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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-8

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अक्तूबर 05, 2011 | बुधवार, अक्तूबर 05, 2011

प्रभु होश मुझे इतना देना
प्रभु इतना सारा होश दे मुझे
करूँ सारे काम अच्छी तरह
लिखूँ तो बिन्दू भी न छूटे
पढूँ तो याद रहे कॉमा भी
सोचूँ तो सिर्फ मकसद याद रहें
बोलूँ  तो सिर्फ काम की बात
होश मुझे इतना देना
करूँ सारी दुनिया से प्यार ।



पीछे कुछ भी नहीं
यह जिन्दगी विभाजित है
टुकड़ों . टुकड़ों में
जबकि हम सोचते हैंए यह एक है
जो अभी जियाए वो थोड़ी देर बाद नहीं
कल नहींए परसों नहींए कभी नहीं
मुझे जो दिया गया है मौका प्रकृति ने
उसे आगे देखने को बढ़ाता हूँ कदमए
शेष रह जाता है कुछ भी नहीं ।

मैं भूल गया हूँ
मैं भूल गया हूँ पृथ्वी तुम्हें
अब मेरे पाँव तुम  पर नहीं पड़ते
तरस गयी हैं मेरी आँखें
तुम्हारी सुगंधित मिट्टी देखे बिना
दूर हो गया है यह सूर्य
दिखलाई नहीं देता मुझे
जिसका उदय और अस्त होनाए
बैठा रहता हूँ घण्टोंझ . घण्टोंत भर
इस व्यवसाय की कुर्सी में
और देखता रहता हूँ मेज को
जिससे उठकर कागज पर कागज
चिपकते जाते हैं मेरे चेहरे  पर
और इस कलम से किये गये हस्ताक्षर
महसूस कराते हैं मेरी मौजूदगी भर।


पार्क में एक दिन
इस पार्क में जमा होते जा रहें हैं लोग
कोई चुपचाप निहार रहा है
पौधों की हरियाली और फूलों को
कोई मग्न है कुर्सी पर बैठकर
प्रेम क्रीड़ा करने मेंए
कोई बढ़ रहा है आगे देखने की उत्सुकता लिए
कोई वहीं बैठ गया है घास पर
थोड़ी ठंडक का आनन्दी लेने
कई बच्चे अलग.जगह पर हैं
झूला झूलते या दूसरे उपकरणों से खेलते हुए
सभी लोग फुर्सत में हैंए फिर भी व्यस्त।
अब थोड़ी देर में फव्वारे चालू होंगे
रंग.बिरंगे मन मोहते हुए
यही आखिरी खुशी होगी लोगों की
फिर लौटने लगेंगे वे वापस घर
कोई परिश्रम नहीं फिर भी थके हुए।


अवसर
चील बहुत फुर्तीली है
आँखें उसकी तीव्र है
बखूबी देख लेती है शिकार को
बहुत दूर से
लेकिन तुम्हारे हिस्से में एक लाभ है
वो बहुत दूर है
जल्दी झपट्टा मारने का
पहला अवसरए तुम्हारे पास है।

कबूतर
तालाब सूख गये हैं गर्मी से
और ये कबूतर पानी भरी बाल्टी से
बुझा रहें हैं अपनी प्यास
अभी थोड़ी देर पहले ही
दाना खाया है इन्होंने
और उड़ रहे हैं मंदिर के चारों ओर ।

तपती धूप में चमकता है
मंदिर का गुम्बज
और कौओं के लिए
कोई भोजन नहीं यहाँ
ये कबूतर ही हमेशा दोस्त रहे मंदिरों के
कहीं न कहीं इनकी जगह है
दीवारों में रहने की
और ये सीधे.सीधे पालतूए
हाथ की अँगुलियों तक पर
बैठाया जा सकता है इन्हें ।

डर पैदा करना
केवल उगते या डूबते हुए सूर्य को ही
देखा जा सकता है नंगी आँखों से
फिर उसके बाद नहीं
और जानता हूँ
हाथी नहीं सुनेंगे
बात किन्हीं तलवारों की
ले जाया जा सकता है उन्हें दूर.दूर तक
सिर्फ सुई की नोक  के सहारे हीए
इसलिए सोचता हूँए
डर पैदा करना भी एक कला है ।

पक्षी
कितने  अच्छे लगते हैं
ये पक्षी
जब उतरते हैं धीरे.धीरे
आसमान से
बहते हुए पत्तों की तरह
और अपना पूरा शरीर
ढ़ीला.ढ़ाला कर
रख देते हैं जमीन पर
फिर कुछ देर खाते.पीते हैं
फुदकते हैं इधर.उधर और
वापस उड़ जाते हैं
अपनी पूरी ताकत सेए
बिना किसी शोर के बादलों में
वाष्पित जल की तरह ।

देखता हूँ हर दिन
इसी तरह इनका आना और जाना
और चिन्तित नहीं देखा इन्हें कभी
आने वाले कल के लिए ।

