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डा. मनोज श्रीवास्तव की कहानी 'डिस्पोजेबल आइटम'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अक्तूबर 31, 2011 | सोमवार, अक्तूबर 31, 2011


(मूर्धन्य साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र द्वारा संपादित पत्रिका 'साहित्य अमृत' में प्रकाशित है जिसे पाठकों के  हित में यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.-सम्पादक )
         
डैड की बीमारी पर किसे खुंदक नहीं थी? उन खबीस को भी ऐसी लाइलाज बीमारी तभी लगनी थी जबकि इतना दिलचस्प क्रिकेट मैच चल रहा था! वह मैच भी कोई मामूली मैच नहीं था. वर्ल्ड कप का मैच था. भारत और पाकिस्तान के बीच सीधा मुकाबला था. इसलिए, मेरा घर ही क्या, सारा मोहल्ला क्रिकेटमय था. मोहल्ले से निकलकर सड़क पर आने के बाद चाहे किसी बस की सवारी की जाए या बाजार में चहलक़दमी की जाए, क्रिकेट की चर्चा हर जुबान पर थी. चाय-पान की गुमटियों से लेकर शहर के चप्पे-चप्पे पर लोगबाग इस वर्ल्डकप को लेकर बहसा-बहसी में जमे हुए थे. मेरे आफिस में भी इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर गलाफोड़ तकरार जारी था. कभी-कभार यह तकरार झगड़ा-फसाद का भी रूप ले लेता था. मेरे आफिस वाले ही क्या, दूसरे कार्यालयों के अधिकारी-कर्मचारी भी छुट्टियां लेकर अपने-अपने घरों में टी० वी० सेटों के आगे वर्ल्ड कप के मैचों का सीधा प्रसारण देखने में जमे हुए थे. ऐसे में ऐसा लगता था कि जैसे सारी दुनिया को क्रिकेट के सिवाय कोई और काम नहीं है. बेशक! मेरा घर भी इस टूर्नामेंट का लुत्फ़ उठाने में जुटा हुआ था--घर के सारे कामकाज को ताक पर रखकर. यहाँ तक कि लोगबाग ने खुद को शौच, स्नान आदि को भी गैर-ज़रूरी समझ, चाय-नाश्ता, खाने-पीने तक ही सीमित कर रखा था. हमें तो यह भी चिंता नहीं थी कि घर में बीमार डैडी की तीमारदारी में सभी को जुट जाना चाहिए ताकि वह ज़ल्दी से भले-चंगे होकर किसी अनिष्ट की आशंका से हमें मुक्त कर दें! घरेलू डाक्टर अष्ठाना ने पहले ही चेतावनी दे रखी थी कि अगर उन्हें वक़्त पर दवाइयां नहीं दी गईं और उनकी हालत पर खास निगरानी नहीं रखी गई तो उनकी बीमारी जानलेवा भी हो सकती है.

शायद, डैडी रोमांचक क्रिकेट का परवान चढ़ते जा रहे थे. यों तो, उन्हें भी क्रिकेट मैचों में बेइन्तेहाँ दिलचस्पी रही है; लेकिन, इस बीमारी के कारण उन्हें वर्ल्ड कप मैचों का मजा न ले पाने की भीतर ही भीतर बेहद कसक होगी, जिसे वे व्यक्त नहीं कर पा रहे होंगे. आखिर, उनके जीर्ण-शीर्ण शरीर में मैचों का आनंद लेने का दमखम कहाँ रहा?

भारत के फ़ाइनल में पहुंचते ही सभी ने अपनी दिनचर्या को भी किनारे कर दिया. रात को डैडी की देखभाल के लिए किसी को भी अपनी नींद हराम करना गवांरा नहीं था. उधर डैडी कराहते रहते और इधर हम गहरे नींद में खर्राटे भर रहे होते. कई बार तो वह पानी-पानी की रट लगाते रहते; पर, कोई उठने का नाम तक नहीं लेता. ऐसे वक़्त में मम्मी की ज़िम्मेदारी बनती थी कि वह उनके दुःख-दर्द में हाथ बंटाने के लिए उनके सामने मौजूद रहतीं. हमें भी संतोष होता! क्योंकि हमें उनकी सेवा करने की नैतिक दुविधा से मुक्ति मिल जाती--'चलो! हमें डैडी की सेवा करने न करने में धर्म-संकट में फ़िज़ूल नहीं पड़ना पड़ा.'

