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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-11

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 09, 2011 | रविवार, अक्तूबर 09, 2011


सड़े हुए फल
इन्हें चिडिय़ॉं भी न खा पायीं
न ही चख पाया
आदमी इसका स्वाद
केवल पड़ा रहा सामने
बेचैनी बनकर।


तरबूज
जब उसे काटा गया
दो टुकड़े में
होंठ दिखला. दिखलाकर
हॅंस रहा था वह
फिर उसे काटा गया
अनेक टुकड़ों में
अब वह मुँह फाड़.फाडक़र
हॅंस रहा था
धडऩुमा थाल में ।


इन्तजार
अनगिनत अमरुद लगे हैं
हमारे घरवाले पेड़ पर
वे लटके हुए हैं डालियों पर
हरे तोते की तरह
भीतर से जिनके
एक मीठी.सी गन्ध
लगी है अब मुह खोलने
शायद दो.तीन दिनों में
पक जायेंगे ये अच्छी तरह से
और बहने लगेगा स्वाद
हमारी जीभों पर
हम बेसब्री से कर रहे हैं
उस दिन का इन्तजार
और आस.पास के पक्षी
उस पर चोंच मारने का ।



पत्नी के जन्म दिन पर
कविता न लिख पाया
जो लिखनी थी
आ गया पहले ही
तुम्हारा जन्मदिन
पूछता कहॉं है.
वह तोहफा
शब्दों से भरा
वाक्यों से सजा
थरथरा रहे
जिसे पाने हेतु
मेरे होंठ
रोमांच जाग रहा
कौतूहल की मॉंद में
मॉंग भी चमक रही
चेहरा भी हुआ लाल
कहॉं है वह घ्
सुनकर तेरी बातें
ऑंखें मेरी झुक आयीं
कविता लगी
पंख फडफ़ड़ाने
किन्तु लिखूँ किस भाव से
जब सब कुछ
सौंप दिया है तुम्हें आज ।

विडम्बना

यह विडम्बना थी कि
इन सुंदर दृश्यों को छोडक़र
वापस मुझे आना होता था
मेरे ठहराव में उतनी गहराई नहीं थी
कि स्थापित कर लेता मैं वहींए अपने आपको
केवल उनके रंगों से रंगता अपने आपको
और धीरे.धीरे वापस लौटने पर
चढ़ जाते थे इन परए दूसरे ही रंग।
फिर भी मैंने कभी सोचा नहीं
एक जगह चुपचाप रहना ही अच्छा होगा
बल्कि फिर से तलाशी दूसरी धरती
और पाया ये भी वैसे ही हैं
पृथ्वी के रंगीन टुकड़े।
जीवन सभी जगह पर रह सकता था
क्या तो कठोरता में या क्या तो तरलता में
और जहां दोनों थे
वहीं अद्भुत दृश्य बन सके
और हमें दोनों से तादात्म्य बैठाना था।



हक
प्रकृति की सुंदरता पर किसी का हक नहीं था
वो आजाद थीए इसलिए सुंदर थी
एक खूबसूरत चट्टान को तोडक़र
दो नहीं बनाया जा सकता
ना ही एक बकरी के जिस्म को दो।
इस धूप को कोई नहीं रोक सकता था
धीरे.धीरे यह छा जाती थी चारों तरफ
इसलिए इसके भी दो हिस्से नहीं हो सकते
और जो हिस्से सुंदर नहीं थे
वे लड़ाईयों के लिए पहले ही छोड़ दिये गए थे।

खुशियां
मुझे थोड़ी सी खुशियां मिलती हैं
और मैं वापस आ जाता हूं काम पर
जबकि पानी की खुशियों से घास उभरने लगती है
और नदियां भरी होंए तो नाव चल पड़ती है दूर.दूर तक।

वहीं सुखद आवाजें तालियों की
प्रेरित करती है नर्तक को मोहक मुद्राओं में थिरकने को
और चांद सबसे खूबसूरत दिखाई देता है
करवां चौथ के दिन चुनरी से सजी सुहागनों को

हर शादी पर घोड़े भी दूल्हे बन जाते हैं
और बड़ा भाई बेहद खुश होता है
छोटे को अपनी कमीज पहने नाचते देखकर

एक थके हुए आदमी को खुशी देती है उसकी पत्नी
घर के दरवाजे के बाहर इंतजार करती हुई
और वैसी हर चीज हमें खुशी देती है
जिसे स्वीकारते हैं हम प्यार से।
 
पूजा के बाद
पूजा के बाद हमसे कहा गया
हम विसर्जित कर दें
जलते हुए दीयों को नदी के जल में
ऐसा ही किया हम सबने।
सैकड़ों दीये बहते हुए जा रहे थे एक साथ
अलग.अलग कतार में।
वे आगे बढ़ रहे थे
जैसे रात्रि के मुंह को थोड़ा.थोड़ा खोल रहे होंए प्रकाश से
इस तरह से मीलों की यात्रा तय की होगी इन्होंने
प्रत्येक किनारे को थोड़ी.थोड़ी रोशनी दी होगी
बुझने से पहले।
इनके प्रस्थान के साथ.साथ
हम सबने आंखें मूंद ली थी
और इन सारे दीयों की रोशनी को
एक प्रकाश पुंज की तरह महसूस किया था
हमने अपने भीतर।


नये घर में प्रवेश
वषो॔ से ताला बन्द था
उस नये घर में
कोई सुयोग नहीं बन रहा था
यहाँ रहने का
आज किसी शुभ हवा ने
दस्तक दी और खुल गये इसके द्वार
देखता हूँ ए बढ़ रहा है
इसमें रहने को छोटा.सा परिवार
माता.पिता बच्चों सहित
साथ में दादा.दादी
सभी खुश हैं
आज पहली बार खाना बनेगा
इसके रसोई घर में
छोंकन से महकेगा सारा घर
कुछ बचा.खुचा नसीब होगा
आस.पास के कुत्तों और पक्षियों को भी
कुछ पेड़.पौधे भी लगाये जाएँगे
साथ में तुलसी घर भी होगा आँगन में
पिछवाड़े में होंगे स्कूटर और साइकिल
और एक कोने में स्थापित होंगी
ईश्वर की कुछ मूर्तियाँ ।
कुछ ऊँचे स्वर भी सुनाई देंगे
कभी.कभार दादा के
जो बतायेंगे  
अभी घर की सारी सुरक्षा का भार
उन्हीं के सिर पर है।

दुनिया के सारे कुएँ 
मँडरा रहा है यह सूरज
अपना प्रबल प्रकाश लिए
मेरे घर के चारों ओर
उसके प्रवेश के लिए
काफी है एक छोटा सा सूराख ही
और जिन्दगी
जो भी अर्जित किया है मैंने
उसे बहार निकाल देने के लिए
काफी होगा एक सूराख ही
और प्रशंसनीय है यह तालाब
मिट्टी में बने हजार छिद्रों के बावजूद
बचाये रखता है अपनी अस्मिता
और वंदनीय हो तुम दुनिया के सारे कुओं  
पाताल से भी खींचकर सारा जल
बुझा देते हो प्यास हर प्राणी  की ।



योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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