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'' दूसरे नम्बर के स्थान का वरण करने को विवश करती अंग्रेज़ी''-डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, सितंबर 10, 2011 | शनिवार, सितंबर 10, 2011

हिन्दी के बारे में इसे एक सौभाग्यपूर्ण स्थिति कहा जाना चाहिए कि आज राष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क भाषा के रूप में उसका स्थान लेने का दावा कम से कम कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं करती। इसके कुछ कारण जहाँ ऐतिहासिक हैं वहीं शायद इसका सबसे बड़ा कारण आज भी भारत में इसके बोलने वालों की संख्या का सर्वाधिक होना है। हमारे स्वाधीनता आन्दोलन के दौर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु जो व्यापक प्रयास हुए उनका प्रभाव भी शायद इस संबंध में हमारी बाद वाली उपेक्षा के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हो गया है।
हिन्दी के अतिरिक्त यदि अन्य कोई भाषा आज भी राष्ट्रीय स्तर पर हमारी सम्पर्क भाषा बनने का दावा करती है तो वह केवल अंग्रेज़ी है और यह निर्विवाद है कि अंग्रेज़ी उस भूमिका का निर्वाह कभी भी सफलतापूर्वक नहीं कर सकती। अंग्रेज़ी के जो हिमायती यह कहते हैं कि हमारे यहाँ कई लोगों द्वारा उसका प्रयोग किए जाने के कारण उसे भी क्यों नहीं इस देश की भाषाओं में से ही एक गिना जाए, वे शायद यह भूल जाते हैं कि किसी भाषा और उसके बोलने वालों के बीच सम्बन्ध शरीर और वस्त्र का न होकर शरीर व त्वचा का होता है। भाषाएँ कमीज़ें नहीं हैं जिनमें से एक को उतार कर आसानी से दूसरी पहनी जा सके। भाषा अभिन्न रूप से उसे बोलने वालों के समूचे इतिहास तथा उनकी सामाजिक व सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ी रहती हैं और इसीलिए किसी देश का काम कभी पूरी तरह किसी विदेशी भाषा से नहीं चल सकता । जिस संस्कृति और विश्व-दृष्टि को किसी एक देश की भाषा अभिव्यक्त करती है उसे किसी अन्य देश की भाषा बहुत प्रयत्न करके भी पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर सकती। अपने समान दूरी के संबंधों में चाचा, मामा, मौसा, फूफा आदि विभिन्न संबोधनों से भेद करने वाले और अपने पत्रों को ‘पूज्य पिताजी‘ के संबोधन से प्रारंभ करने वाले लोगों के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग कई प्रकार की दिक्कतें पैदा करता है। वैसे भी किसी विदेशी मूल की भाषा पर आश्रय व्यक्ति को परावलंबी बना कर उसे जानबूझ कर स्थायी रूप से दूसरे नम्बर के स्थान का वरण करने को विवश करता है। 

शिक्षा के क्षेत्र में किसी विदेशी भाषा पर निर्भरता तो हमारे देश के लिए और भी घातक है क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली पहले से तथ्यों को समझने और उन्हें अपने परिवेश से जोड़ने के लिए प्रेरित करने के बजाय केवल उन्हें रट कर परीक्षा में समुद्धृत मात्र कर देने के दोष से ग्रसित है। ऐसी स्थिति में शिक्षा के माध्यम के रूप में किसी ऐसी विदेशी भाषा का प्रयोग जिसके कि जानकारों की संख्या इस देश में बराबर कम होती जा रही है, हमारी शिक्षा के इस दोष को जानबूझ कर बढ़ावा देने और इस तरह हमारी शिक्षा को और अधिक निरर्थक बनाने का ही काम कर सकता है।

   पर भारत में अंग्रेज़ी की सबसे ख़तरनाक भूमिका हमारे यहाँ एक प्रकार के द्विजत्व को बढ़ावा देकर लोगों के बीच बौद्धिक व सामाजिक  गैरबराबरी कायम रखने की है। किसी भी जनतांत्रिक व समतावादी समाज के लिए इस प्रकार की गै़रबराबरी को केवल अनैतिक व प्रतिक्रियावादी ठहराया जा सकता है। हमारे समूचे राष्ट्र को एक इकाई के रूप में देखने वाले किसी भी व्यक्ति को हमारे यहाँ अंग्रेज़ी पर निर्भरता या उसके प्रति मोह ‘सं गच्छध्वं, सं वदध्वं‘ की हमारी मूलभूत भावना के विपरीत लगेगी। 