जब वर्ल्ड कप की सनसनीखेज़ पारियां रात को शुरू हुईं तो हम सभी की आँखों से नींद ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग. डैडी के बेडरूम में जो ब्लैक एंड व्हाइट टी० वी० लगी हुई महीनों से सीलन खा रही थी (क्योंकि उन्होंने बीमारी के कारण काफी समय से टी०वी० देखना बंद कर दिया था), उसे मेरी बहन हेमा अपने कमरे में उठा ले गयी थी ताकि वह अकेले में मैचों का बेखट मजा ले सके. हमने भी टी०वी० पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करने के साथ-साथ कानोप्न से मिनी ट्रांजिस्टर चिपका रहा था.

यह स्थिति और भी भयावह थी. अगर रात को दवा-दारू के अभाव में डैडी के प्राण भी निकल जाते तो उसकी खबर सवेरे ही मिलाती. क्योंकि देर रात तक मैच के ख़त्म होने के बाद हम तत्काल बिस्तरों पर सो जाते थे और सुबह हमारी नींद तब खुलती थी जबकि महरी या ग्वाला दरवाज़ा खटखटाते थे.

दो दिनों से मैं भी आफिस नहीं जा रहा था. जब तक लीग मैच होते रहे, मैंने आफिस में पाकिट ट्रांजिस्टर से ही काम चलाया. बीच-बीच में अपनी पत्नी सुधा को घर पर फोन करके मैच के बारे में ताजा स्थिति की जानकारी लेकर ही संतोष कर लेता! लेकिन, जब भारत ने साउथ अफ्रीका को सेमी फाइनल में पीटकर फाइनल में प्रवेश पा लिया तो मैंने अपने जूनियर को सेक्शन का चार्ज सौंप कर छुट्टी मार ली. मेरे खाते में छुट्टियों का हमेशा अभाव रहा है जिसके चलते डैडी की हालत बेहद गंभीर होने के बावजूद मैं उन्हें खुद कई बार डाक्टर के पास नहीं ले जा सका और उन्हें ड्राइवर के भरोसे छोड़ कर अपनी ड्यूटी पर निकल पड़ा.

उस दिन फाइनल में पहुँचने के लिए सेमी फ़ाइनल का मुकाबला पाकिस्तान और आस्ट्रेलिया के बीच था. सारा देश पाकिस्तान के हारने की उम्मीद लगाए बैठा था क्योंकि लोगों को यकीन था कि अगर फाइनल में भारत का सामना पाकिस्तान से हुआ तो उसके जीतने की आशा धूमिल पड़ जाएगी. मेरे घर में भी सभी, सब कुछ छोड़कर यह प्रार्थना करने में जुटे हुए थे कि काश! पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया के हाथों चारों खाना चित्त हो जाता.
पता नहीं क्यों? पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए न केवल हमारे खिलाड़ियों का मनोबल आधा हो जाता है, बल्कि हम भी अपनी हार माँ बैठते हैं.

सुबह जब मम्मी नहा-धोकर रोज़ की तरह मंदिर को दर्शन करने निकलीं तो हम सोच रहे थे कि वह मंदिर में जाकर ईश्वर से डैड के रोगमुक्त होने के लिए प्रार्थनाएं करेंगी. लेकिन, मंदिर से वापस आते ही वह मरीजखाने में डैड के पास जाने के बजाए सीधे ड्राइंग रूम में तशरीफ़ लाईन जहां भाईसाहब और मेरे बीच इस बाबत जोरदार बहस छिड़ी हुई थी कि सेमी फाइनल में कौन जीतेगा--पाकिस्तान या आस्ट्रेलिया. भाईसाहब तो पाकिस्तान द्वारा सेमी फाइनल में पूर्व वर्ल्ड कप चैम्पियन--आस्ट्रेलिया को शिकस्त दिए जाने के पक्ष में दनादन तर्क दिए जा रहे थे जबकि मेरे द्वारा आस्ट्रेलिया को जिताने के लिए दी जाने वाली सारी दलीलें हल्की पड़ती जा रही थीं.

