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डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध:-वक़्त के साथ बदलाव की करवटें लेता नाथद्वारा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 02, 2011 | रविवार, अक्तूबर 02, 2011


विविधवर्णी विरासत वाले हमारे देश के विशिष्ट स्थलों की सनातन संस्कृति को आज एक सामान्य शहरी, उपभोक्ता संस्कृति बराबर लीलती जा रही है। महाप्रभु वल्लभाचार्य प्रणीत पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के प्रमुख तीर्थस्थल नाथद्वारा को भी इस तरह के परिवर्तन के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। बनास नदी की उजली कोहनी में समाया, पथरीली पहाडि़यों से घिरा, अभी कुछ ही दशक पूर्व तक स्वच्छ जल के कई ताल-तलैयों, सुगंधित पुष्प वाटिकाओं, रमणीय उद्यानों, हरे भेरे खेतों, बालुकामय नदी-तटों, तंग और ऊंची-नीची किन्तु साफ-सुथरी गलियों और उनके किनारे पास-पास सट कर खड़े दुमंजिला मकानों के साथ ही छोटी-छोटी रंगबिरंगी दुकानों वाला यह चित्रोमय तीर्थस्थल अब जैसे विरूपित हो रहा है। अपने कलापूर्ण और शांतिमय वातावरण से वैष्णव तीर्थयात्रियों का  चित्त लुभाने वाला आत्मसंतोषी निवासियों का यह नयानाभिराम नगर अब पर्यटकों की जेब पर  फलने-फूलने वाले एक बड़े बाज़ार में बदलता जा रहा है। 

अधिक समय नहीं हुआ जब बाहर से आने वालों को नाथद्वारा एक पुरानी दुनिया का आभास देता था- एक ऐसी मध्ययुगीन दुनिया का, जिसका आज की हमारी इस दुनिया से कोई साम्य नहीं था, पर चूँकि यह दुनिया स्वयं नाथद्वारावासियों द्वारा श्रीनाथजी को ही उनका वास्तविक शासक और नियंता मान कर रची गई एक तरह की सामंती दुनिया थी, उसका आज की दुनिया के स्वरूप से मेल न खाना स्वाभाविक था। आगंतुक वैष्णव के लिए तब नाथद्वारा में कुछ दिन रहना अपने आप में एक विशिष्ट धार्मिक अनुभव होता था।    वस्तुतः यह धार्मिक अनुभव जिस श्रद्धालु के लिए संभव रहा वह श्रीनाथजी की उपस्थिति को जीवन के हर क्षण में और हर स्थान पर महसूस करता था। इस अनुभव का भागीदार और साथ ही उसका रचयिता  नाथद्वारा का वह परम्परागत चित्रकार था जो नित्य सुबह मंदिर जाकर ‘मंगला‘ के दर्शन करता और तदनन्तर दिन भर उन रंगों व  कूंचियों से श्रीनाथजी अथवा श्रीकृष्ण लीलाओं के चित्र बनाता जिन रंगों व कूंचियों को वह अपने ही हाथ से तैयार करता था। इन चित्रों के विक्रय से  उसे जो भी आय होती थी उसमें संतोष करते हुए वह अपना जीवन एक तरह से लीला पुरुषोत्तम की भक्ति में ही बिता देता था। इन चित्रकारों की कलाकृतियों में जिन गायों, मोरों, तोतों, पहाडि़यों, वृक्षों, घरों या स्त्री-पुरुषों की वेशभूषा का चित्रण होता था वे सामान्यतः उसी परिवेश का हिस्सा होते थे जिसमें वह चित्रकार स्वयं रहता था। कला का संसार इस चित्रकार के लिए नाथद्वारा के उसके बाह्य संसार से भिन्न नहीं था। इससे यह स्वतः प्रकट था कि इस चित्रकार के लिए जीविकोपार्जन और श्रीनाथजी की सेवा दो भिन्न कार्य नहीं थे। 

