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गुरशरण सिंह की याद में नाट्योत्सव और कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान का आयोजन करेगा जसम

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 09, 2011 | रविवार, अक्तूबर 09, 2011

नई दिल्ली: 8 अक्टूबर
जन संस्कृति मंच हर वर्ष 27-28 सितंबर को इंकलाबी जन-नाट्यकर्मी गुरशरण सिंह की याद में नाट्योत्सव तथा कवि-मीडियाकर्मी कुबेर दत्त की याद में मीडिया और संस्कृति से संबंधित विषयों पर कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान का आयोजन करेगा। इसी तरह समाजशास्त्री और आदिवासी संस्कृति के विश्लेषक रामदयाल मुंडा की याद में जसम की ओर से हर साल झारखंड में आदिवासी कला पर दो दिवसीय आयोजन किया जाएगा। जसम की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित स्मृति सभा में यह घोषणा की गई।

स्मृति सभा की अध्यक्षता करते हुए आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि गुरशरण सिंह उम्मीद, उत्साह और संघर्ष के सर्जक कलाकार थे, उनमें लोककलाकारों वाली खासीयत थी। कुबेर दत्त बहुत अच्छे कवि थे। अपनी पत्नी कमलिनी दत्त के केरल में इलाज के दौरान उन्होंने जैसी कविताएं लिखीं, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की वैसी कविताएं दूसरों के पास कम दिखाई देती हैं। रामदयाल मुंडा आदिवासी जिंदगी के व्याख्याकार और विश्लेषक होने के साथ कवि भी थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने गुरशरण  से संबंधित अपनी याद को साझा करते हुए कहा कि जब तक जुल्म, अन्याय और शोषण जारी है, तब तक गुरशरण सिंह प्रांसगिक रहेंगे, जब तक रात बाकी है, तब तक उनकी बात भी बाकी है। चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने उन्हें मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कार्यकर्ता के बतौर याद किया। श्रमिक संगठन एक्टू के महासचिव सपन मुखर्जी ने कहा कि गुरशरण सिंह पूरी जिंदगी कम्युनिस्ट बने रहे। इंकलाब ही उनके जीवन का उद््देश्य था। खालिस्तानियों और राजसत्ता के आतंक के दौर में जब पंजाब में वाम पार्टियां पीछे चली गईं, तब उन्होंने कम्युनिस्टों की आवाज को जिंदा रखा। कवि इब्बार रब्बी ने भी अलगाववाद के दौर में गुरशरण सिंह के संघर्ष को याद किया तथा रामदयाल मुंडा के जीवन को एक आदिवासी के संघर्ष की लंबी दास्तान बताया। युवा फिल्मकार अजय भारद्वाज ने कहा कि गुरशरण सिंह के नाटकों को करना या देखना एक स्पष्ट पोलिटिकल पोजिशन लेने की तरह होता था। पंजाब में नक्सली आंदोलन को आगे ले जाने और राज्य दमन का प्रतिरोध करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। चित्रकार अशोक भौमिक ने उन्हें जनांदोलनों से उपजा नाटककार बताया। नाट्यकर्मी अरविंद गौड़ ने नुक्कड़ नाट्य आंदोलन में गुरशरण सिंह की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका को चिन्हित  किया और कुबेर दत्त को दूरदर्शन में काम करने वाले एक जनवादी व्यक्ति के बतौर याद किया। 

आलोचक मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह (जलेस) ने भूमिगत दिनों में गुरशरण सिंह हुई मुलाकात का प्रसंग सुनाया तथा दूरदर्शन में साहित्य-संस्कृति को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने वाले संस्कृतिकर्मी के रूप में कुबेर दत्त को याद किया। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी (प्रलेस) ने कहा कि साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों की एक पीढ़ी के लिए कुबेर दत्त दूरदर्शन का पर्याय हो गए थे। कवि त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि उनमें जो संवेदनशीलता थी, उसे दूरदर्शन जैसा माध्यम पूरा समेट ही नहीं सकता था। उद्भावना के संपादक अजेय कुमार ने कहा कि कुबेर दत्त ने वामपंथी संस्कृतिकर्म को दूरदर्शन में जगह दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वरिष्ठ गजलगो शेरजंग गर्ग ने उन्हें बहुमुखी सांस्कृतिक प्रतिभासंपन्न संवेदनशील व्यक्ति के तौर पर याद किया। वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने उनकी याद में एक लंबी कविता सुनाई। कुबेर दत्त के सहयोगी श्याम सुशील ने साहित्य-कला-संस्कृति के प्रति उनके जुनून को खास तौर पर चिह्नित किया।

स्मृति सभा का संचालन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। सभागार में धर्मेद्र सुशांत और अभ्युदय द्वारा कुबेर दत्त की कविताओं पर बनाए गए पोस्टर भी लगाए गए थे। इस मौके पर वीरेंद्र कुमार वर्णवाल, मदन कश्यप, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, पंकज सिंह, उर्मिलेश, महेश दर्पण, प्रो. दिनेश मिश्र, सुरेश सलिल, देवी प्रसाद मिश्र, जसम महासचिव प्रणय कृष्ण, भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, कविता कृष्णन, इरफान, राधेश्याम मंगोलपुरी, सतीश सागर, पुरुषोत्तम वज्र, महेंद्र महर्षि, श्रीधरम, संदीप, असलम, राधिका मेनन, इरेंद्र, कृष्ण सिंह, पीयूष, प्रेमशंकर, रोहित कौशिक, रामनिवास, इमरान समेत कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और राजनीतिकर्मी भी मौजूद थे। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सुधीर सुमन,
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
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