बेशक! उस वाक् युद्ध में मैं अपनी हार से बेहद मायूस होता जा रहा था. वहां मौजूद मेरी पत्नी सुधा को भी इससे बड़ा कोफ़्त हो रहा था. मुझे उसके सामने अपनी मात से और भी ज़्यादा आत्मग्लानि हो रही थी. वह भी चाहती थी कि भले ही पाकिस्तान क्रिकेट के मैदान में आस्ट्रेलिया को धूल चटा दे, लेकिन भाईसाहब से तर्क-कुतर्क में मैं मात न खाऊँ. बहरहाल, मुझे अपनी बहन--हेमा पर अत्यंत क्रोध आ रहा था जो बिलावज़ह भाईसाहब का पक्ष ले रही थी और वह भी बड़ी चुटकियाँ ले-लेकर. उसकी व्यंग्य-मुस्कान से यह साफ ज़ाहिर हो रहा था कि वह मुझे चिढ़ाना ज़्यादा चाह रही है और पाकिस्तान को जिताना कम. अन्यथा, वह छोटी बहन होने के बावजूद, भाई साहब को आदतन यह सबक देने की गुस्ताखी तो जरूर करती कि 'भैया, क्रिकेट जैसे पेंचीदे विषय से आपका क्या लेना-देना? जाइए, आप किसी मुकदमे की गुत्थी तलाशिए. वकालत के पेशे वालों को क्रिकेट में कतई दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए.'

लिहाजा, मुझे यह सोचकर बड़ा सुकून मिला कि चलो, कम से कम मेरे घर में एक तो ऐसा बन्दा है जो क्रिकेट को गंभीरतापूर्वक न लेकर मजाकिया लहजे में ले रहा है. मैं भी इस विश्व कप में भले ही दिलचस्पी ले रहा था, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर मैं क्रिकेट जैसे खेल का आलोचक रहा हूँ. क्योंकि जब कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच होता है तो सारे देश की हालत नाबदान में ठहरे हुए पानी जैसी हो जाती है. घर, खेत-खलिहानों, कल-कारखानों, दफ्तरों आदि में सारी गतिविधियाँ ठप्प पड़ जाती हैं. सोचिए, जितने दिन क्रिकेट मैच होता है, देश की कितनी श्रम-ऊर्जा निष्क्रिय होकर व्यर्थ जाती होगी! कितना आर्थिक नुकसान होता होगा!

बहरहाल, मम्मी के आते ही बहसा-बहसी की फिजां ही बदल गई. सारा पासा ही पलट गया. मंदिर से आने के बाद उनकी बातों में बड़ा दम आ गया था. आखिर, उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ ईश्वर से जो मन्नतें मानी थी, वे व्यर्थ थोड़े ही जाने वाली थी. सो, जब पाकिस्तान भाई साहब को आड़े हाथन लिया तो उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई. उस पल, ऐसा लगा कि जैसे आस्ट्रेलिया के हाथों पाकिस्तान का हारना तय है.

उस रात, हमने यह निश्चय किया कि हम सब दालान में बैठकर टी.वी. देखेंगे और पाकिस्तान को हारते हुए देखने का असली मज़ा लेंगे. सुधा ने वहीं एक टेबल पर स्टोव, केतली और चाय बनाने का सारा सामान भी जमा कर दिया था ताकि बीच-बीच में चाय पीते हुए मैच देखने का असली लुत्फ़ उठाया जाए. भाई साहब ने पाकिस्तान की जीत को सेलीब्रेट करने के लिए पटाखे छोड़ने का इंतजाम पहले से कर लिया था. मैंने आस्ट्रेलिया की जीत के उपलक्ष्य में ऐसा कुछ भी न करने का इंतजाम किया था. क्योंकि मन ही मन मैं भी आस्ट्रेलिया के हारने के भय से मुक्त नहीं हो पाया था.