 यही बात बहुत कुछ उस कीर्तनकार पर भी लागू होती थी जो श्रीनाथजी के मंदिर में दर्शनों के समय पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं पदों का गान करता था जिन्हें कभी अष्टछाप के कवियों ने श्रीनाथजी के ही भक्ति रस में आकंठ डूब कर रचा था। नाथद्वारा के किसी शांत उद्यान में सुनाई देने वाली कोयल की कूक उसे उस हवेली संगीत में भी सुनाई देती थी जो वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्गीय भक्ति की ही छाया में पल्लवित हुआ था। यही बात शायद बहुत कुछ नाथद्वारा के पिछली शताब्दी के कवि घनश्याम पर भी लागू होती थी जिन्होंने अपने काव्य में इस नगर का वर्णन इस तरह की पंक्तियों में कियाः 

       ध्वजा   फहरात  चक्र चमकत  कोट भान
 दूर  तें  दिखात  नाथ नग्र  वैकुण्ठ  धाम।
                     ‘घनश्याम  प्यारे‘  घूमे  गजराज  द्वारहू  पे
                     नौबत  की  घोर  होत घर घर सुनै वाम।।
 दौरि  दौरि  आवें  करें दर्शन  श्रीनाथजी के
 भोर  भोर भागें सब छोरि छोरि आवें काम।
                     परम  परसाद  पावें  गावें  हैं  गोविन्द गुण
                    मोज में कमावें खावें खुशी रहें आठों जाम।।
 श्रीनाथजी मंदिर की रसोई में, गोशाला, फूलघर, शाकघर, पानघर या दूधघर में काम करने वाला मंदिर का कर्मचारी भी तब सुबह से शाम तक अपनी सेवाएं उन्हीं श्रीनाथजी को समर्पित करता था जिन्हें वह पीढि़यों से अपने इहलोक और परलोक के स्वामी के रूप में देखता आया था। अनन्य भक्ति और शरणागति का यह अनुभव कलाकारों या मंदिर कर्मचारियों तक ही सीमित न रह कर उन निवासियों तक में भी देखा जा सकता था जो मंदिर की सेवा से सीधे नहीं जुड़े थे। ऐसे  त्योहार या अनुष्ठान के अवसर पर भी जो किसी अन्य देवी-देवता के नाम से जुड़े हों, श्रीनाथजी को भुला देना नाथद्वारावासी के लिए असंभव था।  नाथद्वारा में फल बेचने वाली अहिन्दू कुंजडि़नों को भी श्रीनाथजी के नाम की दुहाई देते सुना जा सकता था। नाथद्वारा का श्रद्धालु वैष्णव पहले अपने दैनंदिन क्रियाकलापों को भी भावगत पुराण में वर्णित कृष्ण लीलाओं के सन्दर्भ में ही देखता और व्याख्यायित करता था। उसके लिए नाथद्वारा का ‘बड़ा मगरा‘ ही गोवर्द्धन था और नित्य-सलिता बनास ही यमुना। गौशाला से मंदिर के मार्ग में कुसुमित कदम्ब के वृक्ष उसे उस कालिंदी कूल कदम्ब की याद दिलाते जिस पर कृष्ण नहाती हुई गोपिकाओं के वस्त्र लेकर चढ़े थे। हर मनःस्थिति और हर परिस्थिति में नाथद्वारावासी के लिए श्रीकृष्ण और श्रीनाथजी को भूलना असंभव था।  इस विश्व और इसके परिवर्तनों को भी वह तब श्रीनाथजी की ही इच्छा के रूप में देखता था।

