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''सबके लिए एक ही लाठी कहाँ तक उचित है ''-डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 24, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 24, 2011


ज्ञान और स्वास्थ्य को कभी पूरी तरह व्यापार के दायरे में नहीं लिया जा सकता क्योंकि इन्हें सिर्फ़ पैसे से ख़रीद पाना सम्भव नहीं है। इन्हें प्राप्त करने या कराने के लिए जिन चीज़ों की आवश्यकता होती है उन पर व्यापार या बाज़ार के नियमों को सीधे-सीधे लागू नहींे किया जा सकता। पर जब किसी समाज पर व्यावसायिक सभ्यता हावी होने लगती है तो ज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र भी उससे अछूते नहीं रह पाते। उपभोक्तावाद के प्रसार के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में भी विकृतियां नज़र आने लगती हैं। 

जीवन के हर व्यापार को व्यावसायिक दृष्टि से देखने वाली और उद्योग, उत्पादन, कार्य समय आदि की शब्दावली से हर कार्य व सम्बन्ध को परिभाषित करने वाली महाजनी सभ्यता जब शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी औद्योगिक मॉडल लागू करने की चेष्टा करती है तब व्यापारिक मनोवृत्ति के लोग उन चीज़ों की तिजारत शुरू कर देते हैं जिन्हें हम ज्ञान और स्वास्थ्य का बाहरी खोल कह सकते हैं। इन क्षेत्रों की महज़ औपचारिकताएं तब इनके शुद्ध स्वरूप का स्थान लेने लगती हैं और इन औपचारिकताओं की पूर्ति को ही लोग इन अमूर्त चीजों की प्राप्ति का साधन मानने लगते हैं। महंगे निदान, महंगी औषधियां और महंगी चिकित्सा पद्धति ही तब स्वास्थ्य प्राप्ति के साधनों का पर्याय बन जाते हैं और शारीरिक सौन्दर्य के लिए लोगों को किसी ब्यूटी क्लिनिक या हेल्थ क्लिनिक की मदद ज़रूरी लगने लगती है। चिकित्सक लोग किसी कष्ट पीड़ित रोगी को राहत पहुंचाने और उसे ख़तरे से बाहर लाने के अपने प्राथमिक कर्त्तव्य को भूल कर अपने व्यवसाय को केवल अधिकाधिक धनोपार्जन के साधन के रूप में देखने लगते हैं और शिक्षा में महंगी शिक्षण संस्थाएं, महंगे ट्यूटर और महंगी किन्तु सरलीकृत पुस्तकों को ही ज्ञान प्राप्ति के साधनों का पर्याय माना जाने लगता है। 

शिक्षा को अन्य उद्यमों की ही भांति देखने के और भी कई गम्भीर परिणाम सामने आते हैं। संस्थाओं की शिक्षण सामर्थ्य और उनके द्वारा दिए जा सकने वाले ज्ञान के स्तर का ठीक से जायजा लिए बिना संस्थाओं की संख्या अथवा छात्र-संख्या वृद्धि को ही शिक्षा की प्रगति मान लिया जाता है। अध्यापक और छात्र के सम्पर्क की गुणवत्ता की ओर कोई ध्यान दिए बिना उस सम्पर्क अवधि की दीर्घता को ही शिक्षा के लिए आवश्यक और पर्याप्त समझ लिया जाता है। अधिकारी लोग यदि एक ओर उपस्थिति, नामांकन, परीक्षा-परिणाम आदि के आंकड़ों को अध्यापकों की पदोन्नति व पुरस्कारों से जोड़ने लगते हैं तो दूसरी ओर इन पदोन्नतियों व पुरस्कारों की प्राप्ति हेतु आंकड़ों की वास्तविकता के साथ ही छेड़छाड़ शुरू हो जाती है जिससे उनकी विश्वसनीयता में ज़बर्दस्त कमी आने लगती है। 

    शिक्षा में व्यावसायिक मानसिकता के कारण छात्रों व उनके अभिभावकों का सोच भी विकृत होने लगता है। छात्र के ज्ञान व उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास कर, उसे सुसंस्कृत बनाकर तथा उसकी अभिरुचियों को परिष्कृत करके उसे समाज के लिए हर प्रकार से उपयोगी व नेतृत्व में सक्षम बनाने के बजाय सभी का ध्यान केवल उसे व्यावसायिक दृष्टि से अधिक सफल बनाने की ओर केन्द्रित होने लगता है। ज्ञान की पण्यता उसकी अमूर्त प्रकृति की वज़ह से असम्भव होने के कारण प्राप्तांकों, डिग्रियों, पासबुकों, ट्यूशनों आदि मूर्त वस्तुओं का क्रय-विक्रय बढ़ने लगता है। व्यापार और बिकाऊपन के उद्देश्य से अभिप्रेरित लोग ज्ञान को उच्चस्तरीय बनाए रखने के बजाय अधिकाधिक रोचक, सरलीकृत और सस्ता बनाने की चेष्टा करने लगते हैं। ज्ञान के क्षेत्र में अति सरलीकरण का यह प्रयत्न वैसा ही साबित होता है जैसा किसी को रस्सी पकड़ कर ऊपर चढ़ना सिखाते समय रस्सी की बगल में ही एक सुविधाजनक नसैनी लगा देना। ऐसे भ्रामक शिक्षा तंत्र का परिणाम ही अन्ततः वह स्नातक होता है जिसे अपनी नौकरी की दरख़्वास्त तक ठीक से लिखना नहीं आता। 