डिनर के बाद, सभी दालान में तशरीफ़ लाए. हेमा भी आ गई. इस दिन वह अकेले मैच देखने से बाज आ रही थी. उसने आते ही अपना आसन भाईसाहब के बगल में जमाया. वह मुझे व्यंग्यपूर्वक देखते हुए भाईसाहब के गुट में शामिल होने का अहसास दिला रही थी. अगर मायके से भाभी आ गयी होतीं तो वह नि:संदेह उनके पल्लू में बैठती. तब, मेरा मनोबल और भी गिर जाता. क्योंकि जब भाईसाहब, भाभी और छोटी बहन की तिकड़ी साथ-साथ बैठती थी तो मैं कोई वाक् युद्ध छेड़ने से पहले ही भींगी बिल्ली बन जाता था. मेरी पत्नी तो बहस में एकदम फिसड्डी थी. सही तर्क न दे पाने के कारण वह बेपेंदे के लोटे की तरह फिस्स मुस्कराकर किसी भे ओर लुढ़क कर उसका पलड़ा भारी कर देती थी.

आखिर में पानदान लटकाए हुए और ताजे पान की गिलौरी चबाते हुए मम्मी ने बिलकुल टी.वी. के सामने दीवान के ऊपर मसनद पर बड़े आराम से दस्तक दिया. उनके हावभाव में बड़ा सुकून था. क्योंकि उन्होंने कुछ क्षण पहले डैडी के कमरे में जाकर उनके सिरहाने स्टूल पर दवाइयां, चम्मच, कटोरी, गिलास और जग में पानी रखते हुए और उन्हें जोर से झकझोरते हुए चिल्ला-चिल्लाकर बता दिया था कि रात को वे याद कर सारी दवाइयां समय से ले लेंगे वरना रोग लाइलाज हो जाएगा. साथ में यह चेतावनी भी दे दी कि वे फ़िज़ूल में बच्चों की तरह शोर मचा-मचाकर हमारे क्रिकेट मैच का मज़ा किरकिरा नहीं करेंगे और सुबह ग्वाले के आने तक हमारे जगने की प्रतीक्षा करेंगे. पता नहीं, उन्होंने मम्मी की बातें ठीक-ठीक सुनी भी थीं, या नहीं. पर, मम्मी अपना पत्नी-सुलभ फ़र्ज़ अदाकार पूरी तरह आश्वस्त नज़र आ रही थीं. हम सभी ने भी उनके चेहरे पर आत्मसंतोष का जो भाव देखा, उससे हम डैडी की ओर से बेफिक्र होकर मैच में पूरी तरह खोने को तैयार हो गए.

बेशक! मैच बड़ा रोमांचक था. आस्ट्रेलिया ने टास जीत कर, पहले बल्लेबाजी की और पूरे ३०९ रन का विशाल स्कोर खड़ा किया. भाई साहब के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. और हमलोग खूब खिल्लियाँ उड़ा रहे थे. हम इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि पाकिस्तान चाहे जितना भी जोर लगा ले, वह इतना विशाल स्कोर खड़ा नहीं कर सकता. इस बीच मम्मी कम से कम तीन-चार दफे उठकर आँगन में गई थीं और तुलसी के गमले में रखे शिवलिंग पर बार-बार मत्था टेक आई थीं. लिहाजा, जब पाकिस्तान ने लगभग १४-१५ रन की औसत से धुआंधार बल्लेबाजी शुरू की तो हमलोगों के मुंह से सिसकारी भी निकलनी बंद हो गई. जब तक आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज पाकिस्तानी गेंदबाजों के छक्के छुडाते रहे, हम विस्फोटक हंसी हंसते रहे और भाईसाहब को व्यंग्य-बाण से आहत करते रहे. लेकिन, पाकिस्तान द्वारा धुआंधार बल्लेबाजी देखकर हमें विश्वास होता गया कि उसका मैच जीतना कोई टेढ़ी खीर नहीं है. चूंकि उसके चार सलामी बल्लेबाज पवेलियन वापिस लौट चुके थे; लेकिन, उसकी रन बनाने की गति में कोई कमी नहीं आई थी.भाईसाहब का गुट फिर उत्तेजना में आ गया था. पाकिस्तान के अन्तिम क्रम के बल्लेबाज भी मशीन की तरह रन बना रहे थे. उस दरमियान, मम्मी फिर उठकर शिवलिंग के आगे सिर झुकाने नहीं गईं. मेरी पोतनी सुधा ने आँख मूँद कर भगवान से पाकिस्तान की पराजय नहीं माँगी. मैंने लज्जावश भाईसाहब से नज़रें हटा-हटाकर मिलाईं.