भाषा प्रयोग के मूल में सदैव एक नैकट्य प्रदर्शन की भावना रहती है। जब आप एक जैसी भाषा बोलने वाले किन्हीं लोगों के बीच किसी व्यक्ति विशेष से बातचीत में किसी अन्य भाषा का प्रयोग करते हैं तब आप स्पष्टतः उस व्यक्ति के साथ अपना अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रिश्ता बताना चाहते हैं। अब यदि यही बात अंग्रेज़ी पर लागू करके देखी जाय तो हम पाएँगे कि अंग्रेज़ी बोलने वाला सामान्यतः अपना संबंध जहाँ सामाजिक, आर्थिक या बौद्धिक रूप से अधिक सम्पन्न व ऊँचे लोगों के साथ जोड़ना चाहता है वहीं वह पिछड़े व ग़रीब लोगों से अपना अलगाव भी प्रदर्शित करना चाहता है। अंग्रेज़ी के जानकार के सामने  अपनी भाषा बोलने में जैसे उसे यह सोच कर संकोच होता है कि उसे बोलने वाले उसके रिश्तेदार ग़रीब और पिछड़े लोग हैं। विडंबना यह है कि ये ग़रीब और पिछड़े लोग अपनी प्रगति के लिए आदर और उम्मीद से अपने जिस संबंधी की ओर देखते हैं उसी को वे अंग्रेज़ी केे मोह से बंधा पाते हैं। इस बात का वरना क्या अर्थ है कि लालू प्रसाद यादव जैसे समाजवादी नेता को भी आज अंग्रेज़ी छोड़ते हुए डर लगता है और वे  अंग्रेज़ी की जगह अपने राज्य में हिन्दी को बढ़ावा देने के फैसले केे कुछ वर्षों बाद ही इस फैसले को अपनी भूल मान कर उस पर पश्चाताप करने लगते हैं और अपनी शिक्षण संस्थाओं में फिर से अंग्रेज़ी के प्रवेश की हिमायत करने लगते हैं। स्पष्ट है कि सच्ची समाजवादी भावना से अपने राज्य में सभी को एक साथ आगे बढ़ाने की इच्छा करने के बजाय अब वे भी उसके चंद अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे लोगों को ही दूसरों के मुक़ाबले आगे रखने की चिन्ता करने लगे हैं। वे अब भी अपनी कल्पना में रोज़गार के उसी बाज़ार को देखते हैं जिसमें अंग्रेज़ी के जानकार को गैर जानकार के मुकाबले तरज़ीह मिलती है। एक हिन्दी भाषी राज्य के शासक के रूप में वे उस रोज़गार बाज़ार के निर्माण की दिशा में प्रयत्न नहीं करना चाहते जिसमें किसी व्यक्ति का हिन्दी प्रयोग उसे रोज़गार या उन्नति के अवसरों से वंचित नहीं करता। 

जो लोग बार-बार यह कहते हैं कि इतने वर्षों से भारत में बोले जाने के कारण क्या अंग्रेज़ी भी इस देश की ही एक भाषा नहीं हो गई हैं उनसे सीधे यही पूछा जाना चाहिए कि हमारे यहाँ अंग्रेज़ी आज भी समाज के किस वर्ग की भाषा है? यदि हमारे देश के सभी विद्वानों, विचारकों व लेखकों की भाषा केवल  अंग्रेज़ी बनी रही तो उनके विचारों का लाभ या तो उन्हीं जैसे इस देश के अन्य अंग्रेज़ी जानने वालों को मिलता रहेगा या फिर विदेशियों को। यदि उस देश के अन्य अंग्रेज़ी न जानने वाले किन्तु ऊपर उठने की इच्छा रखने वाले सामान्य व्यक्ति को इन अंग्रेज़ी भाषी विद्वानों, विचारकों व लेखकों की विद्वत्ता का लाभ नहीं मिल पाए तो देश के उत्थान में इनका क्या योग रहेगा?

