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जयप्रकाश मानस की कविताएं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 03, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 03, 2011



झाडू

बेर उठते ही ढूँढते हैं सब मुझे
मैं किसी कोने-अंतरे में
अकेला उदास पड़ा झाडू

हवायें चिढ़ाती हैं मुझे  
कूड़ा-करकट बिखेरकर
चिड़िया भी
सभ्य मालिक के गंदे बच्चों की तरह

मुझे छूती तक नहीं मालकिनें
बहुत बौनी मेरी औकात
दाढ़ में माँस फँसने पर
एक मैं ही टूटने-लुटने को विवश
लेकिन जब कभी
ग़रीब बस्ती की लड़कियों उठा लेती हैं कंधों पर
इत्मीनान से बैठकर देख सकता हूँ
फ़क्क सफ़ेद कपड़ा धारे शहरियों की गंदगी


अक्सर अँधेरे में चटक उठता है काँच
चूभने की आंशका से आंतकित
हर कोई मुझे घोषित कर देता है सबसे ज़रूरी
फिर सबकुछ जस के तस


तुम्हें क्या पता  
सफाई करते हुए मुझे
मिलती होंगी कितनी मज़ेदार और खोई हुई चीज़ें

 बुद्धिजीवी अक्सर याद करते हैं
मुक्तिबोध के बहाने मुझे
और मेरे साथ उस मेहत्तर को
जो अभी भी बहुत दूर खड़ा हँस रहा है
उन्हीं पर


गिरूँगा तो उठूँगा

अपने नितांत अकेले में भी
सदियों को समेटे
हरवक़्त मुस्तैद
फिर से अँखुआने
घुप्प अँधेरे को चीरकर


विश्वास इतना
कि पत्थरों पर ऊग जाऊँ
छप्पर-छानी से झिलमिलाऊँ
डर ऐसा
कि ख़ुद को बचाता रहूँ घुन से
चिन्ता बस यही
कि पकूँ तो गोदाम नहीं 
 खलिहान से सीधे घर लिवाऊँ
चाहत सिर्फ़ इत्ती-सी
कि बची रहूँ निख़ालिस और ठोस
आत्मविसर्जित दुनिया में  
थोड़ी-सी नमी और
थोड़ी सी गर्माहट के सहारे

मामूली चीज़ हूँ
बहा ले जाती है बारिश की छोटी-सी धार
उजाड़ देता है बतास घर-परिवार
चुग लेता है पिद्दी भर टिड्डा

इतना मामूली भी नहीं
जैसे तुम्हारे जेब का सिक्का
रह जाऊँ एक बार खनक कर
गिरूँगा तो उठूँगा हर बार पेड़ बनकर
बढ़ूँगा तो बाटूँगा छाँव सबको 

आम आदमी का सामान्य ज्ञान

आम आदमी का सामान्य ज्ञान
नहीं होता असाधारण


आम आदमी नहीं जानता
सोना-खदान का भूगोल
काले को फक्क सफ़ेद बनानेवाला रसायन
नाती-छंती तक के लिए बटोर लेने का अर्थशास्त्र
ज्ञान का इतना पक्का
हराम की हर चीज़ों का नाम जीभ पर रखा

आम आदमी नहीं जानता
झूठ को सच या सच को झूठ की तरह दिखाने की कला
चरित्र सत्यापन की राजनीति
धोख़ा, लूट, और षड़यंत्र का समाज-विज्ञान
ज्ञान इतना पक्का
पहचान लेता है स्वर्ग-नरक की सरहदें

आम आदमी नहीं जानता
हँसते, मटकते, चहकते हुए चेहरों का बाज़ारभाव
बाज़ार में वन बाय वन फ्री का रहस्य
ग़ैरों की हाथ-घड़ी देखकर अपने समय का मिलान
ज्ञान इतना पक्का
बूझ लेता ज़रूरी और ग़ैरज़रूरी का फ़र्क

आम आदमी नहीं जानता
तानाशाहों की रखैलों, जूतों, कपड़ों, इत्रों का बीजगणित
ईश्वर के सम्मुख रखे चढ़ावा-पेटियों में लगातार वृद्धि की तकनीक
दुख, संत्रास, तिरस्कार, आत्महत्या के पीछे की भौतिकी
ज्ञान इतना पक्का
कि भगवान भी बंगले झाँके