शायद, भगवान में से विश्वास खोने का का दुष्परिणाम कुछ ऐसा हुआ कि अंत में, पाकिस्तान के दसवें क्रम पर आए बल्लेबाज के छक्के ने आस्ट्रेलिया को फाइनल से बाहर कर दिया.
भाईसाहब ने जमकर पटाखे छोड़े. उन्होंने यह भी चिंता की कि इससे बीमार डैडी को बेहद तकलीफ हो सकती है. सायद, उन्हें इस बारे में कुछ याद ही नहीं रहा. ऐसे जोश में होश कहाँ रहता है ?

सुबह जब धूप इतनी तेज हो गई कि हमारा सिर दर्द से फटने लगा, तब कहीं जाकर हमारी नीद खुली. हम पहले ही उठ गए होते. लेकिन, उस दिन महरी छुट्टी पर थी और संयोगवश, ग्वाला भी किसी वज़ह से नौ बजे तक नहीं आया था. अन्यथा, उनमें से किसी के दस्तक देने से हम पहले ही जग गए होते. कहीं हमें खराई न मार दे, इसलिए सुधा ने बासी दूध से ही चाय बनाई और हमें डाइनिंग टेबल पर नाश्ते के लिए बुलाया गया. चाय-नाश्ता कर चुकने के बाद मैंने फिर अपने बेडरूम में जाकर खिड़कियाँ बंद की और बिस्तर पर पसर गया. मम्मी तो नहाने-धोने गुशालाखाने में चली गई थी. लेकिन, मुझसे किसी ने यह भी नहीं पूछा कि तुम्हें आफिस जाना है या नहीं. क्योंकि सभी को मालूम था कि मई अनिश्चित काल के लिए टायफायड का बहाना बनाकर छुट्टी पर हूँ और आफिस तभी जाऊंगा जबकि वर्ल्ड कप मैच समाप्त होगा. भाईसाहब की कचहरी में पहले से ही हड़ताल चल रही थी जिस कारण, वह भी बड़ी तबियत से फाइनल मैच के होने की प्रतीक्षा कर रहे थे. रही छोटी बहन हेमा... तो वह अपने आख़िरी सेमेस्टर के पेपर्स से फारिग होने के बाद मेडिकल सेमीनारों से कतना चाह रही थी. वह पछता रही थी कि उसने इतनी ज़ल्दी मेडिकल असोसिएशन की मेम्बरशिप क्यों ले ली. वर्ल्ड कप मैच के बाद लेती! इस वज़ह से उसे बेकार में रोज़-रोज़ के सेमीनारों आदि में व्यस्त रहना पड़ता था. वास्तव में! फाइनल मैच चार दिनों बाद होना था जिसकी बेसब्री से प्रतीक्षा करने से मिलने वाली अवर्णनीय खुशी में हम किसी काम की फ़िज़ूल चिंता से खलल नहीं डालने चाहते थे.

