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कविता-छायाचित्र प्रदर्षनी का उद्घाटन

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 17, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 17, 2011

 भोपाल .
‘बिटियों पर केन्द्रित अनिल गोयल की काव्यात्मक छायाचित्र प्रदर्षनी दिलो-दिमाग को छूने और झकझोरने वाली है। बिटियों के बहाने उन्होंने सदियों से व्याप्त कुरीतियों पर मार्मिक चोट की जिसके चलते और चिकित्सकीय उपकरणों के कारण लड़कियों पर गहरे संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सामाजिक समस्याओं और समाज के उपेक्षित, कमजोर वर्गों पर सरकार विभिन्न योजनाओं के जरिये कार्य करती है, पर अनिल गोयल जैसे प्रतिबद्ध, संवेदनषील कलाकार जिस पैषन, जुनून और अनूठेपन से काम करते हैं वह न सिर्फ प्रषंसनीय है बल्कि अनुकरणीय और सकारात्मक भी है। सरकार से इतर जो व्यक्तिगत कोषिषें होती हैं उनमें गोद में बच्चा लेकर फोटो खिंचवाने और प्रचार-प्रसार की कुत्सित चेष्टा नहीं होती।’ यह बात स्त्री विमर्ष के लिए पहचानी जानेवाली सुपरिचित लेखिका-पत्रकार निर्मला भुराड़िया ने कही। वे गत दिवस ‘आलोक आस्था लोक कल्याण समिति’ के तत्वावधान में संयोजित चार दिवसीय प्रदर्षनी ‘बिटिया की चिठिया’ के उद्घाटन के मौके पर उपस्थित हुई थीं। 

सुश्री भुराड़िया ने यह भी कहा कि पुत्र के लिए जबर्दस्त चाह के पीछे सामाजिक कुरीतियां अधिक दोषी और जवाबदेह हैं। कानून और विभिन्न योजनाएं चिंतनषील लोगों के इस तरह के प्रयासों से ही कारगर हो सकती हैं। लोगों के सोच में, अंदाज में, आचार-विचार में बदलाव होना जरूरी है। मां-बाप को बेटा-बेटी को लैंगिक पक्षपात के रूप में न देख अपनी संतान के रूप में ही देखना चाहिए। बेटा हो या बेटी बुजुर्ग माता-पिता के प्रति संतान की जिम्मेदारी बनती ही है और उनकी सेवा करना कर्तव्य ही नहीं बेटी का भी अधिकार है।’

इस मौके पर कवित-फिल्मकार अनिल गोयल ने अपनी रचनाषीलता से रुबरु कराते हुए कहा कि मैंने हर उस विषय पर काम किया और करता रहूंगा जिसे बचाने की जरुरत है। बेटियां कोख में नष्ट की जा रही हैं। जन्मोपरांत उनके सपनों, अस्मिता, व्यक्तित्व को ध्वस्त करने, अपमानित करने की कोषिषें की जाती हैं। मां के कई रूप जैसे नदी, धरती, गाय आदि को लुप्तप्राय बनाने का षडयंत्र तेज हो चुका है। मैंने बेटी के बहाने लैंगिक भेदभाव खत्म करने, उसे सहजता से जीने, आगे बढ़ने की चाह जताई है।’

वरिष्ठ कवि नरेंद्र जैन ने इन कविता पोस्टर्स को कुरीतियों, सामाजिक समस्या पर मार्मिक चोट करनेवाला बताया और कहा कि इस तरह की रचनात्मक के लिए जुनूनी होना जरुरी होता है। इसके लिए बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता है। अनिल गोयल ऐसे ही चुनिंदा लोगों में हैं जो नायाब, बेजोड़ कर दिखाने की जिद रखते हैं।





‘बिटिया की चिठिया’ प्रदर्षनी का उद्घाटन दर्षकों में उपस्थित बेटियों ने ही किया। कार्यøम का संचालन आलोक गच ने किया और आभार प्रदर्षन किया समिति के अध्यक्ष कमल गोयल ने। उद्घाटन के मौके पर वरिष्ठ कवि नरेंद्र जैन, ध्रुव षुक्ल, रंगकर्मी राकेष सेठी, रत्नाकर राउत, रवींद्र गावंडे, प्रवीण श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे। दर्षकों ने करवा चौथ पर लगे कविता पोस्टरों को भी रुचि से देखा और सराहा। छायाचित्रों से सजी कविताओं, गजलों, नवगीतों की ‘सोचो जरा हमारे बिन/ बसा सकोगे घर-परिवार’ या ‘कोई हाल ना समझे, जाने/ इसके घायल दिल व्याकुल का’, ‘शुभ, पावन मंगल है बेटी/ शुभ कर्मों का फल है बेटी’ आदि पंक्तियां दिल को छूनेवाली लगीं। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
विनय उपाध्याय
('कला समय' जैसी गहरी जड़ों वाली कलावादी पत्रिका के साथ ही हालिया प्रकाशन से पाठकों के बीच सार्थक संवाद करती हुई रंगमंच की पड़ताल करती पत्रिका ' रंग संवाद' के सम्पादक हैं.भोपाल में रहते हुए देशभर में कला समीक्षक और जानकार उदघोषक के रूप में जाने जाते हैं.)

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अनिल गोयल 

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