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लखनऊ फिल्म समारोह:-महिला फिल्मकारों के संघर्षशीली जीवन के विविध रंग

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, अक्तूबर 27, 2011 | गुरुवार, अक्तूबर 27, 2011


जन संस्कृति मंच के तत्वावधान में आयोजित चौथा लखनऊ फिल्म समारोह 21 अक्टूबर की शाम उ प्र संगीत नाटक अकादमी के वाल्मीकि रंगशाला, लखनऊ में शुरू हुआ और 23 अक्टूबर तक चला। इस बार के लखनऊ फिल्म समारोह की मुख्य थीम ‘स्त्री संघर्ष और कला’ थी। फिल्म फेस्टिवल महिलाओं के संघर्ष पर बनी फिल्मों पर केन्द्रित रहा। फेस्टिवल में फिल्मों का चयन भी इसी थीम पर किया गया । फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों की फिल्मों को खास तौर पर शामिल किया गया था ताकि सिनेमा में महिला फिल्मकारों के योगदान को अलग से रेखांकित किया जा सके।

कवि नरेश सक्सेना
इस फिल्म समारोह का उदघाटन प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा पूंजी के बाजार में जनसंघर्षों से जुड़कर जनता की आवाज को मुखरित करने का प्रयास है। सिनेमा एक कठिन लेकिन ताकतवर माध्यम है। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पटटी में सिनेमा की तकनीक, कला पर गंभीर काम नहीं हुआ। उन्होंने डाक्यूमेंट्री और टेली फिल्म निर्माण के अनुभव को साझा करते हुए कहा कि फिल्म सभी तरह की कलाओं का सामंजस्य है और यह गहन संवेदना के साथ हमारे जीवन में उतरता है।

उदघाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे कवि व फिल्म समीक्षक अजय कुमार ने कहा कि फिल्म कला का सबसे ज्यादा इस्तेमाल शासक और शोषक वर्ग ने किया है। इन्होंने इसे जनता के प्रतिरोध को कुंद करने का माध्यम बनाया। प्रतिरोध का सिनेमा समाज, देश को बदलने के लिए चल रहे संघर्ष का आइना है। इस आंदोलन को तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है।जन संस्कृति मंच ‘द ग्रुप’ के संयोजक संजय जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि लखनऊ का यह फेस्टिवल हमारा 20 वां आयोजन है। पिछले छह वर्ष की यह यात्रा हमने जनता के सहयोग से पूरी की है। प्रतिरोध का सिनेमा, आवारा पूंजी, कारपोरेट पूंजी के दम पर बन रहे सिनेमा और उसको दिखाने के तंत्र का जनता के सहयोग से दिया जाने वाला जवाब है। संचालन करते हुए जसम लखनऊ के संयोजक कवि कौशल किशोर ने कहा कि सिनेमा के जरिए प्रतिरोध संघर्ष की आवाज को हम मुखरित कर रहे हैं। हमारा यह प्रयास जनता के संघर्ष के साथ जुड़ा हुआ है। 

जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष व प्रसिद्ध नाटककार गुरुशरण सिंह, जसम के संस्थापक सदस्य, कथाकार व कला समीक्षक अनिल सिन्हा और प्रख्यात फिल्मकार मणि कौल की स्मृति में आयोजित इस फेस्टिवल के शुभारंभ के पहले हाल में दिवंगत गुरुशरण सिंह, अनिल सिन्हा, मणि कौल, रामदयाल मुंडा, एम एफ हुसैन, बादल सरकार, कमला प्रसाद, चन्द्रबली सिंह, कुबेर दत्त और गजल गायक जगजीत सिंह को दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

फेस्टिवल में कवि भगवान स्वरूप कटियार द्वारा संपादित जसम पिफल्मोत्सव-2011 स्मारिका का लोकार्पण भी किया गया। स्मारिका में फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाने वाली फिल्मों का सारांश व परिचय तो दिया ही गया है साथ ही ‘ईरानी फिल्मों में औरत’, गुरुशरण सिंह का भाषण, अनिल सिंन्हा व मणि कौल पर लेख भी शामिल किए गए हैं। प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा संयोजित चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई। प्रदर्शनी में प्रख्यात जनवादी चित्रकारों चित्त प्रसाद, जैनुल आबदीन और सोमनाथ होड़ के 21 प्रतिनिधि चित्रों को प्रदर्शित किया गया। गोरखपुर पिफल्म सोसाइटी और लेनिन पुस्तक केन्द्र द्वारा पुस्तकों व डाक्यूमेंट्री फिल्मों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।