अचानक, कुछ अजीबोगरीब शोर से मेरी नींद उचट गई. मुझे बड़ी झुंझलाहट सी हो रही थी क्योंकि मेरा एक सुन्दर सपना टूट गया था जिसमें मैं भारत और पाकिस्तान के बीच जो मैच देख रहा था, उसमें भारत का पलड़ा भारी पड़ता जा रहा था और वह नि:संदेह! विजय की ओर अग्रसर हो रहा था.

मै उठकर भीतर आँगन में शोरगुल का जायजा लेने गया तो मम्मी की हालत देखकर हकबका गया. वह बेतहाशा रोने के मूड में लग रही थी. तभी हेमा ने बताया कि डैडी की तबियत ज़्यादा खराब है. वहीं देर से आया ग्वाला भी खड़ा था. दरअसल, उसने कई बार आवाज़ लगाई थी. लेकिन, घर में छाया सन्नाटा देखकर वह आवाज़ लगाता हुआ सीधे डैडी के कमरे में घुस गया था जहां उसने डैडी को बेड के नीचे अचेतावस्था में लुढ़का हुआ औंधे मुंह देखकर प्राय: डर-सा गया था. उसने ही मम्मी को उनकी हालत के बारे में सबसे पहले जानकारी दी थी. वह संभवत: रात से ही वहां पड़े हुए थे. उन्होंने रात को हमें किसी वज़ह से आवाज़ दी होगी जिसे हमने मैच में मस्त होने के कारण नहीं सुना होगा. फिर, उन्होंने उठने की कोशिश की होगी. पर अशक्त होने के कारण गिर पड़े होंगे. दिलचस्प बात यह थी कि हमने सुबह देर से उठने के बावजूद उनके कमरे में जाकर उनकी हालत जानने की जुर्रत महसूस नहीं की. अगर ग्वाला अनजाने में उनके कमरे में दाखिला नहीं हुआ होता तो...
खैर, हेमा ने अपने नए डाक्टरी अनुभवों का इस्तेमाल कर, हमें तत्काल इत्तला किया कि डैडी की हालत नाज़ुक है और अब उन्हें अस्पताल में अब तो भर्ती करा ही देना चाहिए.

हमने ड्राइवर की मदद से डैडी को अस्पताल में भर्ती करा ही दिया. उस दिन हम सभी अस्पताल गए. हम सोच रहे थे कि दो-तीन दिनों में डैडी की हालत सम्हल ही जाएगी. फिर, उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी.उस दिन उनकी कई जांचें हुईं और सभी में आई रिपोर्टें चिंताजनक थीं. खून में शूगर की मात्रा बहुत बढ़ गई थी. रक्तचाप भी इतना बढ़ गया था कि उनका उपचार कर रहे डा. श्रीवास्तव के माथे पर बार-बार बल पड़ जा रहे थे. करीब एक बजे रात को जब उन्हें सांस लेने में दिक्कत-सी होने लगी तो डाक्टर ने तत्काल नर्स को तलब कर कृत्रिम आक्सीजन की व्यवस्था कर दी. यह सब देख, मम्मी चिंता में पड़ गईं कि शायद, अस्पताल में हफ़्तों लग सकते हैं. वह उनके बगल में बैठकर लगातार ग्लूकोज़ की बोतल पर नज़रें गड़ाई हुईं थी. वह बार-बार वहां बेताबी से लगातार चहलकदमी कर रहे भाईसाहब को सवालिया नज़रों से पूछना चाह रही थीं कि बोतल का पानी इतना धीमे-धीमे क्यों चढ़ाया जा रहा है, एकसाथ उनकी नसों में क्यों नहीं उड़ेल दिया जा रहा है. उनकी इस उधेड़बुन पर मेरा मन बेहद खीझ रहा था. आखिर सभी क्यों चाह रहे थे कि जबकि डैडी तीन सालों से लगातार रुग्ण चल रहे हैं, वे अति शीघ्र ठीक हो जाएं! या यूं कही कि हम सभी किसी तरह डैडी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से किनारा करना चाह रहे थे.

