डा. मनोज श्रीवास्तव की नई कवितायेँ - अपनी माटी Apni Maati

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डा. मनोज श्रीवास्तव की नई कवितायेँ


दफ़्न पुरखे
यहाँ वट था
वहां झरना था
नीचे तलहट  था 
प्रभात में संवहनीय मलय था
नीम के घर में गोरैये थे,
मेघ की छत के नीचे 
कुलांचे भरते गीध थे
नीची आँगन था--
हहराते हरित प्रदेश का

देखो, मेरे पुरखे 
दब गए हैं कहीं
यहीं कहीं

जहां उनचास योजन तक विस्तारित हैं
बेढब माल 
जिनके निर्मम कदमों के आगे
हजारों मील तक बिछे हैं--
तारकोली कारपेट,
उनके नीची चींख रहे हैं--
गुनगुना चुके वनों के शव

देखो, मेरे पुरखे 
दब गए हैं यहीं
यहीं कहीं

जहां सोंधी शामें थीं
झरबेरी के घोसलों में बया थे
आम्र उद्यानों में 
नृत्यरत कोयलों की छेड़ी गई पंचम रागनियाँ थीं
जहां वृक्ष-स्तंभों पर टिकी
हरियाली छत के नीचे
शिशुओं के खेलने के लिए सजीले बरामदे थे
वहां ब्रोकर-ट्रेड मार्केटों के नीचे
चिरनिद्रा में सोए हुए हैं 
हमारे पुरखे 
जो शायद ही जग पाएंगे  
किसी एकाध  कवि  की गुहार  पर

उफ्फ! मेरे पुरखे
कैसे भूगर्भीय  शिलाओं में
दफ़्न हो गए हैं
 

एक कवि का हश्र
 
जब मै रोगग्रस्त
पड़ा हुआ हूँ
मृत्यु-शैय्या पर,
दवा-दारू के लिए 
एक अधेला भी न हो अंटी में 
तो छाप देना यह खबर
किसी छोटी-मोटी पत्रिका में
और जता देना
मेरे पिपासु पाठकों को 
कि एक मसीजीवी 
अकाल मौत के जबड़े में जाने को है 
जिसे जरूरत है इलाज के लिए चंदे  की
 
तब, शायद, रफ्ता-रफ्ता 
इस अकिंचन के बावत 
खबर मीडिया में भी चली जाए
और मेरी रुग्ण छबि चमक उठे
छोटे परदे पर

हार्दिक अनुरोध है कि
उस वक़्त मुझे
छोड़  देना अपनी किस्मत पर
अपने-आप मरने के लिए,
पर बचा लेना मेरी अस्तित्त्व-बोधक रचनाओं  को 
दीमक की खुराक से, 
शायद, मेरी कवितायेँ
किसी काम आ जाएं
इस पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए
 
हाँ, सौंप देना मेरी चंद रचनाएं
उद्योगपति चौधरियों को 
जिनके विनाशक कारखानों के धुओं से
मौसम में सीलन आ गई है
सूरज निष्ठुर हो गया है 
और चन्द्रमा को कुष्ठ रोग लग गया है 

उस वक़्त, मै
सचमुच बड़ा स्वार्थी हो जाऊंगा 
चाहूंगा कि इस समाज के माफिया
और इंसानियत से
ताउम्र परहेज़ करने वाले
नव-सवर्ण जन
पढ़ें मेरी कवितायेँ
और अपने कुकृत्यों पर पछताएँ 

तब, हाँ, मेरे पेरासाईट माफिया प्रकाशक!
ज़रूर तुम आना
मेरी पांडुलिपियों को हथियाने 
और मेरी रचनाएं
मेरे नाम से ही  छापने
भले ही मत देना
जीरो फीसदी भी रायल्टी
मेरे बेहद ज़रूरतमंद आश्रितों को.

(नवरात्रि, दुर्गा पूजा और दशहरा पर अपनी माटी के परिवार को, आपको और आपके सभी परिवारजनों को हार्दिक शुभकामनाएं!
आपका,
मनोज श्रीवास्तव)


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डा. मनोज श्रीवास्तव 
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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