श्रीनाथजी की इस उपस्थिति को अपनी चेतना में वह गुजराती वैष्णव भी बराबर अनुभव करता था जो अपने कामकाज से कभी 10-15 दिन की फुर्सत निकाल सपरिवार नाथद्वारा आता, किसी निःशुल्क धर्मशाला में रहता और पूरी वैष्णव शुद्धता के साथ अपना भोजन पकाते-खाते हुए नित्यप्रति श्रीनाथजी के दर्शन करता तथा श्रद्धानुसार मंदिर में ध्वजा चढ़वाता, राजभोग करवाता और अधिक सम्पन्न हुआ तो  अपनी सम्पत्ति को श्रीनाथजी की ही दी हुई मान कभी कोई भवन भी बनवाकर अपने प्रभु को समर्पित कर देता था। यहां मौजूद कई भवन, कुण्ड आदि इस तरह की लगभग अनाम भेटों के साक्षी हैं। नाथद्वारा और श्रीनाथ मंदिर के परिवेश में  ब्रजमाधुर्य उत्पन्न करने वाले तत्त्वों में जहां उसके ब्रजवासी मूल के सेवकों द्वारा बोली जाने वाली ब्रजभाषा और पर्वोंत्सवों पर उनके द्वारा गाए जाने वाले ब्रजमंडल के गीत थे वहीं मंदिर प्रशासन के उस निजी बैंड का कुशल अभ्यास भी था जो विशिष्ट अवसरों पर मंदिर के गोवर्द्धन चैक में राजस्थानी या ब्रज की कुछ प्रचलित लोक धुनें बजाता था। मंदिर के नक्कारखाने में सुबह से शाम तक दर्शनों के समय परम्परागत धुनें बजती थीं।

  खानपान और सफाई के संबंध में यहां की मर्यादाएं अत्यधिक कठोर थीं। मंदिर की या यहां के कई कट्टर वैष्णवों की पाकशाला में प्याज़-लहसुन तो क्या, कई एक दालों और शाकों तक का प्रवेश वर्जित था। बर्तन को होंठ से छुआए बिना ऊपर से पानी पीना हर नाथद्वारावासी का आम अभ्यास था। पानी पीते समय असावधानी से  लोटा यदि दांत से जरा भी छूू जाए तो उसे पुनः राख-मिट्टी से मांजना आवश्यक हो जाता था।  पुष्टिमार्ग की दीक्षा {ब्रह्म संबंध} ले लेने वाले के लिए तो खानपान व शारीरिक शुद्धि संबंधी नियम इतने कठोर हो जाते थे कि अपना भोजन वह अपनी पत्नी, बेटी या बहू से भी नहीं बनवा सकता था। अपना भोजन तब उसे स्वयं ही बनाना और श्रीनाथजी को समर्पित कर उनके प्रसाद रूप में ग्रहण करना होता था। इसी तरह शौच के बाद स्नान उसे हर मौसम और हर शारीरिक स्थ्ािित में अपने लिए अनिवार्य लगता था। 
नाथद्वारावासी इस कठोर अनुशासन का पालन वस्तुत स्वयं अपने लिए न कर अपने श्रीनाथजी लिए करता था। वह उन्हीं के लिए नाथद्वारा को श्रमपूर्वक साफ-सुथरा, शुद्ध और व्यवस्थित रखता था। श्रीनाथजी की विशिष्ट सेवा के लिए  पवित्र जल इसी काम के लिए प्रयुक्त गाडि़यों में यमुना से आता था। मंदिर में फूल बेचने वाले मालियों के मन में हर समय श्रीनाथजी की पवित्र सेवा का भाव बना रहता था। श्रीनाथजी के भक्तों को पूर्ण शुद्धता के साथ पुष्प उपलब्ध करवाने की इच्छा का असर कुछ हद तक उनके आचार विचार पर भी पड़ता था। फूलों से होने वाली आय को माली एक तरह से सेवा का ही आनुषंगिक फल मानते थे। 
नाथद्वारा आने वाला तीर्थयात्री भी पहले पर्यटक कम और श्रीनाथजी का भक्त अधिक होता था। वह यहां आत्मिक आनन्द के अनुसंधान हेतु आता था   न कि उस भौतिक-पार्थिव सुख की तलाश में जिसे वह किसी हिल स्टेशन, सी-बीच या आधुनिक आकर्षणों वाले किसी शहर में कहीं ज्यादा आसानी से पा सकता था। यहां अपने धन-व्यय को भी वह मुख्यतः श्रीनाथजी की भेंट या निछावर के रूप में देखता था। अब नाथद्वारा के इस परम्परागत मूल स्वरूप में बदलाव आता जा रहा है। सतही तौर पर देखने से संभव है अब भी बहुत से लोगों को यह पहले जैसा ही लगे। दर्शानार्थियों की भीड़ और यहां के  मंदिरों में विभिन्न दर्शनों के समय अब भी नज़र आने वाले राजसी वैभव को देखकर नाथद्वारा की संस्कृति के केन्द्र में आए किसी विचलन का अनुमान लगा पाना संभव नहीं है पर नाथद्वारा के अनेकानेक बाह्य परिवर्तनों को बारीकी से देखने पर इस विचलन की प्रकृति को समझने में पर्याप्त सहायता मिल सकती है। 