आम आदमी नहीं जानता बहुत कुछ
तो मत जाने
आप कौन होते हैं
उसे पास-फ़ेल करने वाले


निहायत छोटा आदमी 
उतना दुखी नहीं होता
निहायत छोटा आदमी
जितना दिखता है


निहायत छोटा आदमी
छोटी-छोटी चीज़ों से संभाल लेता है ज़िंदगी
नाक फटने पर मिल भर जाये गोबर
बुखार में तुलसी डली चाय
मधुमक्खी काटने पर हल्दी

जितना दिखता है
उतना काईयाँ नहीं होता
निहायत छोटा आदमी

निहायत छोटा आदमी
नयी सब्जी का स्वाद पड़ोस बाँट आता है  
उठ खड़ा होता है मामूली हाँक पर
औरों के बोल पर जी भर के नाचता

जितना दिखता है
उतना पिछड़ा नहीं होता
निहायत छोटा आदमी

निहायत छोटा आदमी
सिरहाने रखता है पुरखों का इतिहास
बूझता है अपना सारा भूगोल
पत्ती पर ओस, जंगल के रास्ते, चिड़ियों का दर्द
पढ़े बग़ैर बड़ी-बड़ी पोथी


जितना दिखता है
उतना छोटा नहीं होता
निहायत छोटा आदमी


निहायत छोटा आदमी
लहुलूहान पाँवों से भी नाप लेता है अपना रास्ता
निहायत छोटा आदमी के निहायत छोटे होते हैं पाँव
पर डग भरता है बड़े बड़े
  
जहाँ जाता नहीं कोई 
जानेवाले हम ही होंगे
जहाँ जाता नहीं कोई  

जलते दोपहर में अकेले खड़े पेड़ों के घर
जीर्ण-शीर्ण पत्तों के क़रीब
झुरमुट में डरे-दुबके खरगोश तक


फ़ूर्सत निकालकर     अपनी कमीनगी पर हँसने
थोड़ा सा रोने, थोड़ा पछताने
रूठे हुए दोस्त को मनाने
पानी सा बहते चले जायेंगे

बिलम नहीं जायेंगे
अपनी ऐंठन की छाँह में
मार कर आँखों पर पानी के छीटें
फिर चल ही देंगे             
जहाँ नहीं जाता कोई

बचे रहेंगे 
नहीं चले जायेंगे समूचे
बचे रहेंगे कहीं न कहीं

बची रहती हैं दो चार बालियाँ
पूरी फ़सल कट जाने के बावजूद
भारी-भरकम चट्टान के नीचे
बची होती हैं चीटियाँ
बचे रहेंगे ठीक उसी तरह

सूखे के बाद भी
रेत के गर्भ में थोड़ा-सी नमी
अटाटूट अँधियारेवाले जंगल में
आदिवासी के चकमक में आग


लकड़ी की ऐंठन कोयले में
टूटी हुई पत्तियों में पेड़ का पता
पंखों पर घायल चिड़ियों की क़शमकश
मार डाले गये प्रेमियों के सपने खत में
बचा ही रह जाता है  
बचे रहेंगे ठीक उसी तरह


बच नहीं पाये
फिर भी बचे रहेगे
अनसुने शब्द हवा में स्पन्दित

रूमाल 
कभी मेरी छाती पर बुने थे
तुमने उसका रेशमी नाम
आजू-बाजू दो सुर्ख गुलाब  

जब भी तुम पसीजे
मैं पोंछता रहा पराजित लोगों की आँखें
जब भी थके लथपथ
तुम्हारे नमक को दिया भरपूर सम्मान
जब भी टूटे-हारे
झट छुपाता रहा दुनिया में तुम्हारी बेबसी

सारा का सारा धूल-गर्दा-कालिख
पोंछनेवाला
मेरे अलावा था ही कौन

एक मैं ही तो था
जो बड़े ही तहजीब से लाता संभालकर 
रूठे हुए बच्चे के लिए नेमनचूस की कुछ गोलियाँ
बुखार से उठी बूढ़ी माँ के लिए चटखारेदार करौंदे
कभी-कभी मुफ़िलिसी में
बासी मुर्रा और कुछ उबले हुए चने

रोज़गार की तलाश में
नहीं मिलता था पैर रखने की जगह
बिछ-बिछ जाता रहा गोद फैलाकर
उदास और मनहूस समय की पीठ पर

