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बातचीत:''मीडिया घराने चाहते हैं कि गॉंव में इंटरनेट न जाए''-यशवंत सिंह

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, सितंबर 05, 2011 | सोमवार, सितंबर 05, 2011


हिंदी मीडिया के विश्व के सबसे बडे पोर्टल में शुमार भडास4मीडिया के संस्थापक यशवंतसिंह की बातों से विश्वास, आशा, नए जमाने को बदलने का माददा, लोगों के प्रति सहानुभूति, विस्तृत सोच, संतुष्टी का भाव, उर्जावान तथा नेतृत्व, वक्तृत्व कला और सादगी साफ झलकती है। राजस्थान के चित्तौड़ग़ढ में 4 सितंबर को हुई कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल सिंह से विशेष चर्चा हुई। प्रस्तुत है चर्चा के कुछ अंश।

भड़ास की उत्पत्ति कैसे हुई ?
ब्लाग बन रहे थे तो उस दौरान महसूस किया कि हिंदी में ब्लाग बनाना चाहिए। हिंदी में लिखना आसान है। हम जैसे लोग जब गॉंव की पृष्ठभूमि से आते हैं तो अंग्रेजी बोलने में हिचक होती है। पहले ई-मेल भी अंग्रेजी में भेजने में थोडा कष्ट होता था। मातृ भाषा में मेल करने की इच्छा होती थी, लेकिन फॉण्ट की समस्या थी जो बाद में यूनिकोड से दूर हो गई। उसके बाद दिल्ली पहूंचकर ब्लाग बनाना प्रारंभ किया। ब्लाग में हिंदी कैसे लिखी जाती है इसके लिए रतलाम के रवि रतलामी को मेल करके जानकारी हांसिल की। अलग से दिखने-लिखने की ललक के दौरान भडास नाम सामने आया। अंग्रेजी जानने वाले जिस प्रकार से कंधे उचकाकर अपनी बात रखते हैं उससे कही अच्छा अब हिंदी ब्लागर अपनी बात रख रहे हैं। इस  कम्प्यूनिटी ब्लाग में लोग जुड़ते गए और ब्लाग में बात गाली-गलौच, गुस्से तक सामने आने लगी। ऐसे में महसूस किया जाना लगा कि मीडिया के लिए एक पोर्टल की जरूरत है और उसी से भड़ास का जन्म हुआ जिससे आज 10 लाख से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं।

कानूनी पेचीदगियां भी होती है ?
इस समय 50 से ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं। जिससे 3-4 तो काफी गंभीर किस्म के हैं। हिंदुस्तान टाईम्स गु्रप ने 20 करोड़ का मानहानि का दावा किया है जिसमें उन्होंने 20 लाख रुपए कोर्ट फीस भी जमा करा दी है। हाल ही में साईबर एक्ट आया है जिसमें प्रावधान है कि किसी के खिलाफ गाली-गलौच नहीं कर सकते हैं, लेकिन ऐसे मामले में अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि ब्लागिंग खुलकर हो रही है और दूसरी चोर की दाड़ी में तिनके वाली बात है। छापने के पहले छानबीन की जाती है। जिसमें किसी की निजी जिंदगी में तांकझांक या व्यक्तिगत आक्षेप न हो इसका ध्यान रखा जाता है। सार्वजनिक स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार पर कोई बोलना चाहता है तो उसे कैसे रोकेंगे। हम छिपकर हमला करने वालों को हतोत्साहित करते हैं। कुछ मित्र नाम छिपाते हैं इसके लिए उनकी मजबूरियां होती है, लेकिन उन पर विश्वास होता है कि वे सच बोल रहे हैं। इसलिए उन्हें छापते हैं।

ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति काफी नाजुक है ?
देश के जो मीडिया घराने चाहते हैं कि गॉंव में इंटरनेट न जाए। यदि इंटरनेट जाए तो ब्राडबेंड न जाए। इन दिनों यूरोप में गॉंवों में इंटरनेटीकरण ठीक उसी प्रकार हो रहा है जिस प्रकार पहले विद्युतिकरण होता था। इसलिए अब हर गॉंव इंटरनेट से जुड़ेगा। इसमें बडे घराने रोडा बन रहे हैं उन्हें डर है कि आने वाले समय में हर कोई उनके भेद को जान लेगा। इंटरनेट से ग्रामीण भी भडास और विकिलिक्स के बारे में जान पाएंगे। वर्तमान में अधिकांश लोग अखबार पर निर्भर है और जो अखबार लिख रहा है वहीं माना जा रहा है। जाहिर है कि कार्पोरेट जगत की साजिश के चलते गॉंवों का इंटरनेटीकरण नहीं हो पा रहा है। आज भी ग्रामीणों की भेजी गई खबर से देश के बडा मीडिया हाउस चलता है। इस पर ग्रामीण संवाददाता को कोई सुविधा, सुरक्षा नहीं दी जाती है। वे अपने जान पर खेलकर या अपने गॉंव से दुश्मनी लेकर खबर भेजते हैं, जबकि दिल्ली में इस प्रकार कोई संकट नहीं है। इसलिए ग्रामीण पत्रकार महत्वपूर्ण और उनका एक संगठन बनना चाहिए। 