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि नाथद्वारा के कई चित्रकार जिनके पुरखे पहले केवल श्रीनाथजी के या श्रीकृष्ण लीलाओं के ही चित्र बनाते और  बेचते थे अब बाहरी व्यापारियों के लिए मुग़ल शैली के कुछ प्राचीन चित्रों की अनुकृतियां तैयार करने में लगे रहते हैं। व्यापारी इन चित्रों को मौलिक चित्र बताकर कई बार विदेशी पर्यटकों के हाथ ऊंचे दामों में बेच देते हैं। नाथद्वारा का चित्रकार भी इस तरह अब धार्मिक चित्र बनाने के बजाय विदेशियों से पैसा ऐंठने के खेल में परोक्ष रूप से शामिल हो गया है। जो व्यक्ति नाथद्वारा की जीवन शैली या उससे होने वाली आय से असंतुष्ट थे पहले भी नाथद्वारा छोड़कर बाहर जाते रहे हैं। अन्य कामों की तलाश में नाथद्वारा मूल के कई लोग पहले भी बम्बई, अहमदाबाद, सूरत, नवसारी या अन्यत्र जा बसे हैं जहां उन्होंने अपने हुनर और अपनी मेहनत से पैसा और यश अर्जित किया है, पर उनसे नाथद्वारा की जीवन शैली पर असर इसलिए नहीं पड़ा कि ये लोग जब भी नाथद्वारा आते तब कुछ समय के लिए उसी  परम्परागत शैली को स्वयं भी अंगीकार कर लेते थे। 

यांत्रिक उपकरणों और भौतिक उपलब्धियों से लुभाने वाली हमारी आज की उपभोक्ता संस्कृति का घुन अब नाथद्वारा में कहीं भी लगा हुआ देखा जा सकता है। यहां आने वाले अधिकांश लोगों की राय में अधिक आय का प्रलोभन अब अधिकतर नाथद्वारा वासियों के मन में गहरा समा गया है। मंदिर की ‘धौली पटिया‘ पर फूल बेचने वाला माली हो या मंदिर के बाहर बैठा प्रसादिया- इस लोभ प्रवृत्ति के दर्शन उसमें कहीं न कहीं किए ही जा सकते हैं। धर्मशालाओं से मंदिर तक फैली छोटी-छोटी दूकानों पर अब नाथद्वारा की विशिष्ट कलात्मक वस्तुओं के साथ-साथ अन्यत्र निर्मित माल भी बिकता है।

