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''सफलता, प्रगति या सुन्दरता की कल्पना अब निजी पारिवारिक इकाई के संदर्भ में मान ली गयी है '-डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 23, 2011 | रविवार, अक्तूबर 23, 2011


यदि हम पिछले कुछ दशकों पर नजर डालें तो हमें लगेगा कि हमारे यहां आत्मकेन्द्रितता की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। लगता है  आज आम भारतीय सफलता, प्रगति या सुन्दरता की कल्पना किसी सामाजिक या राष्ट्रीय संदर्भ में करने के बजाय केवल अपने या अपनी निजी पारिवारिक इकाई के संदर्भ में करने का अभ्यस्त होता जा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय हमारे यहां राष्ट्र के लिए व्यक्ति के उत्सर्ग के जिस देशव्यापी भाव का संचार हुआ था उसका अब जैसे सर्वथा लोप हो रहा है। निःस्वार्थ भाव से समाज या राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रयत्न करने की बात अब विशिष्ट अवसरों पर केवल राजनेता करते हैं, पर जन-मन में इस बात के प्रति जैसे एक अनास्था सी घर कर गई है। जनहित या परार्थ संबंधी समूची शब्दावलीका अब जैसे अवमूल्यन हो गया है। 
  
स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर पहले देश के प्रति अनुराग, अभिमान एवं उत्सर्ग की जो एक प्रबल लहर औसत भारतीय के मन में उभरती थी, उसका इन पर्वों पर उभरना भी अब जैसे बंद सा होता जा रहा है। राष्ट्रीय दिवसों पर भी घरों से निकल कर, राष्ट्रीय एकता के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज का वंदन करने और राष्ट्रगान के सामूहिक स्वर में अपना स्वर मिलाने की इच्छा हमारे युवाओं तक में अब सामान्यतः नहीं दिखाई देती। बहुत से उन भारतीयों के मन में, जो आज इस देश से बाहर जा बसे हैं, अपना वतन छूट जाने का कोई अफ़सोस नहीं। इनमें से कुछ के साथ बात करते हुए तो ऐसा लगता है जैसे यह देश कोई डूबता हुआ जहाज़ हो और इसीलिए वे इसे छोड़कर चले गए हों। अधिक आराम, अधिक पैसे और अधिक सुरक्षित भविष्य की चाह से  अपने ही देशवासियों और सम्बन्धियों को छोड़ कर चले जाने का कोई दुःख उन लोगों को हो ऐसी उनकी बातों से नहीं लगता। न ही उन्हें यह सोच कर कोई कृतघ्नता का बोध होता लगता है कि जिस देश की माटी में उनका जिस्म ढला और जिस समाज ने उन्हें पाल पोस कर योग्य बनाया, उसके भविष्य के प्रति आज वे इस क़दर क्यों बेख़बर हो गए हैं।

मित्रों या रिश्तेदारों के आपसी सम्बन्धों में भी अब मात्र एक औपचारिकता निर्वाह का भाव दिखाई देता है। लोगों के बीच आपसी विश्वास, सहानुभूति, सद्भाव और भाईचारे के भावों में भी अब निरन्तर कमी आती जा रही है।  राष्ट्र एवं समाज की कीमत पर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति अब भारतीय का सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। इस प्रवृत्ति में इस कदर वृद्धि हुई है कि लोगों को अपने किसी राष्ट्रविरोधी या समाजविरोधी कृत्य में कोई अपराध बोध भी नहीं होता। हमारे नैतिक मूल्य कुछ इस तरह गड़बड़ा गए हैं कि अब तक अधर्म समझे जाने वाले बहुत से कृत्यों को जैसे व्यापक सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है। बहुत सा सामाजिक या पारिवारिक व्यवहार जो अब तक हमारी परम्परा की दृष्टि से लोकविरुद्ध आचरण समझा जाता था, सामान्य लोकाचार की श्रेणी में आ गया है। 

