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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-7

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 02, 2011 | रविवार, अक्तूबर 02, 2011


लैम्पपोस्ट
यह लैम्पपोस्ट
कितना संतुष्ट
हर रात अपनी सीमा में
प्रकाश बिखेरता
कभी नहीं भूलता अपना दायरा
पॉंव फैलाने का ।


छिपकली
दीवारों के सहारे
खूब रेंगना आता है इसे
और चुपके.चुपके
शिकार करना भीए
नन्हें. नन्हें मच्छरों की
एक  छोटी.सी जिन्दगीए
जिसे और छोटा कर देती है यह ।


लोहा बन गया हूं मैं
सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई. खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूं मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूं मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हंसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूं  मैं
झेलते. झेलते ।


काम 
काम कितने महत्वपूर्ण बन जाते हैं कभी.कभी
उनके सिवा कुछ भी नहीं सूझता उस वक्त
हो जाता है शरीर पसीने से लथ.पथ
और पॉंव जकड़ जाते हैं थकान से
मन में बस एक ही बात गूंजती है
कब काम खत्म हो और
लौट जायें अपने घर
लेकिन काम कभी खत्म होते नहीं
सौंप जाते हैंए दूसरे काम
अपनी जगह पर
जाते.जाते भी ।



भाग्य रेखा
नीले आकाश के बीच
बादलों ने खींची है
मेरी भाग्य रेखा
बादलों से  झॉंकते हैं
टिमटिमाते तारे
जिनमें बसी हैं
मेरी शुभ और अशुभ घडिय़ॉं
तिनका हूं अभी मैं
हवा में उड़ता हुआ
धूल हूं पृथ्वी की
क्या पता कल बन जाऊँ
माथे का तिलक किसी का
फिर भी तो ऐ मिट्टी
तेरी ही अंश हूं
न जाने कब
पॉंव तले रौंद दिया जाऊँ  ।


आजकल
रात बढ़ रही है अपने चरम की ओर
और शहर तैयारी कर रहा है सोने की
कुछ दुकानें अभी भी खुली हैं
निर्भीक ग्राहकों को पेय परोसती हुई

चारों तरफ घूम रही हैं गाडिय़ॉं
पुलिस जासूसों की टटोलती हुई अपराधियों को
अचानक एक चीख निकलती है कहीं दूर से
हेडलाइट की रोशनी की तरह
और कत्ल हो जाता है किसी का
सोये लोग जाग उठते हैं आस.पास के
और मचाते हैं शोर कौओं की तरह

उड़ती है यह खबर आकाश में
और छप जाती है इन्तजार करते अखबारों में
सुबह.सुबह पढ़ते हैं लोग जिसे
हाथ की अंगुलियों में थामकर
चाय की गर्म. गर्म प्याली के साथ
जैसे यह कोई अखबार नहीं
ताजे बिस्कुट का एक टुकड़ा हो।



सेल्समैन
वह कितना प्रभावहीन था
जब आया था मेरे पास

. देखते . देखते
तन गया था उसका पूरा शरीर
एक योद्धा की तरह
उसने रख दी थी नजरे मेरे चेहरे पर
मानो वह मेरा ही मुखौटा हो

तर्कपूर्ण बातों से
कसता जा रहा था मुझे
एक शिकंजे में
वह वही बोल रहा था
जो मैं सुनना चाहता था
वह वही समझा रहा था
जो मैं समझना चाहता था

हाव.भाव सभी सतर्क थे
तत्पर थे पूरा करने के लिए
जो वह करना चाहता था
दौड़ रहा था आत्मविश्वास
उसके रग.रग में
जितने पैदा कर दिया था

मुझमें ऐसा विश्वास
मानो वह मेरा बहुत
पुराना मित्र हो

उसके कपड़े.जूते चेहरे सब
चमकने लगे थे एक तेज से
जिनके आगे मैं झुकता
चला जा रहा था
जबरदस्ती नहीं खुशी से


अंत में वह हंसा
मानो जीत लिया हो उसने
जो वह जीतना चाहता था

वह एक अच्छा
सेल्समैन था ।

ओ काम करने वाले भाई
ओ सात मंजिला
इमारत में काम करने वाले भाई
जब भी मैं यहां से गुजरता हूं
बहुत अच्छा लगता है मुझे
तुम्हें काम में व्यस्त देखकर
कभी.कभार तुम्हारे पसीने की बूंद
मेरे सिर पर गिर जाती है
और मैं महसूस करता हूं
यह बहुत भारी है
तुम्हारे  कठिन काम की तरह
मुझे बहुत सहानुभूति है तुमसे
कभी नीचे मिलोगे तो
जीभर के बातें करेंगे
वैसे मैं कोई
राजनीति की धूप दिखानेवाला
नेता तो नहीं हूं
किन्तु तुम्हारे दुखों को
अपने हृदय में
जरूर महसूस कर सकता हूं।


मजदूर के घर कबूतर 
मेरे दादा मजदूर थे
लेकिन अपनी मर्जी के
वे साइकिल के पीछे
अनाज की बोरी रखकर
मुट्ठी भर.भर पूरे गांव में बेचते थे
और थोड़े से . पैसे लेकर
शाम को घर लौटते थे
और उस वक्त
कबूतर उनका इंतजार करते थे
जो बोरे को झाडऩे के बाद
बचा हुआ अन्न खाकर
पानी पीते
और उड़ जाते थे
लोग कहते थे
यह कैसा प्रेम
मजदूर  के घर कबूतर
और मेरी दादी
सबकी नजरें चुराकर
हर सुबह थोड़ा .  सा
अनाज बिखेर देती थी
जिसे खाकर वे चुपचाप
छत पर उड़ जाते थे
दादा कभी नहीं समझ पाये
इस राज को
हमेशा की तरह
बोरों को झाड़.झाडक़र
अनाज बॉंटते हुए
बहुत खुश होते थे वे ।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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