यहां का माणक चैक पहले एक खुली और साफ-सुथरी जगह थी। कुछ ही वर्ष पहले तक यहां यात्री खड़े-खड़े भंग-ठंडाई या पानी-बताशों का स्वाद चखा करते थे। अब यह स्थान उन अनेक ठेलों और ‘केबिनों‘ से अँट गया है जहां पर्यटक जिन प्लेटों और चम्मचों से बम्बइया  पावभाजी खाते हैं उन्हें बाद में अक्सर पानी से भरी एक बाल्टी में डुबोकर अन्य ग्राहकों को भी दे दिया जाता है। हाथ से भोजन बनाने अथवा मंदिर की ‘पत्तल‘ या उसके ‘कच्चे प्रसाद‘ के प्रति कोई आकर्षण प्रदर्शित करने के बजाय किसी भीड़ भरे भोजनालय की जैसे-तैसे साफ़ की हुई थाली-कटोरियों में भोजन करने के लिए लम्बी कतार में प्रतीक्षा करता पर्यटक अब यह प्रमाणित करता है कि वह नाथद्वारा में किसी वैष्णव-शुद्धता व समर्पण के भाव से केवल दर्शनार्थ नहीं आया है। 

नाथद्वारा के इस बदलाव को केवल सार्वभौमिक नगरीकरण व जनसंख्या वृद्धि के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। पिछली जनगणना में नाथद्वारा में जनसंख्या वृद्धि की दर भारत की औसत जनसंख्या वृद्धि की दर सेे अधिक नहीं रही है। जनसंख्या के घनत्व की वृद्धि के कोई लक्षण इस तरह नाथद्वारा की स्थानीय आबादी में नहीं देखे जा सकते। पर पहले चित्रकारी या मीनाकारी का काम करने वाला नाथद्वारावासी जब अपना पुश्तैनी व्यवसाय छोड़कर पत्थर का व्यवसाय करने लगता है अथवा अपने खेत-कुओं से लगाव रखने वाले और मंदिर में फूल बेचने वाले परिवार का युवक अपने खेत-कुएं बेचकर किसी बाहरी बाज़ार के लिए अपनी देखरेख में मीनाकारी का काम करवाने लगता है तब इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसकी परम्परागत मनोवृत्ति में एक  मौलिक परिवर्तन आ गया है। इस परिवर्तन का  मामूली सा लगने वाला किन्तु वस्तुतः एक अत्यन्त गम्भीर परिणाम यह हुआ है कि नाथद्वारा के प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति लोगों के जन्मजात नैसर्गिक प्रेम को उनकी इस व्यावसायिक मनोवृत्ति  ने लगभग समाप्त कर दिया है। देखा जाए तो आज नाथद्वारा के आसपास की पहाडि़यों को बेरहमी से काटकर और उन पर बस्तियां बसा कर तथा यहां के कई छोटे-बड़े ताल-तलैयों को भर-पाट कर या सुखा कर यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य तथा ग्रीन बेल्ट को नष्ट किया जा रहा है। इसके चलते वह प्राकृतिक छटा जिसे नाथद्वारा के चित्रकार पीढि़यों से अपने चित्रों में अंकित करते आए हैं, हो सकता है आने वाले कुछ ही वर्षों में नाथद्वारा से सदा के लिए निर्वासित कर दी जाए। 

नाथद्वारा के भविष्य के लिए सर्वाधिक चिन्ताजनक बात यहां के बड़े-बड़े भूखण्डों का उन बाहरी लोगों द्वारा खरीदा जाना है जिनकी स्थानीय सामाजिक जीवन में अथवा उसके भविष्य में गहरी रुचि कदापि नहीं हो सकती। इन लोगों का कार्यक्षेत्र चूंकि नाथद्वारा से बाहर है अतः इसके कल्याण और भविष्य में इनकी किसी भी रुचि का न होना नितान्त स्वाभाविक है। नाथद्वारा में जहां पहले कभी हरे-भरे खेत थे वहां अब सिनेमा गृह, होटल, दूकानें और अतिथि-गृह बन गए हैं। व्यवसायी बुद्धि वाले लोग अब नाथद्वारा की कृषि भूमि को रिहायशी भूमि में रूपान्तरित करवाने, उन पर बहुमंजिला अपार्टमेण्ट्स बनवानेे और उनके विक्रय से बड़ी धनराशि बटोरने में लगे हैं।  नाथद्वारा के आसपास के गांवों के कई समृद्ध व्यापारियों ने नाथद्वारा में उनके स्थायी रूप से बसने का कोई इरादा न होते हुए भी केवल कभी-कभी आकर ठहरने के लिए या शुद्ध पूंजी निवेश के दौर पर या तो ये अपार्टमेण्ट्स खरीद लिए हैं या उनके आसपास के किसी भूखण्ड पर कोई आलीशान इमारत बनाकर रख छोड़ी है। रिहायशी भूखण्डों में बाहरी धन के इस निवेश से पिछले कुछ ही वर्षों में यहां ज़मीनों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।