अपने आसपास के जीवन पर नज़र डालें तो हमें इन बातों के अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। रात्रि के समय यदि आपको किसी ट्रेन से दूर की यात्रा करनी हो और आरक्षित शयनयान में एक शायिका   के लिए यदि किसी को कुछ देने लेने से काम बनता हो तो, बहुत कम ही लोग होंगे जिन्हें पैसा देने-लेने में संकोच होगा।अपने बच्चे का किसी शिक्षण संस्थान में प्रवेश करवाने के लिए डोनेशन आदि के नाम पर अतिरिक्त पैसा ख़र्च करना और इस तरह अधिक योग्यता किन्तु कम पैसे वाले किसी अन्य छात्र को उस प्रवेश से वंचित करना अब गर्हित आचरण की श्रेणी में नहीं आता। किसी सरकारी डाक्टर से अपना निदान या अपनी चिकित्सा ठीक से करवाने के लिए, किसी सरकारी दफ़्तर से अपनी फ़ाइल समय पर निकलवाने के लिए, किसी सरकारी नौकरी के लिए या किसी इच्छित स्थान पर स्थानांतरण के लिए पैसा खर्च करना-करवाना अब हमारी आदत में शुमार होता जा रहा है। 

लोगों की आत्मलीनता अब इस कदर बढ़ी है कि कई बार तो उन्हें अपने परिवेश तक की ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं मिलती। आप पाएंगे कि किसी समृद्ध व्यक्ति के घर से कुछ ही दूर दरिद्रता मुंह बाए खड़ी है और वह उसके प्रति पूरी तरह बेख़बर है। सार्वजनिक उपयोग के स्थानों पर सफ़ाई या व्यवस्था के अभाव का एक प्रमुख कारण यह है कि लोगों को उसका ख़याल केवल उस समय आता है जबकि उन्हें स्वयं इन स्थानों का उपयेाग करना होता है। हमारे सार्वजनिक उद्यानों, सार्वजनिक चिकित्सालयों, सार्वजनिक वाचनालयों, सार्वजनिक प्रतीक्षालयों, सार्वजनिक शौचालयों आदि की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है।

नगरपालिका, विद्युत या जलदाय विभाग जैसे निकायों की सख़्ती में जरा सी ढील आते ही लोगों की स्वार्थपरता खुल कर सामने आ जाती है। अपने घर में सामने वाली नाली का पानी बह कर कहां जा रहा है और आगे किस स्थान पर रुक कर दूसरों के लिए क्या समस्या पैदा कर रहा है इसकी चिन्ता करने वाले अब आपको बिरले ही मिलेंगे। नलों में यदि पानी का दबाव कम हो और किसी को पता न चले तो लोग किसी मोटरचालित पम्प को सीधे लाइन पर ही लगा लेंगे। यदि राजकीय शिक्षण संस्था के शिक्षण में कहीं कोई ख़ामी दिखाई दे तो उसकी स्थिति में सुधार की कोशिश के बजाए लोग उस संस्था के अध्यापकों को पैसा देकर अपने बच्चों की प्राइवेट ट्यूशन के लिए लगा लेंगे। संघर्षरत व्यक्तियों का साथ देने के बजाए लोग मौक़ा पड़ने पर उन्हीं के साथ विश्वासघात कर जाएंगे और किसी तरह अपना उल्लू सीधा कर लेंगे। राह चलते दुर्घटनाग्रस्त हो जाने वाले किसी बदनसीब की मानवीय संवेदनावश सहायता करने और उसे तुरन्त चिकित्सालय तक पहुंचाने की इच्छा करने वाले भी अब मुश्किल से ही मिलते हैं।

लोगों की बढ़ती आत्मकेन्द्रितता का एक अपरिहार्य परिणाम हमारी अधिकांश सार्वजनिक सेवाओं का निरन्तर ह्रास है। व्यक्तिगत लाभ और अधिकाधिक प्राप्ति के लालच ने लगभग हर सार्वजनिक सेवा के निजीकरण को बढ़ावा दिया है।  अनैतिक आचरण को मिलने वाली व्यापक सामाजिक स्वीकृति के फलस्वरूप नियम पालन व नैतिकता की बात करने वाले को ही अब कई लोग सनकी और सिरफिरा कहने लगे हैं। इस पर विडंबना यह है कि अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के प्रति आचरण में अनैतिकता की सिफ़ारिश करने वाले ख़ु़द अपने लिए मन ही मन दूसरों से दया, इन्साफ़ और नैतिकता की अपेक्षा रखते हैं। आचरण और अपेक्षा का यह दोहरापन लोगों के विघटित व्यक्तित्व व विघटित सोच तथा हमारे समाज के विघटित मापदंडों को भलीभांति उजागर करता है।

