डा. मनोज श्रीवास्तव की दो नई रचनाएं - अपनी माटी Apni Maati

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डा. मनोज श्रीवास्तव की दो नई रचनाएं


कुछ भी नहीं रहेगा

नहीं कह पाएंगे हम
कि यह बात अभी हुई है
और इसके पहले हुई ही नहीं
या, अब होगी भी नहीं
जो आदमखोर इंसान रूस में है
उससे पहले वह ब्रिटेन में था
और अब वह दिल्ली में भी है
बाद इसके वह हर जगह मिलेगा
आदमखोर के कहीं भी होने पर
हमें आइन्दा अजूबा नहीं लगेगा
जो औरतें रनिवासों और हरमों में
उत्सव की भाँति भोगी जाती थी,
रखैलें विकल्पत: चखी जाती थीं
देवकन्याएँ ईश्वरीय प्रसाद के रूप में
फैशन-शो में, योगाश्रमों और राजप्रासादों में
नानाविध संस्थाओं में आज भी हैं
जिस कुंती ने कर्ण को जना
जिस शकुन्तला को दुष्यंत ने छोड़ा
जिस अहिल्या को इंद्र ने छला
जिस परित्यक्त सीता ने लव-कुश को जना,
वो छतों और खुली आसमान के नीचे भी हैं
और उनकी तादात में बरक़त होती ही रहेगी.

स्लम बस्ती
स्लम बस्ती एक सम्पूर्ण दुनिया होती है
इसमे अट्टाल कोठियां भले ही न हों
मुरली और राधा के लिए यहीं घर है
जिन्हें घरवाले झुग्गी कहते हैं
और गाड़ी वाले इसके प्लास्टिक छतों पर मूतते हैं
बस्ती में भी सुबह और शाम क्यों न हो
कामकाजी लोग शाम को यहीं वापस लौटते हैं
चौरस्ते पर बेंच पर बैठ चाय सुड़कते हैं
पान चबाते हैं, बीड़ी सुलगाते हैं
औरते घूरते हैं
अमित और सचिन पर चर्चाएँ गर्माते हैं
कुल्हड़ में कच्ची शराब पीते हैं
और पक्की दोस्ती के एवज़ में
माँ-बहन की गालियाँ बकबकाते हैं
लोग समझते हैं कि बस्ती में क्या नहीं होता
सिर्फ गाली -गलौज, चोरी -छिनैती, झपट्टामारी
विवाहेतर लुका-छिपी, नाजायाज़ ताल्लुकात होती होगी
लेकिन, बस्ती में मंदिर भी है
जिसका पुजारी नेम-धर्म से पूजा-अर्चना करता है
नज़र लगे बच्चों की झाड़-फूँक करता है
और छैल-छबीली पनिहारिनों के हाथ मसल
उनके भाग बांचता है,
वहां मस्जिद भी है जहां मौलवी
नमाजियों की फौज के बीच खड़ा होकर
सामुदायिक अस्तित्त्व-बोध कराता है
बस्ती एक पूरा समाज है
नियमों-सिद्धांतों से सम्बद्ध
रीति-रिवाजों से वचनबद्ध
दांडिक विधानों से आबद्ध,
यहाँ फतवे जारी होते हैं
भगवा आन्दोलन होता है
अन्ना अभियान पुरजोर होता है
गुरुवाणी प्रसार के बाद भोज-भंडारा होता है
साम्प्रदायिक दंभ बस्ती के सीने में धधकता है
यहां विजातीय समागम निषिद्ध है
रसोई छुआछूत और विधर्मी संसर्ग से प्रतिषिद्ध है
ईद और होली पर सद्भाव
मुबारकबाद की सीमा-रेखा तक सीमित है
अंतर्धर्मीय निकाह के बाबत सोचना भी गुनाह है
क्योंकि विजातीय-इतरगोत्रीय संबंधों पर
आनर-कीलिंग का सर्वसम्मत रिवाज़ है
प्रेमियों के लिए बस्ती की दुनिया
मौत का आगाज़ है
यह बस्ती भले ही
महानगर की कांख में दबी-पिची है
पर, जब भी यह ख़ास मौकों पर सांस लेती है
तो दुनिया भर की सांस गले में अटक जाती है,
तब, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे
अखबारी सुर्खियों में होते हैं,
मेरिट-लिस्ट में उनके नाम भले ही न हों
उनके अहसास से कुत्ते भी दुम दबाकर
भाग खड़े होते हैं
और नागरिकों की जुबान
तलवे से चिपक जाती है
बस्ती क्रान्ति का अग्रदूत है
लोगबाग यहाँ खुराफात के भूत हैं
अपनी अस्मिता कश्मीर सरीखा मानते हैं
क्योंकि ऐसा करना
उनकी राजनीति का अहम् अंग है
ऐसे में वे भी
खुद को भी संभ्रांत महानागरिक से कम
नहीं आंकते हैं


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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