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डा. मनोज श्रीवास्तव की तीन नई कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 03, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 03, 2011


कोई ख़ास खबर नहीं है

सृष्टि विसर्जन की भविष्यवाणियाँ
सेक्सी गानों के बीच 
ब्रेक के रूप में की जा रही हैं,
बच्चे टी.वी. की टैलेंट हंट सीरियलों में 
नाचती-गाती लड़कियों के साथ
कमर मटका रहे हैं
और उनमत्त किशोर 
क्रिकेट की जीत पर 
छतों पर पटाखे छोड़ रहे हैं
जबकि विश्वविद्यालय के भाषा-संकाय में
इतरभाषियों का क़त्ल
ठीक राष्ट्रगान के बाद किया जा रहा है

कोई ख़ास बात नहीं है
जिन भाषाविदों ने मासूम लड़की की 
इतरभाषा बोलने के जुर्म में 
इस्मत-अस्मत लूट निचाट में 
क्रूर ठण्ड की दया पर छोड़ दिया था,
वे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के
शिष्ट मंडल की ओर से
विश्व हिन्दी सम्मलेन में शिरकत कर रहे हैं

बातें कुछ ख़ास नहीं हैं
सहज आतंकी आदतों में 
विस्फोट में हलाख हुओं की ज़िम्मेदारी 
बच्चे खुशी-खुशी लेना चाह रहे हैं
और गाँव के मदरसों में
बच्चे कागज़ की नाव से आर डी एक्स के ज़खीरे 
वाया साऊथ ईस्ट एशिया
महानगरों में सप्लाई कर रहे हैं,
मै उन लीडरों की दरियादिली की दाद देता हूँ
जो इन होनहार बच्चों की हौसला आफजाई में 
गणतंत्र दिवस पर सम्मानित करने की वकालत कर रहे हैं 
बेशक! इन बच्चों को खौफ़नाक़ विस्फोटक सौंप कर 
अभी चन्द्रमा और मंगल पर भेजा जाना है
यही कौमी माहौल
बाकी गैलेक्सियों  में भी फैलाया जाना है

इस साधारणीकृत दौर में 
कहने को कुछ ख़ास नहीं है
हाँ, वैज्ञानिक प्रयोगों के तहत 
पृथ्वी, विनाश की रोमांचक प्रक्रिया में है
जिसे प्रागैतिहास में वापस भेजने के लिए 
दिवंगत तानाशाहों के प्रेतों के पुनर्जन्म में 
विज्ञान   को सफलता मिलने वाली ही है,
जबकि गुमटियों  पर गरमागरम चाय-पकौड़ों  की सेल 
कुछ ज़्यादा ही बढ़ती जा रही है.
 
क्रिकेट का हवाओं के साथ खिलवाड़

ख्यातिलब्ध फील्डों में
क्रिकेट-कुहराम मचाते खिलाड़ी
अपने शातिर गांडीव-बल्ले भांजते
उतर आते हैं
भोली-भाली बेकुसूर हवाओं में

बर्दाश्त किया जा सकता है
उनका--
खुराफाती टी०वी० स्क्रीन से उतर कर
खालीपन में परोसे गए
समय को फांकते हुए,
लोगों की ज़िन्दगी में  
दखल डालना,
या,
हाटमेलों
प्लेटफार्मों और ट्रेनों में
छुट्टी मनाते घंटों में 
यात्रियों की निरीह और 
विकलांग बहसों में 
बेमतलब घुस आना 
और उनकी समूची दिनचर्या के 
अहम हिस्से का
सिर कलम कर देना

उनका क्या हक बनता है
की वे
अपनी गहमागहमी से
भोली-भाली हवाओं को
प्रदूषित कर दें
और चैन की पंछियों का
दम घोंट दें

क्रिकेट-दूषित हवाएं
हराम कर रही हैं
उन क्षणों का व्यस्त होना
जिनके कड़ीबद्ध होने से
उड़ते बहुमंजिले सड़कदार पुल
पल में तय कर देते हैं
अगम्य स्थानों की
थकाऊ दूरी,
वे दुधमुंहों को औचक बालिग बना
उनके पेट में
भर देती हैं
फ़िज़ूल आंकड़ों का कूड़ा

मैं ऐसे संक्रामक प्रदूषकों को
चेता देना चाहता हूँ की
वे विकास और धंधों में
संवहनीय हवाओं के साथ
खेल-खिलवाड़ न करें.

वैष्णो बाला

इसी उत्तल-उत्तुन्ग
दुर्भेद्य अपमार्ग से
गयी थी एक बाला,
जिसके क्रोध ने
बना दिया था देवी उसे

कैसे बचाया होगा
उसने स्वयं को?
हांबचाया था
स्वयं को
और इस सुकुमारी 
वनविहारिणी सुन्दरी को भी--
शील-भंग होने से,
चढ़ते हुए उन नुकीले शिखरों पर
जिन पर पिपीलिकाओं तक के
          पाँव फिसल जाते हैं,
ब्यालों से बचकर छिपते हुए
उन गुह्य कंदराओं में
जिनमें घुसते हुए
केंचुए तक की कमर टूट जाती है

आखिरकारप्रतिशोध ने
विवश कर दिया होगा उसे
अपूर्व बल अर्जित करने के लिए,
तब उसने सम्पूर्ण स्त्री-बल से
कलम कर दिया होगा--
अहंकार का सिर,
निष्ठुर पौरुष के खिलाफ
छेड़ा था संग्राम जो उसने,
उसकी विजय-परिणति हुई थी यहीं,
यहीं उसने कामांधता को रौंद
बजाया था विगुलनाद

जब कभी निरीहता
असमर्थता की कैद से मुक्त हुई होगी,
एक तीर्थ-स्थल बना होगा वहां
और ताकत की तलाश में निरीहजन
आखिरकार
पहुंचे होंगे यहीं--
मनस्वी निष्ठा से
इस बाला को पूजने,
आत्मबल अर्जित करने का जिसने
जीवंत संदेश पहुंचाया कोने-कोने.




योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव 
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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