यही नहीं, यहां का सारा विकास अब यात्रियों और उनसे होने वाली आय को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। नाथद्वारा के प्राकृतिक साधनों का पहला अधिकारी अब जैसे स्वयं नाथद्वारावासी न रहकर बाहर से आने वाला यात्री हो गया है। नाथद्वारा का स्थानीय सामाजिक जीवन अब इन सैलानियो (अब मोटे तौर पर उन्हें ‘तीर्थयात्रियों‘ के बजाय शायद इसी नाम से अभिहित करना उचित होगा) की आमदरफ़्त के आगे दब सा गया है। आगंतुकों के नाथद्वारा पर लगातार बढ़ते प्रभाव और स्वयं नाथद्वारावासी को मिलने वाली सार्वजनिक सुविधाओं की लगातार बढ़ती उपेक्षा के भी विभिन्न उदाहरण यहां देखे जा सकते हैं। 

मंदिर मंडल ने यात्रियों के लिए जिन ‘काॅटेजों‘ की व्यवस्था की है उन्हें साधारण तीर्थयात्री किराए पर नहीं ले सकता। उनका आरक्षण उन समृद्ध लोगों के लिए अवश्य सुविधाजनक होता है जो अपने निजी वाहनों से यहां आकर श्रीनाथजी के दर्शन की रस्म पूरी करते हैं और जो नाथद्वारा के सामान्य जनजीवन से अलग-थलग और कृत्रिम रूप से उससे कुछ अधिक ऊंचा दिखाई देने वाले एक दूसरे ही नाथद्वारा में अपने प्रवास के बाद टेम्पल बोर्ड को अपनी भेंट की मोटी धनराशि से खुश करते हुए अपने तीव्रगति यानों से शीघ्रातिशीघ्र अपने व्यवसाय की दुनिया में वापस लौट जाते हैं। मंदिर में भक्ति प्रस्फुटन के लिए अनुकूल वातावरण खोजने की या नाथद्वारा को श्रीनाथजी की पवित्र भूमि मान उसमें कहीं शांति और सौन्दर्य तलाशने की फुर्सत अब इन व्यस्त लोगों के पास नहीं बची है। 

यह सचमुच विडम्बनापूर्ण है कि नाथद्वारा का मंदिर मंडल अब अपना ध्यान नाथद्वारा और नाथद्वारावासी से अधिक बाहर से आने वाले सेठों की ओर देने लगा है। किसी धार्मिक संस्था में व्यावसायिक मनोवृत्ति का प्रवेश उस संस्था की प्रकृति को ही बदल कर रख सकता है। पुष्टिमार्गीय दर्शन के जानकार मेरे एक मित्र ने गत वर्ष मुझे बताया कि उन्हें एक बार मंदिर के एक अधिकारी नेे बुलाकर पूछा कि वे मंदिर के हित में अपना क्या सहयोग दे सकते हैं? मित्र के यह कहने पर, कि वे शुद्धाद्वैत भक्ति के संबंध में सरल व सुबोध भाषा में जनोपयोगी संक्षिप्त पुस्तकों की रचना कर सकते हैं, उक्त अधिकारी ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि इससे तो मंदिर की आय में वृद्धि की कोई विशेष संभावना नज़र नहीं आती। 