   भारतीय परिवार की संस्था भी, जिसका कि मूलाधार ही निःस्वार्थ स्नेह व कर्त्तव्यपालन रहा है आज इस सर्वव्यापक आत्मकेन्द्रितता की चपेट में आए बिना नहीं रह पाई है। पश्चिमी देशों की भांति हमारे यहां भी परिवार का अर्थ केवल पति, पत्नी और बच्चे होता जा रहा है। हर पत्नी अब यह चाहती है कि उसके इस परिवार में देवर, जेठ, ननद आदि का दख़ल न हो और अपनी लड़की को ससुराल के लिए विदा करते समय उसके मां बाप भी अब सामान्यतः यह चाहते दिखते हैं कि उसे अपने ससुराल वालों का भार कम से कम उठाना पड़े। परिवार के स्वार्थ अब पति-पत्नी और बच्चों तक केन्द्रित हो जाने का परिणाम यह हुआ है कि संयुक्त परिवार आड़े समय में अपने कई संबंधियों की पहले जो सहायता सहज रूप से कर दिया करता था उस सहायता से आज व्यक्ति लगातार वंचित होता जा रहा है। वृद्ध और  मुसीबत के मारे लोग अब परिवार की ओर से अधिकाधिक बेसहारा होते जा रहे हैं।

यह कहना शायद गलत न होगा कि पिछड़े वर्ग में भी सामूहिक प्रगति का स्थान अब व्यक्तिवादी सोच लेता जा रहा है। पिछड़े वर्ग का व्यक्ति आज अपने जैसे सभी पिछड़ों का हाथ पकड़ उन्हें ऊंचा उठाने का प्रयत्न करने के बजाय पहले अपने और अपने ‘परिवार‘ के लिए समाज में कोई ऊंचा स्थान सुरक्षित कर लेना चाहता है। इस समूचे वर्ग की बढ़ती आत्मकेन्द्रिता का कुछ सांकेतिक आभास हमें शायद इस परिवर्तन में मिल सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में इस वर्ग के मानस में इसके प्रमुख उद्धारक का स्थान गांधीजी (जो न केवल इस वर्ग के कल्याण वरन् समूचे राष्ट्र या समूची मानव जाति के कल्याण की बात सोचते थे) वे बजाय डॉ. अम्बेडकर ने ले लिया है।

राष्ट्रीय हितों को अपने निजी व प्रांतीय हितों से ऊपर न रख पाने का ही एक परिणाम यह भी हुआ है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद तक भी हम अपनी राष्ट्र भाषा की समस्या का कोई कारगर हल नहीं निकाल पाए हैं। अंग्रेज़ों की दासता से मुक्त होकर भी यह देश अब तक अंग्रेज़ी की दासता से मुक्त नहीं हो पाया है। वस्तुतः अंग्रेज़ी का ज्ञान जिस तरह कुछ लोगों को एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग में शामिल करके उन्हें दूसरों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण बना देता है वह उनकी आत्मकेन्द्रितता को पोषण देने के साथ ही अंग्रेज़ी को इस देश में बनाए रखने के लिए भी एक जबरदस्त अभिप्रेरण का काम करता है।