एक जिले में सभी अखबारों के 500 संवाददाता यदि दिल्ली के मीडिया हाउस के बाहर धरने पर बैठ जाए तो इसकी गूंज यूरोप तक पहुंचेगी। अब अगले दौर में मीडिया के भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया को आवाज उठाना होगी। आज मुझे लोग बुलाते हैं तो पहले ही बात देता हूँ  कि मालिक के खिलाफ बोलूंगा और उस अखबार में खबर नहीं छपेगी, लेकिन फिर भी लोग बुलाते हैं। वर्तमान में किसी भी प्रकार से डरने की जरूरत नहीं और अच्छा हो की सभी भयमुक्त होना सीख लें। जीवन में अब कोई लालसा नहीं है जिंदगी का मजा ले रहा हॅंू। साथ ही यह कहना है कि सच बोलना सीख जाईए। सच बोलने से कई मुसीबतें आती है, लेकिन उससे बहुत कुछ सीखते हैं। जो चीज 50 साल की उम्र में सीखनी है उसे अभी सीख लिया जाए। हम अपने पाप खोलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

आर्थिक संकट का सामना करना पडता है ?
देखिए बाजार के खिलाफ कोई भी काम करोगे तो आर्थिक संकट का तो आएगा। हम जन्म से उद्योगपति नहीं है। हमारे पिताजी कोई उद्योग नहीं छोड़ गए हैं या यह बताकर नहीं गए कि माल कैसे कमाया जाता है। अभी हम सीखने की अवस्था में है। खासकर हिंदीभाषी क्षेत्र दो बातें सिखाई जाती है कि बेटा नौकर बन जाओ। चाहे चपरासी या कलेक्टर। और इसमें भी लगता है कि यह एक साजिश है। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को अग्रेसिव बनना चाहिए। उनके पास एक लाख ऐसे अवसर है जिससे लाखों रुपए कमा सकते हैं। प्रारंभ में हमे भी साईट को चलाने में आर्थिक संकट का सामना करना पडा और विकिलिक्स की जैसे ही हमने भी आर्थिक मदद मॉंगी। जिसमें राजनांद गॉंव के एक किसान के लड़के ने 1000 रुपए की सहायता की थी। अपनी साईट पर हम अपने खिलाफ भी छापते हैं। यह स्वस्थ्य परम्पराएं पत्रकारिता में पहले हुआ करती थी। जब प्रभाष जोशी जैसे सम्पादक थे। अब तो बौने किस्म के संपादक हैं जो लाईजनिंग करते हैं उनसे अपनी आलोचना बर्दाश्त ही नहीं होती है। 

मीडिया मेन स्ट्रिम की स्थिति क्या है ?
इंडिया न्यूज के अतुल अग्रवाल ने पत्रकारिता के पेशे को लेकर बहुत साफ-साफ कहा। इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। मेन स्ट्रीम में होने के बाद इस प्रकार से साफ शब्दों में कहना बहुत कम लोगों के बस की बात है। उन्होंने स्पष्ट कि वहां एक लाख, पॉंच लाख या 10 लाख रुपए पाने वाले सम्पादक हैं और उन्होंने उस सुविधा को बढ़ा लिया है। जब सुविधा को नहीं छोड़ते हो तो समझौते करते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक बिल्डर सम्पादकों के लिए कॉलोनी बना रहे हैं। जिसमें अधिकांश सम्पादकों ने बुकिंग कराई है। उस कालोनी के मकान के बारे में कहा जा रहा है कि उसकी कीमत एक करोड़ है, लेकिन उसे सम्पादकों को 70-80 हजार में दिया जा रहा है। कई सम्पादकों ने वहॉं 4-4 मकान बुक कराए हैं और हजारों रुपए की मासिक किश्तें भर रहे हैं। ऐसे लोगों के पास बडी-बड़ी गाड़ियां हैं। अब सम्पादकों ने काफी पैर फंसा लिए हैं। इतना ही नहीं सम्पादकों ने कंपनी के विजन को अपना लिया है जिसमें कंपनी को लाभदायक स्थिति में रखना जरूरी है और उसी अनुसार वे धंघे करते हैं। श्री अग्रवाल ने वहीं बात रखी है। ऐसा हर दौर में होता है, लेकिन भ्रष्ट राजनेता भारी मात्रा में है तो ईमानदारों की भी एक फौज है। भ्रष्ट प्रशासक भारी मात्रा मंे है तो ईमानदार अफसरों की भी एक फौज है। 

भडास और पत्रकारिता का भविष्य कैसा है ?
भडास है ही इसलिए कि पत्रकारिता खराब है। जब पत्रकारिता सुधर जाएगी तो भडास अपने-आप खत्म हो जाएगी। यह एक टाईम फेज की बात है, लेकिन यह भी तय है कि मेन स्ट्रीम पत्रकारिता कभी सुधरेगी नहीं। प्रकृति का नियम संघनन और विस्फोट। थ्योरी यही कहती है कि सभी चीजे संधनित होगी और फिर विस्फोट के साथ बिखर जाएगी। तो यह पूंजीकरण का संघनन है और 30-40 साल में इसमें विस्फोट होगा। इसके बाद भी मानव जीवन को समझना चाहिए। एक-दूसरे के काम आना चाहिए। दूसरा व्यक्ति कैसे सुखी रहे यह सोचना चाहिए। यह मतलब थोडे ही है कि 18 घंटे काम करें और एक दिन मर जाए। मानव के पास दुनिया का सबसे अच्छा मस्तिष्क है और हम आए इसलिए कि हम प्रकृति का लुफ्त उठाएं। यह जन पक्षधर पर चर्चा चलती रहेगी।  


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

दिनेश प्रजापति नीमच केंट
स्ट्रींगर्स एंड पीटीसी 9425107010
प्रसार भारती, भोपाल 07423230999
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