अशोक जमनानी की नई कविता - अपनी माटी

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अशोक जमनानी की नई कविता

जिस दिन

धूप में तपिश न हो 
धूप जैसी 
सूरज दिन काट रहा हो 
अनमना होकर 
बादलों के आवारा छोकरे 
आवारगी से थक कर
सोच रहे हों
संजीदा हो जाने के बारे में
मद्धम मद्धम बहती हवा
चल रही हो ऐसे
जैसे थकी हुई चेरी
बेमन से पूरा करे
हुक्म मालकिन का
ऐसे बेढब से दिन में 
जब न नींद आती है 
न तुम्हारी याद आती है 
जिंदगी लगती है 
बेवजह लदा हुआ बोझ    
और धड़कता हुआ दिल 
लगता है ऐसे 
जैसे 
ख़त्म हो चुके मेले में 
घूम रहा हो कोई 
खाली झूला 
धक्-धक् 
धक्-धक् 
धक्-धक्    

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
अशोक जमनानी

होशंगाबाद,मध्यप्रदेश के निवासी होकर देशभर में अपने पिछले कुछ सालों में प्रकाशित और चर्चित उपन्यासों के कारण जाने जाते हैं. स्पिक मैके जैसे सांस्कृतिक आन्दोलन में सभी बड़े ओहदों पर रहे हैं. संस्कृतिकर्मी होने के साथ ही वे 'अपनी माटी; के प्रबंध सम्पादक भी हैं.

उंका रचानाकरी उनकी वेबसाईट अशोकनामा पर देखा/पढ़ा जा सकता है. 
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