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समय के बयानती डा.मनोज श्रीवास्तव की कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, सितंबर 08, 2011 | गुरुवार, सितंबर 08, 2011


वयस्क बच्चे 

खुशफहमी नहीं होनी चाहिए  
कि बच्चे ज़रूरत से ज्यादा
सयाने हो गए हैं
कि वे बलखाती कमर
और उत्तल उरोज पर
फब्तियाँ कसने लगे हैं

अगर आप पिता हैं
तो उन्हें बरजिए कि
वे बचपन की मुंडेर
लांघकर
बालिगपन के
समुद्री भंवर में
अपने पैर डालने की
गुस्ताखी न करें

अगर आप मां हैं
तो उनके बचपन के पहिए को
हौले-हौले रफ्तार दें
कि वे आपको चुनौतियाँ न देने लगें
और उन्हें छू पाना
आपके वश के बाहर हो

कश्मीर होता जा रहा हूँ

मैंने जिन हथेलियों में
अपना चेहरा छिपाया,
उनसे तेज़ाब पसीज रहा था
और मेरा चेहरा
लहूलुहान होता जा रहा था,
जिस पेड़ की शाख पर
अपनी कमर टिकाई,
वह जमीन से उखड़कर
जड़हीन था,
जिस पत्थर पर सुस्ताने बैठा
वह हवा में कंपकंपाते हुए तैर रहा था,
जिस टूटते सितारे से
उर्ध्वमुख मन्नते मांग रहा था,
उसका निशाना सीधा मेरी ओर था,
चलते-चलते थक-हारकर
जिस राहगीर की बांहों की बैसाखी थामी
वे कंधों से टूटी हुई थीं

इसलिए,
इस क्षणभंगुरता के मद्देनज़र
मुझे चौकन्ना होना ही था
अगले कुछ घंटेकुछ दिन
कुछ सप्ताहकुछ माह
कुछ वर्ष और कुछ दशक तक,
देह-देश के दूरस्थ प्रदेशों के
दुर्गम गली कूचों में
ऊर्जा का संचार करते हुए

परयह क्या!
मैं तो सिर्फ खड़ा लुढ़क रहा हूँ,
किसी अपार शक्ति से
निस्तेज हुआ जा रहा हूँ,
सारी ऊर्जाएं मेरे ऊपर से बह जा रही हैं
मेरा बल मेरी पकड़ से कश्मीर होता जा रहा है,
मैं न तो कोई राष्ट्र बन पा रहा हूँ
न ही इसका कोई स्थिर राज्य.


कविताओं से बाहर जीने के दौर में  

अब कविताओं में
नहीं जी रहे हैं लोग,
बदलाव चाहते हैं वे
कोठियों को छोड़
फ्लैटों में बस रहे हैं लोग

क्या हश्र होगा
हवादार और प्रदूषणमुक्त
कविताओं से बाहर
शहरी आबोहवा की
घुटन और उबन में जीने का?

इसका मतलब यह है कि
परित्यक्त कवितायेँ
भुतहे खँडहर में तब्दील हो जाएँगी,
विकास के नाम पर 
खंडहरों पर काल-कारखाने उगेंगे,
कवितायेँ ज़मींदोज़ हो जाएँगी
विकास की भेंट चढ़ जाएँगी

अहम् सवाल यह है कि 
कविताओं में वापस आने वाले लोग
कहाँ ज़मीन तलाशेंगे?
चप्पे-चप्पे पर विकास की
इमारत खड़ी होगी,
पुरातत्त्ववेत्ता कब्र में समाई
कविताओं के लिए 
उत्खनन अभियान 
कुछ सदियों तक 
चलाएंगे या नहीं?


तरल तथ्यों के दौर में

तथ्यात्मकता इतनी तरल हो चुकी है 
कि उन्हें भावों में समेटना
और समेटकर
बतौर ठोस आदर्श  
बांचना-आलापना
दूभर हो गया है

इस तरल दौर में
कवियों से कह दो
कि वे चाट-मसाले
की गुमटियां लगा लें

नाटककारों से कहा दो
कि वे कोई और धंधा कर लें
यानीपान-मसाला बेचें
यापाठशालाओं के गेट पर चूरन

उपन्यासकारों से नहीं कहूंगा
के वे आत्महत्या कर लें,
लिहाजावे गाँवों के
खेत-खलिहानों में
खेतिहर मज़दूर बन जाएं
और अपने बच्चों से कह दें
कि वे उन बच्चों से
लंगोटिया याराना निभाएं
जिनमें शनै: शनै:
छात्र-नेतागुंडाडान और नेता
बनने के अच्छे लच्छन मौजूद हैं. 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)

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