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''भक्तिमती मीरा पूरे देश की थी और रहेगी''-भगवतीप्रसाद देवपुरा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, अक्तूबर 11, 2011 | मंगलवार, अक्तूबर 11, 2011


चित्तौड़गढ़ 11 अक्टूबर। 
प्रमुख इतिहासकार, रचनाधर्मी, सम्पादनकला मर्मज्ञ एवं पूर्व जनसम्पर्क निदेशक पंडित राजेन्द्र शंकर भट्ट ने कहा कि हमें क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से भक्तिमती मीरा के साहित्य और संदेशों को दुनियां के हर क्षेत्र में सम्प्रेषित करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। भट्ट मंगलवार को मीरा स्मृति संस्थान द्वारा मीरा महोत्सव के तहत गोराबादल स्टेडियम में आयोजित दो दिवसीय मीरा संगोष्ठी के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होनें मेवाड़वासियों को उलाहना देते हुए कहा कि मीरा को मेवाड़ छोड़ने के प्राश्यचित स्वरूप उनके प्राचीनतम चित्रों के आधार पर दुर्ग के जिस द्वार से मीरा ने भक्तिमार्ग के लिए प्रस्थान किया वहां उनकी आकर्षक प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए ताकि यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भक्तिमती मीरा के दर्शन से प्रेरित होते रहे। 

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि नाथद्वारा के विद्वान भगवतीप्रसाद देवपुरा ने कहा कि मीरा पूर्णतः कृष्णमयी थी इसीलिए वे उनमें लीन हो गई। ऐसी भक्तिमती मीरा पूरे देश की थी और रहेगी। उन्होंने सुझाव दिया कि मीरा संगोष्ठी में आए विद्वानों के विचारों को संकलित कर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता भरतपुर के डॉ. कृष्णचन्द्र गोस्वामी ने मीरा भाव और राधा भाव पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि राधा गोपी भाव का रूप है वहीं महर्षि नारद ने भी कान्ता भाव को गोपी भाव माना है। इसी प्रकार मीरा की गिरधर के प्रति आसक्ति से वे मध्यकालीन युग की संयोगवृति, नित्य संयोगवृति और योग कान्ता थी। वे कृष्ण की तरह जीवन में त्याग करते हुए अपने प्रीतम में समा गई। उन्होंने कहा कि राधा-कृष्ण लीला में कुछ से कुछ बन कर अधिकारिणी बन गई लेकिन मीरा ने दासी भाव से कृष्ण को अंगीकार किया, वे किसी सम्प्रदाय विशेष की प्रतीक न बनकर कृष्णकान्ता बनी रही। 

अहमदाबाद से आए डॉ. किशोर काबरा ने कहा कि नरसी भगत चन्दन की तरह घिसने वाले और मीरा वन्दन की प्रतीक थी। उन्होंने मीरा को विचारधारा का प्रतीक बताते हुए कहा कि वे गुरू भक्ति के प्रति श्रद्धावान व स्वयं में आसक्ति भाव रखती थी। उन्होंने गुजरात में मीरा को मिले स्नेह और सम्मान की चर्चा करते हुए कहा कि मीरा के गुजराती पदों का अन्वेषण करते हुए उनके प्रमाणिक पदों में उन्हें जोड़ा जाना चाहिए। 

विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि मीरा लोकदर्शन की प्रतीक थी। लोक के तादातम्य के बिना दर्शन का चिन्तन अधूरा है। उन्होंने मीरा को भक्ति साहित्य का विलक्षण सेतु, अप्रतिम विदूषी, मीरा में भक्ति का लोक और लोक की भक्ति का भाव निरूपित किया। असमिया लेखक देवीप्रसाद बागड़ोदिया ने भक्तिमती मीरा और मणिपुर की राजरानी बिम्बावती की तुलना करते हुए कहा कि काल खण्ड में भले ही वे अलग रही हो, लेकिन दोनों ही कृष्ण भक्ति की सरिताएं थी। 

प्रारम्भ में मीरा स्मृति संस्थान के सदस्यों द्वारा आगन्तुक विद्वानों का माल्यार्पण तथा शेषावतार कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान की ओर से उपरणा ओढ़ा कर व कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय का पत्रक भेंट कर स्वागत किया गया। संस्थान के अध्यक्ष भंवरलाल सिसोदिया ने विद्वानों का आत्मिक स्वागत किया वहीं संगोष्ठी का संचालन स्वामी डॉ. ओमानन्द सरस्वती ने किया जबकि संस्थान के सचिव प्रो. एस.एन. समदानी ने संस्थान की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के अध्यक्ष श्री भट्ट ने मीरा महोत्सव पर आयोजित मीरा निबन्ध प्रतियोगिता का सामान्य वर्ग में मोहम्मद तारीक अहमद को प्रथम, अनिल गोठवाल को द्वितीय व ऋषभ मुरड़िया को तृतीय, छात्रा वर्ग में निशा उपाध्याय को प्रथम, अनिता कुमारी को द्वितीय व रूपा खत्री को तृतीय पुरस्कार के लिए प्रशंसा पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। गोष्ठी में संस्थान के न्यासी, पदाधिकारी, विभिन्न समितियों के सदस्य, बड़ी संख्या में विद्वान व मीरा भक्त उपस्थित थे।
(रामप्रसाद मूंदड़ा),प्रचार प्रसार समन्वयक


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

माणिक
वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.

उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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