तुम्हारे जेब में पड़ा रहा गुलाम की तरह
बग़ैर चीखे चिल्लाये
सिर्फ़ इसलिए कि
चमकता रहूँ काले समय को चीरकर

नौकरी पर जाते हुए आज फिर
बहुत क़रीने से सजाया था
इत्र छिड़ककर एक स्त्री ने मुझे
तो इसलिए नहीं
कि तुम उससे महारानी की जूतियाँ साफ़ करो
मित्र,        मुझे माफ़ करो
इस तरह नहीं महक सकते तुम
इस तरह नहीं महक सकता तुम्हारा जीवन
और इस तरह
कतई कतई नहीं महक सकता तुम्हारा समय


लकड़ी का बयान
वे तो जाने-पहचाने शातिर थे, जो फेंक गये आग
मैंने नहीं जलाया कभी किसी का घर

बेझिझक करें तफ़्तीश
किसी भी आम आदमी से  
नोन-तेल कहते ही झट से लेगा मेरा नाम
पूछ लें-
घर से हँकाले गये गठिया-ग्रस्त बूढ़ों से
कौन है उनका एकमात्र सहारा
घिसा जब भी किसी ने
महका वही चंदन-सा

टेके रखा छप्पर-छानी कंधों पर
बंद करता रहा भीतर
वनैले जानवर से बचाने
मूसल बनकर देता रहा साथ माँओं का
भौंरा घोड़ा बनकर उदास बच्चों का
बचाता रहा साबुत कुपित समुद्र से

मेरी नहीं किसी से जाति-दुश्मनी
फिर भी उस बढ़ई को देखते ही
खौल उठता है मेरा ख़ून
जो बनाने के बजाय पीढ़ा
अड़ा हुआ है मुझे कुर्सी बनाने में


क्या आपके पास हैं ऐसे शब्द ? 
शब्द ऐसा ही चाहिए
जिसमें हों
गाँव की भोली-भाली
छुईमुई लड़की के अंतस में
उफान मारता प्रेम
पड़ोसियों के खेत में
गर्भाती धान-बालियों की
मदमाती गंध

शब्द ऐसा ही चाहिए
जिसमें हों
मिथ्यारोपों षडयंत्रों की गिरफ्त में
छटपटाते सत्य की
रिहाई के लिए
सबसे ठोस बयान
अंधड़ के बाद
धूल सनी आँखों से भी
आक्षितिज देखने की दृष्टि

शब्द ऐसा ही चाहिए
जिसमें हो
सूखे में डूबी
जलती बस्ती के लिए
आम का पना
या पुदीने का शरबत
आदमी और आदमी के बीच
ढ़ह चुके सेतु को
जोड़ने की उत्कट अभिरति

शब्द ऐसा चाहिए
जिसमें हो
अज़ान और आरती के लिए
एक ही अरथ
और अंतिम अरथ
जिसमें हो लबालब
अमानव के पदचाप को
भाँप-भाँप लेने की चौकसी

क्या आपके पास हैं ऐसे शब्द ?

कारख़ाना खुलने पर 
देखते-देखते खेत सिकुड़ गये
सिकुड़ गये धान कटैय्या हाथ
देखते-देखते हँसी सिकुड़ गयी
लकीरों से बिंध गयी चौड़ी माथ

पंछी सिकुड़े देखते-देखते
पेड़ से तने, तने से फूल
देखते-देखते हवा सिकुड़ गयी
साँसें रोकती जहरीली धूल

देखते-देखते बस्ती उठ गयी
उठ गये कहाँ वो सारे लोग
सिर्फ़ मशीनें चीख रही हैं
उन्नति का कैसा यह रोग

गाना ही गाते रहेंगे
( लोककथा की याद )

नदी किनारे 
गाती-गुनगुनाती
चिड़िया एक हों आप
दिखे एकाएक - चीटीं एक आकुल-व्याकुल
धार हो इतनी बेमुरोव्वत कि
चींटी हो जाय बार-बार असहाय
ऐसे में गाना ही गाते रहेंगे
या छोटी-सी डाल तोड़कर गिरायेंगे ?  

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
जयप्रकाश मानस
एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल,
आवासीय परिसर पेंशनवाड़ा, विवेकानंद नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
(मोबाइल-94241-82664)



उनका पूरा परिचय यहाँ पढ़ा जा सकता है.
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सम्पादक:जितेन्द्र यादव

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