समर्पण व भक्ति की धुरी से हट जाने के कारण नाथद्वारा का निवासी भी अब उसी उपभोक्ता संस्कृति के प्रवाह में बहने लगा है जो अधिक धनोपार्जन और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति को ही किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता का मापदंड बनाती है। नाथद्वारा में लोगों को जो काम उपलब्ध हैं उनके माध्यम से अधिक धनोपार्जन का प्रयत्न उन कामों की प्रकृति में भी विकृति ला रहा है। जिन मर्यादाओं का नाथद्वारा के लोग पहले धार्मिक बंधनों के कारण कड़ाई से पालन करते थे उन्हें तोड़ने में नई पीढ़ी के नाथद्वारावासियों को सामान्यतः संकोच नहीं होता। यह बात मीनाकारी का काम करने वाले उन लोगों के सन्दर्भ में कहीं जा सकती है जो पहले उनके द्वारा बनाई गई वस्तुओं पर श्रीनाथजी का स्वरूप केवल इसलिए चित्रित नहीं करते थेे कि मीने को पकाने के लिए तेज़ आंच वाली भट्टी में देना पड़ता है। नाथद्वारा का चित्रकार पहले केवल धार्मिक चित्र भी इस स्वयं आरोपित बंधन के कारण ही बनाता था। श्रीनाथजी मंदिर का कीर्तनकार पहले अन्यत्र कहीं भी गाने को श्रीनाथजी के प्रति उसकी निष्ठा का उल्लंघन मानता था और मंदिर का रसोइया या ‘खर्च भण्डार‘ का कर्मचारी श्रीनाथजी के रसोई गृह में प्रयुक्त सामग्री की शुद्धता के संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही को श्रीनाथजी के प्रति उसके व्यक्तिगत अपराध के रूप में देखता था। 

किसी सम्प्रदाय को केवल उसके विश्वासों के आधार पर ही समझा जा सकता है। उससे प्राप्त होने वाले धार्मिक अनुभव से गुज़रने के लिए जिन मान्यताओं का स्वीकार ज़रूरी होता है वे तर्क, वैज्ञानिकता और कई बार तो समता और सामाजिक न्याय जैने उन व्यापक मूल्यों के साथ भी टकराती प्रतीत होती हैं जो हमारी वर्तमान मानवतावादी सभ्यता के सर्वस्वीकृत व सार्वभौतिक मूल्य हैं। श्रीवल्लभचार्य ने जिस काल में पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन किया उस काल के नज़रिए और आज के आम नज़रिए में बहुत अन्तर आ गया है और नाथद्वारा में आने वाले इन परिवर्तनों को भी शायद नज़रिए के इस अन्तर का ही परिणाम कहा जा सकता है। लगभग हर वस्तु के व्यवसायीकरण से नाथद्वारा के मध्यवर्ग की औसत आय में जो वृद्धि हुई है उसे देखते हुए बीते दिनों और पुराने मूल्यों की बात कुछ लोगों को न केवल प्रतिक्रियावादी लग सकती है वरन् वैसी बात करने वाले को कोई इब्सन के प्रसिद्ध नाटक  एन एनिमी आॅव् द पीपल के एक पात्र की भांति जनशत्रु भी ठहरा सकता है। बहरहाल यह कह पाना कुछ कठिन है कि शहरीकरण, यांत्रिकता और उपभोक्ता संस्कृति की जो बाढ़ आज सारी दुनिया को लील रही है उसके नाथद्वारा में भी घुस आने को भविष्य में किस रूप में देखा जाएगा। नाथद्वारा और उसके आसपास की आम ज़रूरतों को पूरा करने वाला एक बाज़ार तो नाथद्वारा में लम्बे समय से मौजूद रहा है पर इस बाज़ार के व्यावसायिक मूल्यों ने नाथद्वारा मंदिर और उसके संरक्षण में पनपी नाथद्वारा की विशिष्ट संस्कृति को अब तक कभी गंभीर रूप से प्रभावित नहीं किया था। अब लगता है कि मंदिर और उसकी गतिविधियों के सन्दर्भ में भी उसी युक्तिकरण (रेशनलाइजे़शन) का आरम्भ हो चुका है जो पहले केवल नाथद्वारा की व्यावसायिक और अन्य लौकिक गतिविधियों तक सीमित था। 