हमारी आत्मकेन्द्रितता में होने वाली इस वृद्धि के कारणों पर विचार करते हुए हमें लगता है कि हमारा समाज अचानक एक विश्वव्यापी उपभोक्ता संस्कृति की गिरफ़्त में आकर अपनी उस सांस्कृतिक परम्परा से कट गया है जो त्याग, सादगी, परार्थ और कर्त्तव्यपालन जैसे तत्त्वों पर अत्यधिक बल देती थी। परम्परा से यह कटाव हमारे उस नवधनाढ्य वर्ग में स्पष्टतः देखा जा सकता है जिसे हमारे यहां होने वाले आर्थिक विकास का सर्वाधिक लाभ मिला है। जो वर्ग अब तक आर्थिक रूप से परतंत्र रह कर अब स्वतंत्रता हासिल कर रहे हैं वे भी अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति उपभोक्ता संस्कृति के रंगीन और भंगुर खिलौनों में ढूंढ रहे हैं। आज युवकों व महिलाओं में अधिक वस्त्रों, अधिक तेज़ वाहनों, इलेक्ट्रानिक उपकरणों, सौन्दर्य प्रसाधनों, सैर-सपाटों आदि के लिए जो अदम्य आकर्षण उत्पन्न हुआ है उसे इन परिवर्तनों की रोशनी में भलीभांति समझा जा सकता है। आत्मकेन्द्रितता व्यक्ति मंें एक प्रकार का आत्मप्रेम पैदा कर उसे अपनी ही ओर सर्वाधिक ध्यान देने को प्रेरित करती है। पिछले दशकों में हमारे यहां साबुन व डेटर्जेण्टों की संख्या व किस्मों में जो वृद्धि हुई है उसका सम्बन्ध केवल सफ़ाई व स्वास्थ्य विज्ञान से न होकर कुछ हद तक आत्म-प्रदर्शन व आत्म-मुग्धता की उस प्रवृत्ति से भी है जिसने हमारे ब्यूटी-पार्लरों व हेल्थ क्लिनिकों की संख्या को यकायक बढ़ा दिया है।

भोगवादी दृष्टि के विकास ने व्यक्ति को आज केवल भौतिक उपलब्धियों में ही जीवन की सार्थकता ढूंढने को प्रेरित किया है। वे तमाम सूक्ष्म व अगोचर अवधारणाएं जो उससे भौतिक वस्तुओं के त्याग की मांग करती हैं धीरे-धीरे उसकी अनुभूतियों के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। यही कारण है कि जो लोग आज किन्हीं तीर्थ स्थानों या प्राकृतिक स्थलों पर जाते हैं उनमें से अधिकांश वहां भी उसी शोर शराबे भरे व उत्तेजक जीवन की खोज करने लगते हैं जिसके वे अब रात-दिन आदी हो गए हैं। ऐसे लोगों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ इन प्राकृतिक व धार्मिक स्थानों का अपना विशिष्ट सौन्दर्य भी धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है। 

भौतिक उपलब्धियों के मूल में चूंकि पैसे की ही भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहती है, आत्मकेन्द्रित व्यक्तियों के लिए श्रेष्ठता का एकमात्र मापदंड पैसा रह जाता है। भारत जैसे सीमित साधनों और घनी आबादी वाले ग़रीब मुल्क में, जहां कि अधिकांश रोज़गारों में नैतिक तरीकों से अपनी आय बहुत अधिक बढ़ा लेने की कल्पना नहीं की जा सकती, प्रलोभन ग्रस्त व्यक्ति सरलता से अपने नैतिक मूल्यों की क़ुर्बानी के लिए तैयार हो जाता है। व्यक्ति दूसरों के हित की बात भी तभी सोच सकता है जबकि उसकी अपनी भूख बहुत अधिक न हो। उपभोक्ता संस्कृति द्वारा व्यापक रूप से विज्ञापित भौतिक उपलब्धियों की अपरिमित लालसाओं से घिरे व्यक्ति से आज यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह अपने  संबंधियों या अपने समाज के अन्य सदस्यों की ज़रूरतों का ख़याल करके उनकी पूर्ति के लिए भी प्रयत्नरत होगा। 

