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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-10

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 09, 2011 | रविवार, अक्तूबर 09, 2011


विश्वास
मुश्किलों से लडऩे के लिए
कोई अस्त्र नहीं है मेरे पास
अस्त्र के नाम पर
सिर्फ एक विश्वास है
हर लड़ाई में मैं
उसे ही बचाने की कोशिश करता हूं
क्योंकि यही मुझे बचाये रखता है ।

हर आने वाली मुसीबत
उसकी गतिविधिय़ॉं
असामान्य होती हैं
दूर से पहचानना
बहुत मुश्किल होता है
या तो वह कोई बाढ़ होती है
या तो कोई तूफान
या फिर अचानक आई गन्ध

वह अपने आप
अपना द्वार खोलती है और
बिना इजाजत प्रवेश कर जाती है

फिर भागते रहो
घंटों छुपते रहो इससे
जब तक वह दूर नहीं चली जाती
हमारे मन से

बचा रह जाता है
उसके दुबारा लौट आने का भय।



शोर
अलग.अलग
होता सबको शोर .
भीड़ का
रोने का
बहते पानी का और
गुस्से का
थक जाता जब
सारा शोर
शांति होती है
सबकी एक जैसी ही ।




टोपी
तरह.तरह की टोपियॉं
हमारे देश में
सबका एक ही काम
सिर ढकना
. नहीं एक और काम
विभाजित करना
लोगों को
अलग.अलग समुदायों में ।


पहले और बाद
शिकार के पहले
वे घोर दुश्मन
 . बन्दूक और शेर
बाद में अच्छे दोस्त .
एक साथ
दीवार पर सजे

कॉंटा
एक बार नहीं अनेक बार
वह घुसा है चोर की तरह
तालाब के शान्त पानी में
और देखते.देखते
चुराकर लाया है एक मछली
बहुत सारी मछलियों के झुण्ड से
फिर भी अनजान रहीं मछलियॉं
चुप रहीं मछलियॉं
थामा उसका हाथ हमेशा
कोई अपना प्रिय समझकर


रेगिस्तान
मैं बढ़ रहा था
रेगिसतान के टीलों की तरफ
एक बेहद मुश्किल यात्रा में .
चारों ओर आग ही आग जल रही थी
शायद बहुत भूखी होंगी यहॉं आत्माएं
वे मेरा मांस.खून सब रेत पर चने की तरह
भूनकर खा जाना चाहती थी
मैं बार.बार अपने शरीर पर पसीना छिडक़ता
और किसी तरह से अपना बचाव करता
मैं सूखता जा रहा था कपड़ों की तरह
और दूर.दूर तक पानी नहीं था प्यास बुझाने को
मुझे जोरों की भूख लग रही थी और
वहॉं रोटी नहीं थी न ही इसे पकाने वाले हाथ
उधर सूरज रोटी का रूप धरकर
बादल पानी की तरह
मेरी भूख.प्यास और ज्यादा बढ़ा रहा था
हवाएं तेज हो गयी थीं
ऑंधियॉं चल रही थीं और इस आग की राख
उड़. उडक़र चारों तरफ फैल रही थी
जो देखते. देखते ऊँचे. ऊँचे ढेरों
में तब्दील हो गयी ।
मैं समझ गया यह एक अशुभ जगह है
थोड़े से स्पर्श से धॅंसती रेत
आश्रय नहीं दे सकेगी मुझे
यहॉं जीना लगभग असंभव है
मैं वापस नीचे की ओर बढऩे लगा
अपने छोड़ आये पॉंवों के निशान के सहारे
सूरज भी डूबने लगा था पीछे की तरफ
अपने नियमित पथ पर
अचानक मेरी नजर पड़ी
बहुत सारी बबूल की झाडिय़ों पर
जिन्हे  मजे से खा रहे थे दो.तीन ऊँट

घास 
घास जन्म लेती है
मिट्टी से फूटकर
लिये इच्छाएं
चॉंद छूने की
लेकिन समय के साथ
कभी काट दी जाती है
तो कभी कुचल दी जाती है
या फेंक दी जाती है
उखाड़ कर दूर कहीं ।

कोई नहीं सोचता
इनके नन्हें से मन का दर्द
न ही कोई झॉंकता
इनके चेहरों की तरफ
यहॉं तक कि बड़े पेड़ भी
रहने नहीं देते इन्हें
अपनी छाया के आस.पास

हर बार लोगों के
मुंह से निकल
गुस्से की पी खाकर
सो जाती है बेचारी
बिना किसी शिकायत के
चुपचाप ।



पेड़
पत्ते झडऩे से पहले
रंग बदल लेते हैं अपना
एक रुखा पीलापन. सा
झलकता है उनके चेहरे में
फिर खोलकर अपने पॉंव
उड़ जाते हैं हवा में
पेड़ वहीं का वहीं रहता है खड़ा
सामथ्य॔नवान  ।

सब कुछ मौन है
सुन्दर दृश्योंए चूमता हूं मैं तुम्हें
और तुम खत्म नहीं होते कभी
थक जाता हूं मैं
खत्म हो जाते हैं मेरे चुम्बन
कुहासा खोलता है दृश्य पर दृश्य
जैसे हम उनके पास जा रहे होंए लगातार
सारी खिड़कियां खुल गयी हैं मन की
इनमें सब कुछ समा लेने की इच्छा जागृत
कोई तेज घुड़सवार आ रहा है मेरी तरफ
और बड़ी मुश्किल से संभालता हूं मैं अपने आपको
इस उबड़.खाबड़ जमीन से।
यहां पत्थरों में अभी भी हल्की बर्फ जमी हुई है
भेड़ों के लिए आजाद दुनियाए हरे.भरे मैदान की
गड़ेरिया अपनी पुरानी वेष.भूषा में टहलता हुआ
करता है आंखों से मुझे मौन सलाम
और सब कुछ मौन है यहां
फिर भी मुझसे बातें करता हुआ लगातार


 तुम्हारे न रहने पर
थोड़ा.थोड़ा करके
सचमुच हमने पूरा खो दिया तुम्हें
पछतावा है हमें
तुम्हें खोते देखकर भी
कुछ भी नहीं कर पाये हमए
अब हमारी ऑंखें सूनी हैंए
जिन्हें नहीं भर सकतीं
असंख्य तारों की रोशनी भी
और न ही है कोई हवा
मौजूद इस दुनिया में
जो महसूस करा सके
उपस्थिंति तुम्हारीए
एक भार जो दबाये रखता था
हर पल हमारे प्रेम के अंग
उठ गया हैए तुम्हारे न रहने से
अब कितने हल्के हो गये हैं हम
तिनके की तरह पानी में बहते हुए ।




योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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