इन विचारकों, लेखकों व विद्वानों को भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क हेतु जब तक विदेशियों द्वारा सुविकसित एक भाषा उपलब्ध रहेगी तब तक वे क्यों किसी अन्य भारतीय भाषा को सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित करने की चेष्टा करेंगे? हमारे स्वाधीनता आंदोलन के समय जिस तरह स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए विदेशी वस्त्रों की होली जलाना आवश्यक समझा गया था उसी तरह लगता है आज एक राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा की उन्नति के लिए अंग्रेज़ी की होली जलाना आवश्यक हो गया है। भारत में अंग्रेज़ी के प्रयोग को समाप्त किए बिना राष्ट्रीय सम्पर्क की किसी भारतीय भाषा में नये शब्दों व नई अभिव्यक्तियों का निर्माण यथेष्ठ मात्रा में कभी नहीं हो सकेगा। 

    इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हिन्दी के प्रति हमारी अब तक की उपेक्षा व लापरवाही के बावजूद इसका प्रचार-प्रसार निरन्तर बढ़ता ही गया है। इसका श्रेय चाहे गांधी को जाए, सिनेमा को जाए, पर्यटन को जाए या दूरदर्शन को- हमें यह मानना ही पड़ेगा कि आज भारत के किसी भी राज्य में हिन्दी समझने वालों की संख्या पहले के मुक़ाबले ज़्यादा है और वहाँ अंग्रेज़ी का गै़र जानकार सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी का ही सहारा लेता है। आवश्यकता इस बात की है कि अब तक हिन्दी का जो प्रचार-प्रसार अचेतन व अनियोजित रूप से हुआ है उसे आने वाले समय में हिन्दी-प्रेमी सचेतन व सुनियोजित रूप से करने का बीड़ा उठाएँ। किसी धर्म के प्रचार हेतु मिशनरी जिस तरह ख़तरे उठा कर और कष्ट पाकर भी बाहर जाते रहे हैं उसी तरह आज हिन्दी के मिशनरियों को हिन्दी सिखाने के लिए बड़ी संख्या में अन्यत्र जाना होगा। कोई भी भाषा तब तक सम्पर्क भाषा नहीं बन सकती जब तक उसे बोलने-समझने वाले बड़ी संख्या में अन्यत्र भी उपलब्ध न हांे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी यदि आज भी कई लोगों के लिए सम्पर्क भाषा का काम कर रही हैं तो इसके पीछे उन विद्वानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जिन्होंने इसे विदेशों में सीखने वालों के लिए सरल व बोधगम्य बनाया। एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी, डेनियल जोन्स के उच्चारण कोश और ई.एल.बी.एस. की हर विषय से संबंधित सस्ती पुस्तकों ने अंग्रेज़ी को अन्यत्र लोकप्रिय बनाए रखने में भारी मदद की है। इस दृष्टि से यदि हिन्दी की ओर दृष्टिपात करें तो हम पाएँगे कि ग़ैर हिन्दी भाषियों की रुचि हिन्दी में जागृत करने तथा इस रुचि को बराबर बनाए रखने के लिए हम हिन्दी भाषियों ने बहुत अधिक प्रयत्न अब तक नहीं किए हैं। हिन्दी का साधारण जानकार आज हिन्दी सीखने की इच्छा रखने वाले को तुरन्त किन्हीं सस्ती, सर्वविदित व सर्वसुलभ पुस्तकों के नाम नहीं सुझा सकता। 

जैसा कि मैंने ऊपर कहा कोई व्यक्ति किसी भाषा का प्रयोग अपना भाईचारा प्रकट करने के लिए करता है। हमारे यहाँ बड़े लोगों के साथ भाईचारा प्रकट करने का एक तरीका उनके साथ अंग्रेज़ी में बात करना भी है। बड़े लोग यदि अपनी बातचीत में अंग्रेज़ी के बजाय हिन्दी का प्रयोग करें तो इससे निश्चय ही सभी जगह हिन्दी का प्रचार बढ़ेगा। अन्य राज्यों में यदि हिन्दी के जानकार को रोज़गार बाजार में तरज़ीह मिले तो इससे भी हिन्दी के प्रति रुचि जागृत होगी। आज भी किसी व्यक्ति को अंग्रेज़ी बोलते देख सामान्यतः सुनने वालों के चेहरे पर प्रशंसा के भाव प्रकट होते हैं और परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी बोलने वाला अंग्रेज़ी बोलने के लिए प्रोत्साहन पाता है। जिस दिन भारत में किसी को अंग्रेज़ी का प्रयोग करते देख अधिकतर लोगों की त्यौरियाँ चढ़ेंगी उसी दिन हमारे यहाँ व्यक्ति को अंग्रेज़ी के प्रयोग में  संकोच होगा। राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए विदेशी भाषा के बजाय हिन्दी के प्रयोग के लिए भारत में तभी वातावरण सर्वाधिक उपयुक्त व अनुकूल होगा।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: सितम्बर, 1993 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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