मछुआरा
सुबह . सुबह
अपनी छोटी सी नाव और जाल लिए
निकल पड़ा है मछुआरा
बीचों.बीच समुद्र में
इतना शक्तिशाली वेग समुद्र का
और वो अकेला
थोड़ा सा ज्ञान नौका चलाने का
और थोड़ी सी ताकत तैरने की
भाग्य ने दिया जब तक साथए
बने रहे तब तक
अथवा गये तो फिर लौटे ही नहीं
यह नाव और जाल
जैसा उसका घोड़ा और तलवार
छीनना है भोजन समुद्र से
और कितना नम्र होगा समुद्र
जो हर बार जीतने उसे देता होगा ।

डूबते हुए जहाज में प्रेम

जहाज डूबने को था
हमने देह से अधिक
प्रेम को बचाना चाहा
जब सारे लोग भाग रहे थे
हम प्रेम में थे मग्नम
हमारा प्रेम सिलसिलेवार चलता रहा
जो बच सकेए वे बच गये
जो नहीं बच पायेए वे नहीं बच पाये
उनमें हम दोनों भी थे
दोनों हाथ हमारे मिले हुए थे
साथ ही कन्धे से कन्धा
और मन से मन
भय कहीं नहीं था
पानी हमें झाँक रहा था
और हम एक.दूसरे को ।

मुरझाने से पहले

ये बहुत सारे फूल
सड़क़ के आस.पास
एक पेड़ पर खिले हुए
मुरझाने से पहले
बाँट चुके होते हैं
हजारों लोगों को
अपनी खुशियाँ ।

मेरे दोस्त
बहुत सारे दोस्त रहे मेरे
कुछ उन कौओं की तरह थे
जो वक्त आने पर
शोर मचा सकते थे हित में मेरे
लेकिन भीतर से उतने ही कमजोर
हवा की थोड़ी सी धमक से
उड़ जाया करते थे मुझे छोड़कर।
कुछ वैसे भी रहे
चील की तरह दूर से ही
मुझ पर दृष्टि जमाए हुए
जब भी मौका मिला
छीनकर ले गए खाना मेरा।
और कुछ थे बेहद ऊबाऊ
सुअर की थोथी नाक की तरह
हमेशा मुँह दिखलाते हुए
कुछ ही थे अच्छी बातें कहने वाले
कहकहे लगाने वाले थे ज्याद
लेकिन सभी दोस्त ही तो थे
इसलिए गले लगाए रखना
जरूरी था उन्हें ।



आज समचुच लगा
आज सचमुच लगाए
मेरे बीमार पिता को
एकदम से मेरी जरूरत है
वे धीरे.धीरे बोल रहे थे
बहुत कम विश्वास था
उन्हें ठीक होने का
जितना भी जियाए संतुष्ठ थे उससे
लेकिन एक खालीपन था चेहरे पर
लगता थाए प्यार ही भर सकता है जिसे
मैंने धीरे.धीरे हाथ बढ़ाया
अपना हाथ उनके हाथ में लिया
फिर कंधे पर फेरा हाथ
और आखिर में हाथ सिर पर रखकर
बच्चों की तरह प्यार किया
उन्होंने मुझे देखा
थोड़ी अच्छी तरह से
शायद उन्हें लगाए
अभी जीने के कुछ ये ही कारण बचे हैं
उन्हें जीना चाहिए
वे कुछ नहीं बोले
तेजी से आँख मूँदकर
मुँह फेर लिया ।

डूबती हुई नाव
नाव चोट खा गयी है
लगता हैए डूब जाएगी
पानी धीरे.धीरे प्रवेश कर रहा है
दर्द से हिलती है नाव
पानी खून का प्यासा हो गया है
डर से सबके  शरीर पत्थर
अब कुछ नहीं हो सकता है
एक ही सत्य है मौत
और मौत बढ़ रही है
बिना किसी शस्त्रब के
कितनी आसानी से
छीन रही है प्राण
पानी भर रहा है
साँस की जगह
और दया दिखाई नहीं देती है
दूर.दूर तक ।


प्रशंसा
मैं कर सकता था प्रशंसा सबकी
एक बालू के कण से लेकर वृहद आकाश की
सब में हवा बनकर जिया था मैं
कहीं न कहीं इन सब में था मौजूद
क्योंकि जब भी बैठा था मैं इनके पास
पूरी तरह था इनका ही
और उनके ही कर्म बस शब्द थे मेरे
ये ही पैदा कर देते थे तरंगें मेरे मन में
जैसे तट के ही छोटे पत्थर नदी के जल में।


चिट्ठियाँ
दूर से आती है चिट्ठियाँ
अपनों को और अधिक अपना बनाने के लिए
और दुनिया छोटे से कागज में सिमटकर
बैठ जाती है हृदय पर
पहला खत था यह बेटी का
मुझको लिखा हुआ
अपने सारे दुखरू.सुख का निचोड़
घूमता रहा कई दिनों तक मेरे मन में ।


तुम्हारा न रहना
तुम्हारे अनगिनत बिम्ब
झाँकते हैं मेरी ओर
अपने हजार हाथों से दस्तक देते हुए
और उलझन में रहता हूँ
कैसे उन्हें प्रवेश दूँ
जबकि जानता हूँ
वे आयेंगे नहीं भीतर
केवल झाँकते रहेंगे बाहर से
तुम्हारा पास न रहना
इसी तरह का आभास देता है मुझे हर पल ।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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