सारे जग में नाम कमायो मीरा मेड़तरी - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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सारे जग में नाम कमायो मीरा मेड़तरी

चित्तौड़गढ़ 11 अक्टूबर। 

मीरा मंदिर ,चित्तौड़ 

मीरा गिरधर को बुलाने के निमित्त कुछ भी करने को तत्पर रही और उसी उतावलेपन की स्वभाविक अनुभूति दुर्ग चित्तौड़ स्थित मीरा मन्दिर में आयोजित भजन किर्तन में हुई। महाराज राधाकृष्ण जी के सानिध्य में पहले कीर खेड़ा और बाद में किले की पुरानी बस्ती में निकाली गई प्रभातफेरी जब अपने भक्तजनों सहित मीरा मन्दिर पहुँची तो बच्चे, बूढ़े और औरतों ने मीरा भजनों का आनन्द लिया। भक्तिमती मीरा और राधाकृष्ण जी के जन्म दिवस पर दीप प्रज्ज्वलन के बाद संस्थान के पदाधिकारियों और संगीतरसिकों ने मीरा और स्वामी जी को पुष्प अर्पित किये। इस अवसर पर व्यवसायी अशोक समदानी, चित्रकार उषा शिशोदिया, रामायण मण्डल अध्यक्ष भगवान काबरा, पूर्व पार्षद बाल मुकुन्द मालीवाल, संस्थान सचिव सत्यनारायण समदानी, सह सचिव डाॅ. ए.एल. जैन, जे.पी. भटनागर, मीरा मन्दिर समिति अध्यक्षा आनन्द कंवर सांधु, राकेश मंत्री, मोहन कंवर शक्तावत, उपाध्यक्ष शिवनारायण मानधना, जी.एन.एस. चैहान, अरविन्द पुरोहित और अध्यक्ष भंवरलाल शिशोदिया, रूपसिंह शक्तावत शामिल थे।

पाण्डाल में वातावरण का पूरा आनन्द बिखर रहा था। जहाँ हर तबके से ताल्लुक रखने वाले भक्तजन अपनी मस्ती में तालियों, नृत्य और अपने चिन्तन से साथ दे रहे थे। महिलाओं की अधिकाधिक संख्या और मंजीरे हाथ में लिये नृत्य करते कईं भक्तजन पूरे आयोजन में भक्ति में डूबे नजर आये। वहीं ऐसे अवसर को देशी-विदेशी पर्यटक अपने कैमरे में कैद करने से नहीं चूके। सबसे पहले महाराज और उनके प्रभातफेरी के कलाकारों ने कई सारी छोटी-छोटी रचनाएं सुनाकर ऐसा वातावरण बना दिया, मानो सभी भक्त और भगवान दोनों में फर्क मिट गया हो। ‘’घुंघरू छम छमा छम बाजे रे’’ और ‘‘थारी चाकरी में चूंक कोनी राखूँ’’ जैसे कीर्तनमुखी भजनों में यही भाव निकला कि मीरा और कृष्ण का भक्तिभाव यदि कोई भी भक्त रख सकता है तो उसका भवसागर पार होना मुश्किल नहीं हैं। महाराज ने बीच-बीच में अपने अन्दाज में कुछ भाव-भक्ति के प्रसंग भी सुनाये। मगर कीर्तन भी प्रमुख आकर्षण रहा। अन्त में गिरधर की दिवानी मीरा की ओर से बधाई गीत प्रस्तुत किया। जिसमें ‘‘बाजे रे बाजे बधाई तोरे अंगना’’ के साथ ही पुरा पाण्डाल मीरा के जरिये ठाकुरजी में विचार मग्न हो गया।

भजनोंत्सव के दूजे पडाव पर मेड़ता नागौर से पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर के सौजन्य से खयाल गायकी के कलाकार छोटा उगमराज ने अपनी प्रस्तुति दी। ‘‘साँवरा आओ तो सरी’’, ‘‘सारा जग में नाम कमायो’’, ‘‘पशु समान नर भजन बिना’’ और आखिर में ‘‘काना काकरियाँ मत मार’’ जैसे भजनों को एक के बाद एक गूँथकर प्रस्तुत करते हुए गायक दयाराम भाट, चिमटावादक लक्ष्मीनारायण, ढोलकवादक उगमराज, खड़तालवादक जितेन्द्रकुमार और खंजरीवादक सद्दीक भाई ने सभी श्रोताओं को वो सबकुछ दिया जो वो सोचकर मीरा मन्दिर आये थे।

दुर्ग पर हुए इस आयोजन की आखिरी कड़ी में उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र इलाहाबाद की ओर से आई डाॅ. रेणू निगम ने भी अपने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय अन्दाज की गायकी से बाकी बचे संगीत रसीकों को लुभाया। अपने संगत कलाकार आर्गनवादक पंकज शुक्ला, तबलावादक हरिशरण मिश्रा और पेडवादक दीपू चैहान के संगीत संयोजन में ‘‘नटवर नागर नन्दा भजो रे मन गोविन्दा’’ जैसे कीर्तन के साथ शुरूवात की और राग पीलू पर आधारित भजन मोरे तो गिरधर गोपाल सुनाया। कुल मिलाकर सभी भजनों के बहाने उपस्थित भक्तों ने यही आभास किया कि साक्षात मीरा इस मन्दिर में प्राकट्य रूप में आकर गिरधर को रिझाने का पूरा प्रयास कर रही हैं। 

ये वहीं मीरा है जिसने सूर तुलसी के युग में अपनी समृद्धिशाली रचनाओं से पूरे देश में एक खास दर्शन को जन्म दिया हैं। आखिर में राग भूपाली पर आधारित रचना ‘‘हरि गुण गावत नाचूँगी’’ और दक्षिण भारतीय राग पर बने भजन ‘‘प्यारे दर्शन दिज्यो आज’’ से सभी प्रभावित हुए। इस अवसर पर चित्तौड़ के मालियों की बाड़ी निवासी डालीबाई बनाम मीरा जो खुद बचपन से ही गिरधर भक्ति के जुनून में डुबी थी। मीरा मन्दिर पहूँचने पर डा. रेणू निगम को पुष्पाहार भेंट करते समय फफककर रो पड़ी। ये करूण दृश्य देख उपस्थित श्रोताओं ने दो मीरा भक्तों का अपूर्व मिलन अनुभव किया।सुबह 8 से 10 बजे तक लगातार चले इस पूरे कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी उदघोषक माणिक और समाज सेविका कुन्तल तोषनीवाल ने किया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

माणिक,
वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.

उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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