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''जन सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे गुरुशरण सिंह''-कौशल किशोर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 03, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 03, 2011


लखनऊ, 3 अक्टूबर। 
प्रसिद्ध नाटककार व जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष गुरुशरण सिंह को लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों आदि ने उनकी स्मृति में आयोजित सभा में अपनी शोक संवेदना प्रकट की तथा कहा कि गुरुशरण सिंह सच्चे अर्थों में इंकलाब के लिए समर्पित कलाकार थे। अपने उसूलों के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। स्मृति सभा का आयोजन इप्टा, जसम, प्रलेस व नीपा ने संयुक्त रूप से इप्टा कार्यालय 22, कै़सरबाग, लखनऊ में किया था। इस मौके पर बोलते हुए जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने कहा कि गुरुशरण सिंह ने अपने नाटकों के द्वारा शहीद भगत सिंह के विचार व संघर्ष की परम्परा को आगे बढ़ाया। सत्ता का दमन हो या आतंकवाद की धमकियाँ, उन्होंने इनकी परवाह नहीं की। उनके अन्दर यह साहस जनता के ऊपर भरोसा करने से आया था। वे कहते थे कि आप जनता पर विश्वास करो, आपकी समस्याएं हल होंगी। ऐसा उन्होंने करके दिखाया।

गुरुशरण सिंह के नाटकों पर बोलते हुए कौशल किशोर ने कहा कि भले ही उनके सांस्कृतिक कर्म का क्षेत्र पंजाब रहा हो, पर उनका दृष्टिकोण व्यापक व राष्ट्रीय था। वे एक ऐसे जन सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा जनता से, अपनी लोक संस्कृति से ग्रहण करता है। उन्होंने जहाँ गुरुनानक देव के विचारों को आज के सच के साथ जोड़ते हुए नाटक ‘जिन सच्च पल्ले होय’ के करीब 1600 गाँवों में प्रदर्शन किये, वहीं भगत सिंह के जीवन और विचारधारा पर आधारित नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ ने तो कीर्तिमान ही बना डाले। न सिर्फ पंजाब में बल्कि देश के शहरों से लेकर गांव गांव में इसके मंचन हुए। उनके नाटकों में लोक नाट्य रूपों व लोक शैलियों का प्रयोग देखने को मिलता है। वे मंच नाटक और नुक्कड़ नाटक के विभाजन को कृत्रिम मानते थे तथा इस तरह के विभाजन के फलसफे को नाटककारों व रंगकर्मियों की कमजोरी मानते थे। 

इप्टा की ओर से अपनी शोक संवेदना प्रकट करते हुए राकेश ने कहा कि वे साम्प्रदायिकता के भी उसी तरह विरोधी थे जिस तरह आतंकवाद के। हमलोंगों ने उन दिनों लखनऊ से साम्प्रदायिकता के विरोध में संस्कृतिकर्मियों का मार्च निकाला था। बाद में जब उन्हें सूचना मिली तो न सिर्फ हमारे कदम की तारीफ की बल्कि इस बात की उन्होंने शिकायत भी की कि यदि उन्हें इसकी सूचना पहले होती तो वे जरूर अपने दल के साथ इस यात्रा में शरीक होते। वे एक अत्यन्त सजग नाटककार थे। नाटक और अपने उद्देश्य के प्रति जैसा उनमें समर्पण था, वैसा बहुत कम ही देखने को मिलता है। उनसे यह सीखने की जरूरत है। 

चर्चित नाटककार राजेश कुमार ने कहा कि गुरुशरण सिंह तीसरी धारा के अग्रणी नाटककार रहे हैं। इनके नाटक का मकसद केवल व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करना नहीं था बल्कि जन आक्रोश को सही विकल्प भी देना था। उनका नाटक ‘जंगीराम की हवेली’ को देखें। नई व्यवस्था केा बनाने के लिए पुराने का ध्वंस जरूरी है। यह संदेश देता है। आज रंगमंच जिस संकट से गुजर रहा है, उसमें उसके दर्शक सिमटते जा रहे हैं। नाटक करने के लिए वे सरकारी संस्थाओं के अनुदान पर निर्भर हैं, उन्हें गुरुशरण सिंह से सीखना चाहिए कि कैसे जनता व दर्शकों पर निर्भर होकर नाटक किये जाय। उन्होंने मात्र गांवों में नाटक नहीं किये बल्कि शहर में भी उनके नाटकों के दर्शकों की कमी नहीं थी। नाटक करने के लिए उनके पास सचल यान था जिस पर उनका दल घूमता रहता था और जनता के बीच नाटक करता था। जनता भी इन कलाकारों को अपना मानती थी।

लेखक व पत्रकार अजय सिंह का कहना था कि गुरुशरण सिंह के निधन से एक युग समाप्त हो गया। वे उसकी आखिरी कड़ी थे जो पुल का काम करते थे। जन संस्कृति मंच का अध्यक्ष बन कर उन्होंने मंच को व्यापकता व नई ऊँचाई प्रदान की। आज का दौर भिन्न है और इसलिए चुनौतियाँ भी अलग हैं। पिछले दो दशक में जिस तरह के परिवर्तन हुए है, वैसा पिछली पूरी शताब्दी में नहीं हुआ। इस परिवर्तन से जो नया यथार्थ आ रहा है, उसे समझना जरूरी है। गुरुशरण सिंह अपने दौर के यथार्थ को समझा था। उसी के अनुरूप अपने कलाकर्म को ढाला था। आज की चुनौतियों को स्वीकार करना ही गुरुशरण सिंह को सच्चे तरीके से याद करना हो सकता है।

प्रगतिशील लेखक संघ के शकील सिद्दीकी ने गुरुशरण सिंह के काम को याद किया तथा प्रलेस की ओर से श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके नाटक सामंतवाद, पूँजीवाद, अलगाववाद जैसे सारे जन विरोधी मूल्यों के विरुद्ध है। वे संस्कृति कर्म तक अपने को सीमित कर देने वाले कलाकार नहीं थे। लखनऊ जब वे भी आये, इप्टा के कार्यालय में भी आये। उनका काम का तरीका ऐसा था कि आप उनसे उत्साहित हुए बिना नहीं रह सकते। 

इस मौके पर नीपा से मृदुला भारद्वाज, पी यू सी एल से वंदना मिश्र, कवि भगवान स्वरूप कटियार, राही मासूम रजा़ अकादमी से रामकिशोर, आवाज से आदियोग, पत्रकार प्रदीप कपूर, एपवा से विमला किशोर, कवि श्याम अंकुरम, लेनिन पुस्तक केन्द्र के गंगा प्रसाद, कवि बी एन गौड़, नाटककार कल्पना पाण्डेय ‘दीपा’, अमुक अर्टिस्ट ग्रूप के अनिल मिश्र ‘गुरुजी’, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, नरेश कुमार आदि ने भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की तथा गुरुशरण सिंह को याद किया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.

एफ - 3144, राजाजीपुरमलखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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