इसी दृष्टि परिवर्तन के कारण नाथद्वारा मंदिर में नक्कारखाने से अब नक्कारों और शहनाइयों के साथ ही केसेट्स पर रिर्कार्ड किए गए संगीत की ध्वनि भी सुनाई पड़ने लगी है। माणिक चैक में अब स्थानीय भंग-ठंडाई के साथ ही सभी प्रकार के अन्य सोफ्ट  पेय भी उपलब्ध हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि यहां के कुछ महंगे होटलों में ठहरने वाले यात्रियों की मांग पर उन्हें अब वैष्णवों के लिए निषिद्ध कुछ अन्य सामग्री तक उपलब्ध हो सकती है। कहना न होगा कि यदि नाथद्वारावासी अब भी इसे श्रीनाथजी की लीलास्थली या उनके पवित्र धाम के रूप में देखता तो वह शायद उसे इस तरह विरूपित नहीं होने देता पर जाने-अनजाने वह अब श्रीनाथजी के भक्त से अधिक शायद उस व्यापारी में बदलता जा रहा है जो बाहर से आने वाले सभी दर्शनार्थियों को अपने ग्राहकों के रूप में देखता है।

नाथद्वारा की साफ-सुथरी गलियों में अब अक्सर गंदगी फैली रहती है। शांत रहने वाली नाथद्वारा की इन्हीं गलियों में अब रात-दिन दुपहिया वाहनों का शोर भी बराबर सुनाई देता रहता है। यहां जलापूर्ति भी अब अपर्याप्त होने लगी है जबकि पहले यहां पानी की कमी नहीं रहती थी। नाथद्वारा की वे संस्थाएं भी, जो नाथद्वारा निवासी को कभी एक स्वस्थ सामाजिक जीवन का आश्वासन देती थीं, अब ह्रासोन्मुख हो गई हैं। वैष्णव धर्म से संबंधित कोई गंभीर साहित्य अब मंदिर के विद्याविभाग से प्रकाशित हो सके ऐसी स्थिति अब उसकी नहीं रह गई है। 

 यह सच है कि कालचक्र को रोका नहीं जा सकता। यह भी सही है कि आने वाले समय में हमारी दुनिया उतनी धार्मिक और रहस्यमयी नहीं रह जाएगी जितनी कि वह हमारे पूर्वजों के लिए रही थी। इस वास्तविकता से भी अब कोई आंख नहीं चुरा सकता कि सूर जैसे भक्त महाकवि और वल्लभाचार्य जैसे दार्शनिक धर्माचार्य की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा, एक विशिष्ट संगीत और चित्रशैली को पोषण देने वाला और आश्चर्यजनक रूप से इस शताब्दी के देर उत्तरार्द्ध तक भी कुछ लोगों को मध्यकालीन वैष्णव भक्ति का रसास्वादन करवा सकने में समर्थ नाथद्वारा नगर का अब फिर से अपनी पूर्व स्थिति को प्राप्त कर पाना कई कारणों से संभव नहीं लगता। बावजूद इसके जब एक स्थान विशेष को अनुप्राणित करने वाली किसी धार्मिक संस्कृति में बदलाव आता है तब शायद इस बात पर विचार करना उपयोगी हो सकता है कि इस बदलाव के परिणाम उस स्थान के प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के लिए कितने गहरे और कितने दूरगामी हो सकते हैं।  

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: जनवरी ,1994 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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