
मीठी-मीठी नींद सोने
और सिर्फ
एक अदद
भूख की मार बरदाश्त करने
जैसा अपार सुख बटोरते ही रहेंगे
अपने चहेते ग्रीष्म से,
जो गली-कूचों
घरों-घाटों तक
अल्हड़ फिरता फिरेगा
फुसफुसाता, खिलखिलाता हुआ,
अर्थात छैल-छबीला मौसम
कभी क्लीन शेव में
कालेजगामी छोरियां छेड़ता फिरेगा
या, कभी हरी-पीली पगड़ी पहन
दाढ़ी-मूंछ बढ़ाए
खंडहरों में
बैसाखियों सहारे
भटकता रहेगा
और क्रिकेट खेलते बच्चों को
भूत-भय से सिहराता-सहमाता रहेगा
अथवा, सठियाए विधुर की तरह
खुद को
बासी-खट्टी जम्हाइयों में
व्यस्त रखकर
अपने सुखद दाम्पत्य की यादें
अपने संतोष के खाते में
आवर्ती जमा कर
सूद-दर-सूद
साल-दर-साल
बढ़ाता फिरेगा

मेरी मौत के बाद
नहीं थमेगी
उदारीकरण की बरसात,
वह ढहा देगी बाकी अधटंगा
सामाजिक समास,
घुस जाएगी यथासंभव कहीं भी
और बेटियां ही होंगी
सस्ता-सुलभ स्रोत
यौन-सुख की,
नारीत्त्व का फड़फड़ाता पंछी
नारी गात-गेह से रिहा हो
जा-उड़ छिपेगा
दन्त्य कथाओं के अरण्य में,
वाहियात बुढ़ापा
फ़िल्म और टी०वी० का
सबसे हंसोड़ कामेडी होगा
और रावणीय अट्टहास करता बचपन
अपने खून से लथपथ बघनखों से
अखबारों की सुर्खियाँ लिखते-लिखते
हादसों का महाकाव्य रचेगा

मेरी मौत के बाद
होगा सिर्फ एक अवसाद
कि मेरे अन्दर का
खूबसूरत पिटारा स्मृतियों का
ध्वस्त हो जाएगा
और स्वर्गस्थ माँ बिलख उठेगी--
'अब किस स्मृतिलोक में
अदेह विचरूंगी मैं?'
भले ही स्वर्ग की सुनहरी मुंडेरों से
उचक-उचक
झाँक-झाँक
मूसलाधार ममता बरसाने
चूमने, पुचकारने, दुलराने
लाडले की बाट जोहती माँ
अपनी पुत्रात्मा को
किसी दिन
समेट लेगी
अपने आँचल में;
पर, उसे तो ग्लानि ही होगी
कि मेरी मौत के बाद
आइन्दा इस धरती पर
वह शायद ही होगी आबाद. 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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