    पश्चिमी सभ्यता से भी हमारे समाज ने सामान्यतः उन्हीं तत्त्वों को ग्रहण किया है जो व्यक्ति की आत्मकेन्द्रितता को पोषण देते हैं। उस सभ्यता के वे अन्य तत्त्व जो व्यक्ति से स्वार्थ व आत्मकेन्द्रितता के त्याग की मांग करते हैं हमारे यहां लगभग अग्राह्य रहे हैं। परिवार व समाज में अपने अधिकारों के प्रति तो हम काफ़ी जागरूक हो गए हैं किन्तु कर्त्तव्यनिष्ठा, वक़्त की पाबंदी या निर्धारित नियमों के सख़्ती से पालन जैसे तत्त्वों के प्रति हमारे यहां कोई आदर या आकर्षण देखने में नहीं आता। जो महिलाएं अपने लिए पुरुषों के बराबर हक़ों की मांग करती हैं वे उन्हें महिला होने के नाते मिलने वाले विशेषाधिकारों को (उसी बराबरी के ख़याल से) अस्वीकार करते कभी नहीं देखी जातीं। अपने जीवन साथी के चुनाव में परिवार से स्वतंत्रता का अधिकार चाहने वाली कामकाजी लड़की भी शादी के समय अपने पिता से दहेज़ में कुछ पाने की इच्छा ज़रूर रखती है। इसी तरह माता-पिता के प्रति अपने परम्परागत कर्त्तव्य पालन  को अनावश्यक मानने वाले युवकों को भी उनके वयस्क होकर काम पर लग जाने तक माता-पिता से सहायता की अपेक्षा अवश्य रहेगी। आधुनिकता, वैज्ञानिकता और प्रगतिवादिता का मनमाना अर्थ लगा कर कई लोग अपने आपको उस तमाम उत्तरदायित्व से मुक्त कर लेना चाहते हैं जिसकी मांग धर्म व परम्परा उनसे करती है। 

   भोगवादी जीवन दृष्टि के विकास से हमारे यहां मानव जीवन की गरिमा व महत्त्व में भी निरन्तर कमी आती गई है। ‘‘ज़िन्दगी तो हमें एक ही मिली है‘‘, ‘‘जब तक हाथ-पांव चलते हैं तब तक खा-पी लो और मौज कर लो‘‘ जैसे अक्सर सुनाई देने वाले वाक्य इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मानव जीवन को भी अब हम पशुओं या कीड़े-मकोड़ों के जीवन की ही भांति देखने के आदी होते जा रहे हैं। मानव जीवन को किसी दिव्य उद्देश्य से प्रेरित अथवा उत्तरोत्तर पूर्णता की ओर अग्रसर विकासक्रम के रूप में देखने वाली दृष्टि अब जैसे लुप्त हो रही है। मानवजीवन के प्रति किसी आदर के अभाव का ही एक परिणाम यह भी है कि (परीक्षणोत्तर) भ्रूण समापन जैसे अमानवीय कृत्यों में अब लोगों को सामान्यतः पापबोध नहीं होता। फ़िल्मों आदि में क्रूरता व हिंसा के अब तक निषिद्ध समझे जाने वाले दृश्यों के प्रति लोगों की रुचि व सहन शक्ति जैसे अब बढ़ती जा रही है। मानव जीवन के प्रति ऐसी संवेदनशून्यता की ओर बढ़ते हुए हम आतंकवाद जैसी क्रूर व अमानवीयतापूर्ण प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की आशा कैसे रख सकते हैं? कोई भी समाज अपने सदस्यों से हृदयहीनता और संवेदनशीलता की अपेक्षा एक साथ नहीं रख सकता। 

भारत में राजनीति की वर्तमान भूमिका के फलस्वरूप व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए समाज या देश के व्यापक हितों के साथ अक्सर छेड़छाड़ होती रहती है। जब भी कोई राजनीतिक दल सत्तारूढ़ होता है वह अपने समर्थकों के कम योग्य होने पर भी उनके प्रति पक्षपात बरतने के दोष से मुक्त नहीं रह पाता। राजनीति में लोगों की आत्मकेन्द्रितता का यह प्रकटीकरण श्रेष्ठता के किन्हीं वस्तुपरक मापदंडों के विकास में गम्भीर अवरोध उत्पन्न करता है। वोटों की राजनीति करने वाले नेता सामूहिक हितों का ख़याल करने के बजाय व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए जानबूझ कर सामाजिक विघटन को प्रश्रय देते हैं।

