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12 वां राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन:-हाशिये के लोग: हाशिये की संस्कृति

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, अक्तूबर 13, 2011 | गुरुवार, अक्तूबर 13, 2011

आधुनिकता के विमर्श ने हमें मुख्यधारा और हाशिये की अवधारणाएं दी हैं। इसके परिप्रेक्ष्य में स्वतन्त्र भारत में लोकतन्त्र की स्थापना और राज्य का कल्याणकारी स्ववरूप है। आधुनिकता के साथ विकास की अवधारण को हमने जोड़कर देखा और अपने संविधान में इसे राज्य के कल्याणकारी स्वरूप के साथ सम्बद्ध किया। इसी क्रम में हम देखते हैं कि व्यापक भारतीय समाज का जो हिस्सा आधुनिकता के प्रवाह में शामिल हो गया,उससे मुख्यधारा निर्मित होती गयी और बाकी हिस्से हाशिये के समुदाय होकर रह गये। विडम्बना यह रही कि मुख्यधारा की तुलना में हाशिये के समुदायों का दायरा कहीं वृहद रहा है।

लोकतन्त्र और राज्य की कल्याणकारी अवधारणा के चलते हमने वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाने का संकल्प सामने रखा। इसी के चलते संविधान में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए सकारात्मक विभेद और वंचित तबकों के लिए आरक्षण जैसे विशेष प्रावधान किये गये। विडम्बना यह है कि इस सबके के बावजूद विकास के बरक्स हाशियाकरण की प्रक्रिया जारी रही है और अनेक समुदाय वंचना की ओर धकेले जाते रहे हैं। सामाजिक गतिशीलता के लिए जिन श्रेणियों के लिए विशेष प्रावधान किये गये। उसके लाभ भी कुछ खास तबकों तक ही सीमित होकर रह गये।

आठवें दशक के बाद आरम्भ हुई भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण की राज्य पोषित नीति ने हाशियाकरण की प्रक्रिया को भयावह रूप दे दिया। भारतीय राज्य सत्ता ने कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को घोषणा से ज्यादा कभी नहीं समझा था। राज्य की नीति वर्चस्वशाली तबकों के हितों को केन्द्र में रखकर निर्धारित की जाती रही है। नयी आर्थिक नीतियों के चलते राज्य सत्ता ने संवैधानिक संकल्पों को भी तिलांजलि दे दी और खुलकर बहुराष्ट्रीय उद्यमों के हितों के पैराकारी शुरू कर दी। नतीजन देश के मूल्यावान प्राकृतिक संसाधन जल जंगल और जमीन का अभूतपूर्व दोहन आरम्भ हो गया। विकास की अवधारण ही बदल गयी है जिसने विस्थापन और बेदखली की अन्यायकारी योजनाएं शुरू कर दी। इसके चलते देश की बहुसंख्यक आबादी हाशियाकरण की चपेट में आ गयी है।

साम्राज्यवाद की तरह नव सामा्रज्यवाद भी केवल आर्थिक आक्रामकता के साथ नहीं आया बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व की शक्ति और संशाधनों से लैस होकर आया है। इसने हमारे तमाम देशज समुदायों की संस्कृति, बोली, भाषा, कला, अभिव्यक्ति और जीवन शैली को नष्ट करने के व्यापक उपक्रम शुरू कर दिये है। यहां उल्लेखनीय है कि देशज समुदायों की स्मृति ओर संस्कृति में प्रतिरोध की परंपरा की जड़े भी बहुत गहरी है। आज जहां राज सत्ता वर्चस्वशाली शक्तियों के पक्ष में खड़ी है, उसके बावजूद कहीं संगठित और अन्यत्र स्वतः स्फूर्त प्रतिरोध हाशिये के समुदायों की ओर से ही उभर रहा है। समता संदेश के 12 वें लेखक सम्मेलन का केन्द्रीय विषय हाशिये के समुदाय हाशिये की संस्कृति है जिसमें वर्चस्व और प्रतिरोध की वर्तमान स्थितियों व अन्तर्विरोधों का विश्लेषण करते हुए भविष्य के जनसंघर्ष की बहुआयामी राजनीति पर विचार किया जायेगा। हमें पूरा भरोसा है कि पूर्व की भांति इस सम्मेलन में भी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, लेखकों, एक्टिविस्ट, पत्रकारों, युवाओं और महिलाओं के साथ हाशिये के समुदाय के प्रतिनिधियों की सक्रिय प्रतिबद्धता रहेगी और हम प्रतिरोध के स्वरों और कार्यवाही को संगठित कर सकंेगे।
लेखक सम्मेलन के बारे में आपके विचार एवं सुझाव आमंत्रित है।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

वरिष्ठ साथी पत्रकार,
उदयपुर से प्रकाशित 'समता सन्देश' 
पत्र के सम्पादक और 
समतावादी लेखक हिम्मत सेठ


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