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रीजनल भाषाओं का विलुप्त होना शुरू

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, अक्तूबर 18, 2011 | मंगलवार, अक्तूबर 18, 2011

भारत में  रीजनल भाषाओं का विलुप्त  होना शुरू हो गया हे | भारत सरकार  ऐसा कोई सर्वे करवाती हे या नहीं हे तो पता नहीं परन्तु "यूनिस्को  एटलस ऑफ़ थे वर्ल्ड लेंग्वेगेस इन डेंजर " जो की यूनाइटेड नेशनल एजुकेशनल  साएंटीफिक  एंड कल्चरल ओर्गानेसन द्वारा बनाया गया हे जिसमे विलुप्त होती जा रही पुरे विश्व की छेत्रीय भाषाओ की जानकारी दी गयी हे |

भारत की कुल १९८ छेत्रीय भाषाओ को "डेंजर ज़ोन "  में रखा गया हे | नेपाल ,भूटान ,एवं बंगलादेश की सीमाओं पर बोली जाने वाली ५ भाषाओ  अहोम, एंड्रो, रंकास ,सेंगाई, तोलचा पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हे जिनको कोई बोलने वाला नहीं हे |  ४२ भाषाओ को लाल रंग से मार्क किया गया हे  जो जिन पर खतरा मंडरा रहा हे नाइकी व् निहाली जो मध्य भारत में बोली जाती हे खतरे में हे | साउथ में बोली जाने वाली तोडा ,कुरुबा ,बेलारी  भी खतरे में बताई जा रही हे | पेंगो एवं बिरहोर भी खतरे में हे | नेपाल की सीमा पर बोली जाने वाली टोटो, ब्न्गनी ,पंग्वाली ,सिर्मौन्दी  भी खतरे में बताई गयी हे | ६ भाषाओ को सिवियरली खतरे में बताया गया हे जिसमे गेटा नामक भाषा पूर्वी तटवर्तीय सीमा पर बोली जाती हे खतरे में बताई गयी हे | बाकि ५ भाषाए बंगलादेश एवं भूटान की सीमाओं पर बोली जाती हे |जिसमे अटोंग, अतोन , रेमो, टाइफैक , मुख्या रूप से पीले रंग से मार्क की गयी हे |इन भाषाओ पर यदि ध्यान दीया जाता हे तो इनको बचया जा सकता हे |

इसके अलावा ६३ भाषाओ को निश्चित रूप से खतरे में बताया गया हे जो पीले रंग से मार्क की गयी हे | यदि समय रहते इन पर ध्यान दीया जाता हे तो इनको बचया जा सकता हे | इनमे मुख्या रूप से नेपाल, भूटान, बंगलादेश की सीमाओं पर बोली जाने वाली भाषाए हे मध्य में बोली जाने वाली  न्हाली, कोलामी आदि भाषाओ पर अभी ध्यान देने की जरुरत हे |

इसके अलावा ८२ भाषाओ वनरेबल इन डेंजर बताया हे जो कभी भी विलुप्त हो सकती हे | गोंडी,बोडो, बोकर, मणिपुरी केलो , गड्वाली ,गोंडी, सिमी व् अन्य भाषाओ को इस कटागरी में लिया गया हे |ये भाषा जिन्दा तो हे परन्तु खतरा कभी भी बाद सकता हे | हाल में राज सभा में एक मेम्बर ने भी यह मुद्दा सदन में उठाया था परन्तु कोई संतोष जनक जवाब नहीं दीया गया | सिर्फ यूनिस्को माप की व्याख्या की गयी हे |

भारत सरकार का घरह मंत्रालय को समय रहते इन रीजिनल भाषाओ पर समय रहती ध्यान देना होगा तभी इन विलुप्त होती इन भाषाओ व् लोगो की प्रति न्याय होगा | अन्यथा संस्कृति व् भाषाओ का धनि देश जिसकी हर १० कोस पर भाषा बदल जाती हे ये बोलिया इतिहास बन कर रह जावेगी | और आनेवाली पीडी हम सब से जवाब मांगेगी तब हमारे हाथ में कुछ नहीं होगा.|

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

राजेश एस . भंडारी "बाबु"

104, महावीर नगर, इंदौर
फ़ोन 9009502734
rb@indoreinstitute.com
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