सारी रात हम सभी को अस्पताल में बैठकर डैडी की तीमारदारी करनी पड़ी. पिछले तीन सालों से जब से उनकी हालत बाद से बदतर हो गई, किसी ने उनकी तसल्लीबख्श सेवा-सुश्रुषा नहीं की थी. उनके बचपन के दोस्त--डा. अष्ठाना का कहना था कि बदपरहेज़ी ने ही उन्हें इस घातक हालत में ला खड़ा किया है. वरना, उनके मज़बूत कद-काठी को देखते हुए यह कोई नहीं कह सकता था कि मौत का खौफ उन्हें पच्चीस सालों से पहले भी छू सकता है. आज उनका शरीर कई बीमारियों का घर बन गया है. दमा, मधुमेह और अब तपेदिक ने उन्हें बारी-बारी से जकड़ लिया है.

अस्पताल में दाखिल होने के बाद से उनकी हालत में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया. उल्टे, हालत और बिगड़ती जा रही थी. दूसरे दिन, सुबह तक सारी रिपोर्टें आ गईं. डा. श्रीवास्तव ने बताया कि दो दिन पहले की रात को उन्हें दमा का तेज दौरा पड़ा था और अगर उस वक़्त उन्हें उचित दवा मिल गई होती तो उनकी दशा इतनी नहीं बिगड़ती.

तब, हम सभी अपराधबोध से ग्रस्त होकर एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे थे. क्योंकि दौरे के समय तो हमलोग क्रिकेट मैच का आनंद ले रहे थे. हमारी उस स्थिति पर डाक्टर मुंह बिचकाते हुए चले गए थे. शायद, उन्होंने हमारे बाडी लैंग्विज़ से पढ़ लिया था किहमने उस वृद्ध व्यक्ति के प्रति घोर लापरवाही की थी. उस क्षण, हमें ऐसा लगा कि जैसे डाक्टर एक झन्नाटेदार तमाचा मार गया हो.

जब से डैडी अस्पताल में लाए गए थे, उन्होंने हममे से किसी से भी बात नहीं की थी, जबकि वह डाक्टर के सवालों का उत्तर बहुत धीमी आवाज़ में या 'हाँ' और 'ना' में दे रहे थे. हमारे बार-बार पूछने पर भी वह कुछ नहीं बोलते थे. बल्कि बड़ी गैरियत से मुंह फेर लेते थे. उनके चेहरे पर हमने घृणा और तिरस्कार के स्पष्ट भाव देखे थे. बेशक! अगर उनमें ताकत होती तो वे हमारे मुंह पर जोर से थूक भी सकते थे.

उस दिन दोपहर को डाक्टर ने बताया कि डैडी थैलीसीमिया से भी पीड़ित हैं और उनका खून बनना बिल्कुल बंद हो चुका है. सो, शाम से ही उन्हें खून चढ़ाया जाने लगा. भाईसाहब ने कहा कि अभी हमें अपना खून देने की क्या ज़रुरत है. महानगर के रक्त बैंकों में पर्याप्त मात्रा में खून उपलब्ध है. इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा कीमतें देकर खून की चार बोतलें मंगाई गईं. रात को करीब दो बजे, उन्हें दमा के दौरे के साथ दर्ज़नों फटी खांसियाँ आईं. डाक्टर ने बताया कि यह लक्षण ठीक नहीं है. अगर ऐसा दोबारा या तिबारा हुआ तो यह घातक भी हो सकता है.
उस रात उनकी हालत वास्तव में दयनीय थी. वह बड़ी बैचेनी में थे क्योंकि उन्हें सांस लेने में बड़ी परेशानी हो रही थी. मम्मी पिछली रात से बिल्कुल न सो पाने के कारण दस बजे से ही बाहर सोफे पर खर्राटे भर रही थीं. भाईसाहब और मेरी पत्नी सुधा थोड़ी-थोड़ी देर पर डैडी को देखकर, पता नहीं कहाँ घंटों-घंटों तक लापता हो जा रहे थे. हेमा भी डैडी के मर्ज़ पर अलग-अलग डाक्टरों से बातचीत में मशगूल-सी दिखाई दे रही थी. लिहाजा, मैं वहां लगातार डैडी की हालत पर नज़र रखते हुए यह योजना बना रहाथा कि कल सुबह मुझे आफिस ज्वाइन कर ही लेना चाहिए. इसलिए, मैंने चुपके से एक डाक्टर से अपने लिए मेडिकल सर्टीफिकेट और फिटनेस सर्टीफिकेट बनवा लिए ताकि कल ड्यूटी ज्वाइन करने में कोई अड़ंगा न आए.