संकल्प, बलिया का गायन व रंग प्रस्तुति 

जसम की सहयोगी सांस्कृतिक संस्था, बलिया की संकल्प ने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की कविता ‘समझदारों का गीत’, उदय प्रकाश की कविता ‘बचाओ’, अदम गोंडवी की कविता ‘चमारों की गली’ और निर्मल पुतुल की कविता की शानदार रंग प्रस्तुति की। इसके अलावा संस्था ने भिखारी ठाकुर की अमर कृति विदेशिया नाटक के कई गीत भी गाए। संकल्प की इन प्रस्तुतियों कों दर्शकों ने काफी पसंद किया। आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में इन कार्यक्रमों में संकल्प के दस रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया।

फीचर फिल्मों में दिखा पुरुषवादी सत्ता के विरुद्ध स्त्रियों का संघर्ष

फेस्टिवल के पहले दिन के अंतिम सत्र में ईरान के मशहूर फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म ‘आफ साइड’ दिखाई गई। यह फिल्म ईरान में महिलाओं के फुटबाल मैच देखने की पृष्ठभूमि पर बनी है। कुछ लड़कियां पाबंदी के बावजूद विश्वकप क्वालीफाइंग के लिए ईरान और बहरीन के बीच हो रहे मैच को देखने चली जाती हैं। उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए पुरुषों का कपड़ा पहन लिया है। इसके बावजूद वे पकड़ी जाती हैं और उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया जाता है। निगरानी कर रहे सिपाहियों से लड़कियों की डिवेट होती है और सिपाही उनके पक्ष में हो जाते हैं। वे उन्हें मैच का आखों देखा सुनाने लगते हैं। जफर पनाही इस फिल्म के जरिए ईरान की पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था पर चोट करते हैं। साथ ही किरदारों के माध्यम से संघर्ष के निर्णायक दौर में लोगों का सत्ता के खिलाफ खड़े हो जाने की स्थिति सामने लाते हैं। 88 मिनट की इस फिल्म ने दर्शकों को पूरी तरह से सम्मोहित कर लिया।

फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन स्त्री जीवन के संघर्ष पर आधारित दो महान फिल्मकारों ऋत्विक घटक की फीचर फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ और मणि कौल की ‘दुविधा’ दिखाई गई। मेघे ढाका तारा का परिचय कराते हुए पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा यह फिल्म स्त्री विमर्श का सशक्त स्वंरूप सामने लाती है। फिल्म में ध्वनियांें व संगीत का बहुत प्रभावकारी उपयोग है। यह फिल्म बांग्लादेश से आए शरणार्थी परिवार की एक स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है। फिल्म की नायिक नीता गंभीर बीमारी से अपने जीवन का अंत होते देखती है लेकिन उसके अंदर जीवन जीने की जबर्दस्त जिजीविषा है जो फिल्म में प्रकृति के दृश्यों के जरिए दर्शकों के सामने आता है। फिल्म मे एक स्थान पर नीता कहती है कि उसने जीवन में एक ही गलती की कि उसने गलत का विरोध नहीं किया। वह बादलों से घिरा तारा नहीं बनना चाहती बल्कि सूरज बनकर जीना चाहती है। उसका यह कथन महिलाओं की स्थिति और उसकी चाह का एक मुकम्मल बयान है। ‘दुविधा’ प्रसिद्ध कहानीकार विजयदान देथा की कहानी पर मणि कौल द्वारा बनाई गई एक बेहतरीन फिल्म है। यह फिल्म एक स्त्री के प्रति अन्याय और उसके कठिन जीवन का आख्यान है।

महिला फिल्मकारों के संघर्षशीली जीवन के विविध रंग
फिल्म समारोह में फिल्मकार संजय जोशी ने भारतीय सिनेमा मंे महिला फिल्मकारों का हस्तक्षेप पर अपने व्याख्यान प्रदर्शन में कहा कि आज डाक्यूमेन्टी सिनेमा के क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक महिला फिल्मकार हाशिए के लोगों के जीवन, कामगारों की स्थिति, मानवाधिकार, स्त्री विमर्श आदि विषयों पर काम कर रही है और उन्होंने एक नई सिने भाषा विकसित  की है। उन्हांने इन महिला फिल्न्मकारों की फिल्मों के फुटेज भी दिखाए। 