एक ओर आम आदमी की बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएं और दूसरी ओर बढ़ती हुई आबादी का दबाव हमारे समाज में जीने के संघर्ष को प्रतिदिन तीव्र से तीव्रतर बना रहा है। गलाकाट प्रतियोगिता में एक दूसरे के माथे पर पांव रख कर आगे बढ़ते हुए लोगों से मानवीयता, सहयोग और दूसरों के ख़याल की उम्मीद रखना दुराशा मात्र ही हो सकता है। जीने के संघर्ष में जिन लोगों के लिए अस्तित्व रक्षा का ही संकट आ खड़ा हुआ है उनसे तो इस तरह की उम्मीद रखना शायद उचित भी नहीं है, हालांकि जिस समाज में व्यक्ति नैतिकता व मानवीयता खोकर अस्तित्व रक्षा के लिए विवश होता है उसमें उस पर आर्थिक विपन्नता के साथ-साथ आत्मिक भर्त्सना की भी मार पड़ती है। भौतिक समृद्धि के अभाव में भी नैतिक आचरण व्यक्ति को जो मनोबल व आत्मिक तुष्टि देता है उससे वंचित होकर तो वह और भी गहरे अंधकार में डूब जाता है। 

    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्तिगत स्वार्थ के स्थान पर सामूहिक हित को वरीयता देना ही किसी भी समाज की आधारशिला है। अकेला व्यक्ति कभी भी समाज या सामूहिकता का विकल्प नहीं हो सकता और आत्मकेन्द्रितता अंततः व्यक्ति को समूह और समाज से अलग कर देती है। मानव आज तक जो विकास कर पाया है वह आत्मकेन्द्रितता से मुक्ति, सहयोग, परार्थ, सार्वजनिक कल्याण की भावना व समूची मानवता के बेहतर भविष्य के लिए मानव के कुछ करने की इच्छा के कारण ही संभव हुआ है। अनेक सुन्दर स्वप्न केवल सामूहिकता में ही देखे जा सकते हैं और व्यक्तिगत उपलब्धियों में भी सौन्दर्य व उदात्तता के तत्त्वों का समावेश तभी संभव है जबकि व्यक्ति व्यापक मानवीय कल्याण के भाव से उनके लिए प्रयत्नरत हो। जिस आत्मिक आनंद की अनुभूति व्यक्ति आत्मोत्सर्ग व जनकल्याण की भावनाओं में करता है उनसे वह अभागा व्यक्ति सदैव वंचित रहता है जो सुख व सम्पन्नता की कल्पना केवल अपने और अपनों के लिए करने का आदी है। जिस सुन्दर भारत या बेहतर विश्व का स्वप्न विवेकानंद या गांधीजी जैसे महापुरुषों ने देखा उसके विराट व व्यापक सौन्दर्य की कल्पना आत्मकेन्द्रितता से मुक्त होकर ही की जा सकती है। 

आत्मकेन्द्रितता का अर्थ ही है व्यक्ति में उदात्त भाव और मानव मात्र के प्रति एक व्यापक संवेदनशीलता का अभाव। व्यक्ति के आत्मकेन्द्रित होने का अर्थ ही है उसकी सामूहिक कल्याण की किसी संस्था में आस्था न होना अथवा उसका संस्कृति या राष्ट्र जैसी किसी व्यापक सामूहिक संकल्पना के अवधारण में असमर्थ होना। आत्मकेन्द्रित व्यक्ति से किसी संस्था के प्रति लगाव या निष्ठा की उम्मीद रखना व्यर्थ है। ध्वजारोहण या राष्ट्र गान के समय ऐसा व्यक्ति स्वतः ही गायब हो जाएगा क्योंकि राष्ट्र की उन प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों का उसके लिए कोई अर्थ ही नहीं है। अपनी संस्कृति की कोई पहचान न रह जाने के कारण ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे  सांस्कृतिक दृष्टि से भी शून्य हो जाएगा। आत्मकेन्द्रित व्यक्ति अपने लिए एक ऊर्ध्वगामी व भविष्योन्मुख जीवन के स्थान पर एक अल्पकालिक व ह्रासोन्मुख जीवन का चुनाव करता है। 

