डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-9 - अपनी माटी

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शुक्रवार, अक्तूबर 07, 2011

डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-9


बारिश
कल सारी रात बारिश हुई
जैसे बादलों को मिला हो
सब कुछ साफ करने का काम
धूलए गन्दगी सब कुछ बहती रही
गाय. भैंस और पेड़
सब चमकने लगे
चमकने लगे रास्ते और घर
लेकिन नहीं थे जिनके पास घर
उनका क्या हुआ होगा

मजबूरी 
वह आ तो गया था शहर में
लेकिन पसंद नहीं आई उसे
शहर की तेजी से भागती दुनिया
वह हर दिन सोचता था
इस महीने के आखिर में
लौट जाऊँगा वापस अपने घर
लेकिन उसकी हर चाहत को
रोकता दिखलाई पड़ता था
पुराना लिया हुआ कर्ज
जिसके बीच झॉंकता था
गॉंव के महाजन का चेहरा
जैसे बढ़ रहा हो उसकी तरफ
फैलाये हुए अपने शक्तिशाली हाथ
ले जाने को उसके सारे पैसे
मनीऑर्डर की शक्ल में
और देखते.देखते बदल जाती थी
उसकी सारी चाहत एक खामोशी में
और बढऩे लगते थे उसके पॉंव
वापस अपने काम पर ।

भाग्य
रोटी सिंकते ही
अपने खुशनुमा चेहरा निकालकर
हॅंसने लगती है
लेकिन दो पल में ही
निर्मम हाथों से पीटकर
वापस चिपका दी जाती है .
ऐसा ही होती है
दुनिया की हर रोटी के साथ ।

गेहूं के दाने
ये दाने गेहूं के
जो अभी बन्द हैं
मेरी  मुट्ठी में
थोड़ी.सी चुभन देकर
हो जाते हैं शान्त
अगर जो ये होते
मिट्टी के भीतर
दिखला देते
मुझे ताकत अपनी ।

समानता
सूरज ने सभी को
समान प्रकाश दिया
हवा ने भी एक समान
पोषण किया लोगों का

बीजों ने नहीं देखा कभी
किन हाथों द्वारा लगाये गये थे वे
और हमेशा जमीन पर
उभरकर आये ।


पिता के लिए
हम उड़ेंगे एक दिन आकाश में
और मॉंग लायेंगे
देवताओं से
तुम्हारे लिए ढेर सारी खुशियॉं
रंग.बिरंगे सपने
और हॅंसता. खेलता स्वास्थ्य तुम्हारा
पिता फिर तुम मुस्कुराना
और तुम्हारी हॅंसी
बदल जायेगी हमारी हॅंसी में
जिसके बीच छुप जायेगा
हमारा अन्धकार तुम्हारे प्रकाश में
पिता इस प्रकाश के बीच
हमारे हृदय से झरेंगे
बहुत सारे श्रद्धा के फूल
नये.नये गीत प्रार्थना के
और प्रेम हमारा धूप की तरह
बिखरता जायेगा तुम्हारे चरणों में
तुम इन्हें देखो  और कुछ कहो
इससे पहले ही
हम खुशियों के ऑंसू बनकर
बस जायेंगे तेरी ऑंखों में
तुम हॅंसो इससे पहले ही
हम मौजूद होंगे
कहीं न कहीं तुम्हारे होठों में
पिता तुम हमसे
कुछ कहो चाहे न कहो
हम मौजूद रहेंगे
हमेशा तुम्हारे साथ
एक साये की तरह ।



पिता के लिए प्रार्थना
मैं प्रतिदिन तेरे द्वार पर आता रहा
और निराश होकर लौटता रहा
इस आशा में कि एक दिन
तू जरूर मेरी तरफ देखेगा
और अपने सर्वव्यापी हाथों से
मेरे ऑंसू पोंछेगा
विदा करेगा मुझे
अपना दुर्लभ प्रसाद देकर
लेकिन मेरी आशा
रोज मेरे पिता की रुगण शैया
के आस.पास दम तोड़ती रही और
तुम्हारी धरती नाराज होकर रूठी रही
उन्हें पॉंवों से खड़े होने का
सहारा तक नहीं मिला
अनगिनत दिन बीत गये
मैं ठीक से समझ भी नहीं पाया
कि तू मेरी परीक्षा ले रहा है या
यह कोई तेरा बहाना है
मुझे अपने पास बुलाने का
अगर तू मेरी प्रार्थना से
थोड़ा सा भी खुश होता है
तो यह खुशी मेरे पिता के
चेहरे पर बिखेर दे
मेरी ऑंखें तेरी इस परम अनुकम्पा से
सन्तुष्ट हो जायेंगी ।

शिक्षा
शिक्षा कोई प्रकाश नहीं है
अपने आप में
सिर्फ तरीका है
हमें अंधकार से
प्रकाश में ले जाने का

मैं सोचता हूं
मैं सोचता हूं सभी का समय कीमती रहा
सभी का अपना.अपना महत्व था
और सभी में अच्छी संभावनाएं थींण्
छोटी सी रेत से भी भवनों का निर्माण हो जाता है
और सागर का सारा पानी दरअसल बूंद ही तो है।

रास्ते के इन पत्थरों को
मैंने कभी ठुकराया नहीं था
इन्हें नहीं समझ पाने के कारण
इनसे ठोकर खाई थी
और वे बड़े.बड़े आलीशन महल
अपने ढ़हते स्वरूप में भी
आधुनिकता को चुनौती दे रहे हैं
और उनका ऐतिहासिक स्वरूप आज भी जिंदा है।

झील 
झील का पानी बहता नहीं
बंधा रहता है इस कोने से उस कोने तक
और शांत हवा में
अब तक टूटने वाले पत्ते भी
महसूस करते हैं सुरक्षित अपने आपको
इसलिए शाम तक तट पर बैठा हुआ
देखता रहता हूं इस झील को चुपचाप
जिसे घेरे हुए चारों ओर से
छायादार पेड़
और छोटे.छोटे पहाड़।
सूरज डूबोता है
इसमें अपने आप को
और निकाल लेता है स्वच्छ करके
मैं भी उसी तरह अपनी आंखों को
और लौटता हूं जब
महसूस करता हूं
मैं भी झील ही हूं
निर्मल और शांत
अनेक दिनों तक।






योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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