फिल्म समारोह के दूसरे दिन तीन महिला फिल्मकारों की डाक्यूमेन्टी ससुराल (मीरा दीवान), सिटीज आफ फोटोज ( निष्ठा जैन ) और अनुपमा श्रीनिवासन की आई वंडर दिखाई गई। ‘ससुराल’ पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दोयम दर्जे की स्थिति का मार्मिक बयान है। फिल्म हर स्थान पर महिलाओं की स्थिति का परीक्षण करती है और उन औरतों के दर्द को दर्शकों से रूबरू कराती है जो घर और मायके दोनों स्थानों से बेदखल पागलखाने में पड़ी हैं। ‘सिटी आफ फोटोज’ स्मृतियों इच्छाओं और अनुभवों के फोटोग्राफी के गहरे जुड़ाव से परिचय कराती है। इसके लिए निर्देशिका ने शहरों में फोटो स्टूडियों का सहारा लिया है और उनके जरिए वह शहर की कहानी भी सामने लाती हैं। ‘आई वंडर’ में निर्देशिका अनुपमा श्रीनिवासन ने राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडू सहित कई प्रदेशों के दूर-दराज क्षे़त्रों में स्कूलांे में शिक्षा से बच्चों के प्राकृतिक व पारम्परिक कौशल की तुलना करते हुए यह बताने की कोशिश की है कि आखिर क्यों हमारी शिक्षा व्यवस्था में बच्चे उत्साह, उमंग और स्वभाविक रूप से भागीदारी नहीं कर पाते। इस मौके पर अनुपमा श्रीनिवासन खुद उपस्थित थीं और उन्होंने दर्शकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब भी दिए। 

दूसरे दिन महिला फिल्मकार फैजा अहमद खान की ‘मालेगांव का सुपर मैन’, वसुधा जोशी की ‘फॉर माया’, नीरा मोहन की ‘कमलाबाई’ दिखाई गई। मालेगांव का सुपरमैन, महाराष्ट के मालेगांव के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले फिल्म निर्माण के शौकीन एक ग्रुप की कहानी है। यह ग्रुप सुपरहिट फिल्मों की पैरोडी बनाता है। फिल्म बनाने का यह जुनून उनके लिए शहर के धार्मिक तनावों और आर्थिक कठिनाइयों से भागने का मजेदार रास्ता भी है। हाजिर जवाब, दिल को छू लेने वाली यह मजेदार फिल्म सुपरमैन की शूटिंग की तैयारियों पर केन्द्रित है। वसुधा जोशी की ‘फार माया’ चार पीढी की महिलाओं के पारिवारिक और सामाजिक परिवेश की स्थिति का कई स्तरों पर आकलन करती है। इस फिल्म में नानी और चौथी पीढी की बच्ची के बीच संवाद बहुत अर्थपूर्ण है। छह वर्ष की बच्ची अपनी नानी से कहती है-मै चाहती हूं कि दशरथ की चार लड़िकयां हों। वह ताड़का और सीता की दो आयामी चरित्र को स्वीकार नहीं कर पाती। यह फिल्म मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे परिवारों में स्त्रियों पर नैतिकता के नाम पर थोपी जाने वाली दमन की स्थिति पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। इस फिल्म के प्रदर्शन के अंत में दर्शकों का फिल्म में अभिनय करने वाली प्रेमा जोशी  से रोचक संवाद हुआ। उन्होंने दर्शकों से अल्मोड़ा और अपने समय में महिलाओं की स्थिति, आजादी के संघर्ष के बारे में यादे साझा की। रीना मोहन की फिल्म ‘कमलाबाई’ प्रथम मूक फिल्म और मराठी नाट्य मंच की मशहूर अभिनेत्री कमलाबाई पर बनी सहज किंतु गंभीर फिल्म है। यह फिल्म कमलाबाई के संघर्ष के साथ-साथ फिल्म जगत के प्रारम्भिक दिनों और दादा साहब फाल्के जैसे निर्देशक की कार्यशैली पर प्रकाश डालती है। अत्यन्त वृद्धावस्था में कमलाबाई के घर पर फिल्म की शूटिंग की गई है और फिल्म में वह अपने व्यावसायिक अनुभव, परिवार, मां सबको याद करती हैं।

नदियों के साथ सैर

फिल्मकार एवं यायावर अपल द्वारा फिल्म समारोह में प्रस्तुत नदियों के साथ सैर  कार्यक्रम बेहद रोमांचक अनुभव था। अपल ने फोटो और वीडियो के जरिए गंगा, ब्रहमपुत्र, गोमती और जाम्बेजी की रोमांचक यात्रा को बहुत ही अनूठे ढंग से वर्णन किया। वह और उनके साथी विशेष नाव से इन नदियों के उद्गम स्थल से लेकर इनके सागर में मिलने के स्थान तक यात्रा करते हैं। वह सिर्फ नदियों के बारे में जानकारी नहीं एकत्र करते बल्कि नदियों के किनारे रहने वाले समुदायों के जीवन हालात की भी खोज खबर लेते हैं। इसमंे वह पाते हैं कि दक्षिण अफ्रीका की जाम्बेजी नदी के तट पर रहने वाले लोग मलेरिया से मर रहे हैं तो गोमती, गंगा, ब्रहमपुत्र के तट पर रहने वाले समुदाय आज भी बेहद गरीब हैं और उन तक स्वास्थ्य, शिक्षा व जरूरी सुविधाओं की पहुंच नहीं बन पाई है। वह यह भी बताते हैं कि गोमती लखनऊ से 20-25 किमी पहले पूरी तरह स्वच्छ है तो इसलिए क्योंकि वहां रहने वाले समुदाय का नदी के साथ एक जीवंत रिश्ता है। अपल ने इस प्रस्तुति के जरिए ंिचता जाहिर की कि हमारा रिश्ता तो नदियों से खत्म तो हो ही रहा है हम उसके बारे में सोच भी नहीं रह रहे हैं। 