स्वास्थ्य और शिक्षा के निवेश किसी उद्योग में निवेश से भिन्न व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। उदाहरणार्थ किसी शिक्षा संस्थान में होने वाली छुट्टियों को तथा उसमें अध्यापन, कार्य के घंटों को उस दृष्टि से देखना कदापि उचित नहीं, जिस दृष्टि से उन्हें किसी औद्योगिक संस्थान में देखा जाता है।  शिक्षा के क्षेत्र में खेलकूद, मनोरंजन और अवकाश का समय भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना कि कक्षा अध्यापन अथवा परीक्षा में लगाया गया समय। छात्र और अध्यापक के संपर्ककाल की दीर्घता ही छात्र को ज्ञानवान बनाने अथवा उसके व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिए पर्याप्त नहीं है, उस सम्पर्क की 

गुणवत्ता, छात्र की ग्रहणशीलता और उसके द्वारा स्वतंत्र रूप से अपने विकास हेतु किए गए प्रयत्नों की भूमिका भी इस ज्ञान वृद्धि में उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है। यदि किसी शिक्षण संस्था के प्रधान को स्वेच्छा से वर्ष में दो छुट्टियां करने का अधिकार दिया जाता है तो वह शायद इसलिए कि उसकी संस्था के कभी ज़िला या राज्य स्तर पर किसी विशिष्ट सम्मान अर्जित करने जैसे किसी ख़ास ख़ु़शी के मौके पर इस ख़़ुशी के इज़हार का एक अतिरिक्त साधन उसके हाथ में रह सके।

शिक्षा में आवश्यकता अधिकारों व सुविधाओं के दुरुपयोग को रोकने की है न कि अध्यापक वर्ग के विरुद्ध किसी पूर्वाग्रह से  प्रेरित  होकर उन तमाम अधिकारों व सुविधाओं को ही छीन लेने की। अध्यापन का क्षेत्र अपनी विशिष्ट सुविधाओं के कारण यदि आज कुछ महत्वाकांक्षी लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित करने लगा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि शासक वर्ग का ध्यान सर्वप्रथम इन विशिष्ट सुविधाओं की समाप्ति की ओर ही चला जाए। 

शिक्षा के मामले में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले शासकों व अधिकारियों के लिए शिक्षाविदों की खुली व स्वतंत्र राय लेना निहायत ज़रूरी है। मुझे कुछ समय पूर्व यह जानकर बड़ी हैरत हुई कि स्कूलों द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर शायद बढ़ते हुए ख़र्च को नियन्त्रित करने के उद्देश्य से लगभग एक दशक पूर्व हमारे यहां एक राज्यादेश द्वारा ज़िला स्तरीय व राज्य स्तरीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं पर ही रोक लगा दी गई। इससे जो अध्यापक व छात्र शाला स्तर पर भी प्रतिवर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते थे उनका सारा उत्साह इस आदेश से ठंडा पड़ गया और अंततोगत्वा स्कूलों के वार्षिकोत्सव पर संगीत, नृत्य, अभिनय आदि के आयोजन लगभग समाप्त से हो गए। 

शिक्षा के क्षेत्र में कामचोरी को रोकने के प्रयत्न होने चाहिए, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। जो अध्यापक अपनी शिक्षण संस्था से दूर रहते हैं और शाला समय में वहां कम से कम रुक कर घर भागने की फ़िराक़ में रहते हैं, जो लोग विद्यालय और उसके छात्रों की तुलना में अधिक प्रतिबद्धता अपने घरों पर लगाई जाने वाली ट्यूशन क्लासों व उनमें आने वाले छात्रों के प्रति प्रदर्शित करते हैं, जो अध्यापक अपने अवकाश समय को छात्रों की या अपनी शैक्षणिक क्षमताओं की वृद्धि में न लगाकर किसी शिक्षणेतर व्यवसाय द्वारा अधिक अर्थोपार्जन में लगाते हैं, उन्हें वैसा करने से रोकने और फिर भी न मानने पर दंडित करने की आवश्यकता से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता। पर केवल निष्ठाविहीन शिक्षकों को दंडित करने के बजाय सभी अच्छे-बुरे अध्यापकों को एक ही लाठी से हांकने का प्रयत्न केवल शासकों में नियम-पालन करवाने की दृढ़ इच्छा-शक्ति का अभाव प्रदर्शित करता है। 

शिक्षा के व्यापक तंत्र ने अनेक महिलाओं को भी रोज़गार दे रखा है। शीतकाल में जबकि सूर्यास्त लगभग पौने छः बजे ही होने लगता है अनेक अध्यापिका माताओं को सात बजे तक शाला में रोक कर उनके प्रतीक्षारत बच्चों से दूर रखने वाला आदेश कल्पनाशीलता के अभाव एवं (अन्तर्राष्ट्रीय परिवार वर्ष में) परिवार के प्रति असहानुभूति पूर्ण सोच का ही परिणाम कहा जा सकता है।    शिक्षा को मानव में निवेश के रूप में न देख कर तथा उसकी विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में न रखकर लिए जाने वाले निर्णय अक्सर आगे चलकर दोषपूर्ण साबित होते हैं, पर एक बार ले लिए जाने पर वे शिक्षा को लम्बे समय तक ग़लत दिशा में ले जाते रहते हैं। बहुत समय बाद लोगों को इन निर्णयों के सम्बन्ध में भूल का एहसास होता है, पर तब तक चिड़ियां बहुत सा खेत चुग चुकी होती हैं। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: जून ,1994 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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