आत्मकेन्द्रित व्यक्ति यह ठीक से देख नहीं पाता कि सार्वजनिक सेवाओं के ह्रास के फलस्वरूप उसकी स्वयं की सामाजिक सुरक्षा में भी किस तरह निरंतर कमी आती जाती है। कानून और व्यवस्था द्वारा निबद्ध समाज व्यक्ति को जो सुरक्षा प्रदान करता है उसका विकल्प सम्पन्न व्यक्ति फिर भी अपने लिए जैसे तैसे जुटा सकता है पर जो व्यक्ति पहले से ग़रीब और वंचित है वह तो उसके अभाव में अपने आपको और भी अधिक असुरक्षित व वंचित अनुभव करने लगेगा। लोगों की आत्मकेन्द्रितता हमारे समाज को समानता और सामाजिक न्याय के हमारे संवैधानिक लक्ष्यों से कितना दूर ले जा सकती है यह समझ पाना किसी के भी लिए कठिन नहीं होना चाहिए। 

परिवार की संस्था में आत्मकेन्द्रितता का प्रवेश उसे न केवल क्षीण बल्कि भीतर से पूरी तरह खोखला बना सकता है। एक आत्मकेन्द्रित पति अपनी पत्नी की भावनात्मक आवश्यकताओं की ओर से लगातार लापरवाह होता जायेगा और एक आत्मकेन्द्रित पत्नी अपने पति की भौतिक आवश्यकताओं के प्रति निरंतर बेख़बर होती जाएगी। आत्मकेन्द्रित माता-पिताओं के बच्चे केवल उनकी अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के और आत्मकेन्द्रित बच्चों के लिए मां-बाप केवल उनके लिए पैसा व आवश्यक सहायता जुटाने के साधन बन कर रह जाएंगे। परिवार की संस्था और प्रकारांतर से यह सृष्टि भी निःस्वार्थता और त्याग की भावना के कारण ही आज तक कायम है। मां-बाप का अपने बच्चों के प्रति अप्राकृतिक रूप से अनुदार हो जाना कभी मानवीय अस्तित्व के लिए ही एक बहुत बड़ा संकट उपस्थित कर सकता है। यह असंभव नहीं कि सुदूर भविष्य में अपने बच्चों से अपनी रुग्णावस्था या वृद्धावस्था में सहायता की कोई उम्मीद न पाकर मां-बाप भी अपनी सुरक्षा के लिए किन्हीं वैकल्पिक साधनों की खोज करने लगें और तब अपने बच्चों के प्रति भी उनके मन में निःस्वार्थ प्रेम के स्थान पर स्वार्थपरता के लक्षण प्रकट होने लगें।

इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि पारिवारिक आत्मकेन्द्रितता व अमानवीय हृदयहीनता को स्वीकृति देता हुआ समाज एक अस्वस्थ व ह्रासोन्मुख समाज है। औरों के कष्ट के प्रति संवेदनशीलता व सार्वजनिक कल्याण की इच्छा मानवीय श्रेष्ठता के स्थायी मूल्य है और समय व परिस्थितियां इन मूल्यों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकती। आदर्शों व उदात्त भावों से शून्य आत्मकेन्द्रितता मानव को दरिद्र ही बनायेगी। मानव का वैसा करना उसका पशुता की ओर प्रत्यावर्तन होगा। 

    अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए सार्वजनिक संस्थाओं का क्षय न केवल एक सामाजिक हानि है, वह स्वयं उस व्यक्ति के हित में भी नहीं है जो उस क्षय को रोकने का कोई प्रयत्न नहीं करता। अपनी आत्मकेन्द्रितता के कारण जो लोग किसी सार्वजनिक संस्था को कमज़ोर हो जाने देते हैं वे आने वाले समय में अपने ही लोगों को इन संस्थाओं से मिलने वाले लाभ से वंचित कर देते हैं। ऐसे लोग कालान्तर में अपने बच्चों के शत्रु सिद्ध होते हैं। 