पितृसत्ता के सम्पूर्ण ढांचे पर करारे प्रहार की जरूरत-उमा चक्रवर्ती

प्रसिद्ध इतिहासकीार एवं नारीवादी चिंतक उमा चक्रवती ने फिल्म फेस्टिवल के अंतिम सत्र में अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि पितृसत्ता के समूचे ढांचे पर एक साथ करारा प्रहार करने की जरूरत है। पितृसत्ता सिर्फ एक माइंडसेट का मामला नहीं है। यह केवल सामंती अवशेष भी नहीं है जो अपने आप स्वत खत्म हो जाएगा, इसे ढाहने के लिए यत्न करना पड़ेगा। उन्होंने नारीवादी आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि महिलाओं की लड़ाई सिर्फ उनकी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की लड़ाई है क्योंकि पितृसत्तामक व्यवस्था में सभी पीडित हैं। उन्होंने कहा कि हमने संघर्षों को डिब्बों में बांट दिया है। उमा चक्रवर्ती ने नारीवादी आंदोलन ने धर्म पर भी प्रहार किया है क्योंकि धर्म यथास्थितिवाद को बनाए रखता है। 

इस मौके पर उमा चक्रवर्ती की फिल्म ए क्वाइट लिटिल इन्टी भी दिखाई गई। इस फिल्म में मैथिली अपनी दादी सुबुलक्ष्मी की कहानी ढंूढ रही है जो डायरियां लिखकर उन्हें बक्से में रखती जाती हैं। मैथिली उनकी डायरियों के जरिए उनके संघर्ष को सामने लाती है। 

बच्चों ने संडे को देखी फीचर फिल्म सडे और एनिमेशन फिल्मे

फिल्म समारोह में परम्परा रही है बच्चों के लिए फिल्मों के एक सत्र का। इस चौथे फिल्म समारोह के अन्तिम दिन की शुरुआत बच्चों के सत्र से हुई। इस सत्र में चिल्डेन फिल्म सोसाइटी द्वारा बनाई गई पंकज आडवानी की फीचर फिल्म संडे और एनीमेशन फिल्में-गौरेया की चम्पी, मां मां मां, आसमान से गिरा दिखाईं गईं। संडे में एक नटखट बच्चा अपनी मां के साथ पिता को रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाता है। रेेलवे स्टेशन जाते समय और उसके पिता के स्टेशन पर न उतर पाने की कथा में कई मजेदार घटनाएं घटित होती हैं जिन्हें इस फिल्म में बहुूत करीने से पिरोया गया है। 


कवि विद्रोही पर बनी फिल्म और उनके काव्य पाठ ने दर्शकों को रोमांचित किया 

कवि विद्रोही
फिल्म समारोह के अंतिम दिन दर्शकों के लिए कवि रमाशंकर विद्रोही पर बनी फिल्म मै तुम्हारा कवि हूं और समारोह के समापन में कवि विद्रोही का कविता पाठ एक न भूलने वाली यादगार शाम बन गई। कवि विद्रोही के जीवन और उनकी कविताओं पर नितिन के पमनानी द्वारा बनाई गई 40 मिनट की यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जो कविता में रहता है। विद्रोही अपने बारे में फैली किवंदतियां के बीच दो दशक से ज्यादा समय से जेएनयू के नागरिक हैं। कवि विद्रोही ने कविता कभी लिखी नहीं, वे आज भी कविता कहते है। यह उनके काव्य पाठ को सुनकर दर्शकों ने महसूस किया। वह बिना लाग लपेट कर गरीबों व मेहनतकशों की तरफदारी में बोलते हैं। उनकी कविता-

हर जगह ऐसी ही जिल्लत/
 हर जगह ऐसी ही जहालत /
हर जगह पर पुलिस/ 
और जगह पर अदालत।
 उनकी एक और कविता-जब कवि गाता है/
 तब भी कविता होती है /
 और जब कवि रोता है /  

तब भी कविता होती है।अंत में जन संस्कृति मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष व कवि भगवान स्वरूप कटियार ने फिल्म फेस्टिवल को सफल बनाने के लिए सभी को धन्यवाद दिया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.

एफ - 3144, राजाजीपुरमलखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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