आत्मकेन्द्रितता का संसर्ग औरों को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहता। सफलता का अर्थ जब दूसरों की क़ीमत पर अपने लिए कुछ हासिल करना हो जाता है तब अच्छे लोग भी अपनी अच्छाई में आस्था खोने लगते हैं। आत्मकेन्द्रित समाज इस तरह दूसरों की भी परार्थ में आस्था डिगा देता है। श्रमिक व कर्मचारी संगठनों में भी आत्मकेन्द्रितता का प्रवेश उनकी रचनात्मक भूमिका को प्रायः समाप्त कर देता है। आत्मकेन्द्रितता-प्रेरित होने पर ये संगठन निजी स्वार्थों के लिए अधिकाधिक दबाव डाल कर किसी तंत्र का अधिकाधिक दोहन करने का तो प्रयत्न करते हैं किन्तु वे उसे स्वस्थ व प्रभावी बनाए रखने के लिए सामान्यतः कोई सहयोग नहीं देना चाहते। प्रशासन के आदेशों की आत्मकेन्द्रितता-जनित अवज्ञा केवल अराजकता व अव्यवस्था को जन्म देती है।

भारतीय संस्कृति के मूल स्रोतों में आत्मकेन्द्रिता का बराबर निषेध मिलता है। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में हमें सामूहिक प्रगति, श्रेष्ठ धन व निष्पाप जीवन की कामना के उदाहरण मिलते हैं। अहिंसा, अपरिग्रह और अस्तेय जैसे गुणों पर बल देने वाले अनीश्वरवादी भारतीय दर्शन भी व्यक्ति से निरंतर आत्मकेन्द्रितता से मुक्ति की मांग करते हैं।किसी भी समाज के स्वास्थ्य व उसके स्थायित्व के लिए लोगों की अपेक्षाओं व उनके कर्त्तव्यों में सम्बन्ध बना रहना ज़रूरी है। श्रेष्ठ समाज वही हो सकता है जिसमें उदारता व सार्वजनिक हित के मूल्य प्रतिष्ठित हों। आत्मकेन्द्रितता के फलस्वरूप अनैतिकता व भ्रष्टाचार की वृद्धि हमें अन्य चीजों के साथ-साथ नैतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से भी दिवालिया बना कर छोड़ेगी। 

पश्चिम में जिस उपयोगितावादी दर्शन का विकास औद्योगिक क्रांति के साथ-साथ हुआ था वह उपयोगितावादी दर्शन आज की बदली हुई परिस्थितियों में उतना प्रासंगिक नहीं रह गया है जितना कि वह अपने उद्भव काल में था। आज जब बढ़ती जनसंख्या, चुकते ऊर्जा स्रोतों और प्रदूषित होते पर्यावरण की चुनौतियां विकराल रूप में हमारे सामने खड़ी हैं और जब बाह्य परिस्थितियां मानव मात्र से उसकी अस्तित्व रक्षा के लिए आत्मकेन्द्रितता से मुक्ति की मांग कर रही है तब उस आत्मकेन्द्रितता में निरन्तर वृद्धि के लक्षण दिखाई देना हमारे लिए सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है जिसके कि मूल में कहीं न कहीं यही उपयोगितावादी दर्शन रहा है। औद्योगीकरण और उपभोक्तावाद आज हमारे यहां जिस जीवन शैली को लोकप्रिय बना रहे हैं उस जीवन शैली का भार हमारी यह पृथ्वी भला कब तक ढो पाएगी? हमें बहुत पहले सन् 1908 में महात्मा गांधी की कही हुई इस बात को फिर से याद करना चाहिए कि यदि ब्रिटेन जैसे छोटे से देश को समृद्धि का उस समय का स्तर प्राप्त करने के लिए आधे भूमण्डल का शोषण करना पड़ा था तो भारत जैसे विशाल देश को समृद्धि का वही स्तर प्राप्त करने के लिए कितने भूमण्डलों का शोषण करना होगा। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: अप्रेल ,1994 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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