तीसरे दिन सुबह, मै किसी को कुछ बताए बगैर आफिस चला गया. वहीं से मैंने फोन पर अस्पताल में मम्मी को सूचित कर दिया कि आफिस के मेसेंजेर ने आकर मुझे कुछ आवश्यक काम के लिए बुलाक था जिससे मुझे अचानक ड्यूटी ज्वाइन करनी पड़ी. शाम, को मैं जानबूझकर देर से लौटा. पहले घर जाकर नहाया-धोया और फिर, नौकर से बाहर से चाय मंगवाकर नाश्ता किया. उसके बाद, तसल्ली से अस्पताल गया. वहां, की हालत देख, मैं घबड़ा-सा गया. डैडी के बेड पर कोई दूसरा डाक्टर उन्हें कृत्रिम सांस देने की कोशिश कर रहा था. पूछने पर पता चला कि डा. श्रीवास्तव छुट्टी पर चले गए हैं. नए डाक्टर बोस ने मुझे जोर की झाड़ लगाई--"आप मेजर चौहान के कैसे बेकहन और बदतमीज़ बेटे हैं कि आपके पिता मौत से जूझ रहे हैं जबकि आप सुबह से ही नदारद हैं? कितने शर्म की बात है कि यहाँ आपके पिता एक लावारिस मरीज़ की तरह यहाँ डेथ-बेड पर पड़े-पड़े हमारे स्टाफ के रहमोकरम की भीख मांग रहे हैं! अगर इस दरमियान इनकी मौत हो जाती तो इनकी बाडी का क्लेम करने के लिए भी कोई आगे आना वाला नहीं था..."

मैंने लगभग हकलाते हुए खे प्रकट किया और किसी को ढूँढने के बहाने आसपास का चक्कर लगाने लगा. थोड़ी बाद ग्रीन लान में मैंने मम्मी को उनकी कुछ आगंतुक सहेलियों के साथ जोर-जोर से गप्प लड़ाते हुए पाया. बेशक! चर्चा काविशय क्रिकेट ही था. मुझे अपने पास पाकर उन्होंने अपना चेहरा हाथी के सूंड़ की तरह लटका लिया. जैसेकि वह सुबह से ही गम में डूबी हुईं हों. वह मुझे देखते ही उठ खड़ी हुईं. कहने लगीं, "अभी-अभी तो आई हूँ. क्या करती? तुम्हारी आंटियां डैडी को देखने आई थीं जिन्हें छोड़ने बाहर तक आ गई..."

मैंने सिर्फ उन्हें घूरकर शिकायताना अंदाज़ में देखा. अगर पूचता तो वह भी कह सकती थीं कि तुम भी तो अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए आफिस चले गए थे. उन्होंने चलते-चलते मुझे बताया कि तुम्हारे बड़े भाई एक मुवक्किल के साथ कचहरी चले गए हैं. हेमा सुबह से ही एक सेमीनार में गई हुई है और अभी तक लौटी नहीं, जबकि सुधा अपनी किसी सहेली के बेटे केजन्म दिन पर कान्ग्रेट करने गई हुई है.

डैडी के बेड के पास हमारे कुछ देर तक ठहरने के बाद, डाक्टर बोस ने बताया कि मेजर चौहान यानी मेरे पिता को दोपहर से दो बार तेज दौरा पड़ चुका है और साथ में खान्सियों के साथ खून भी आया है. मैंने मम्मी का चेहरा गौर से देखा. वह इस सूचना से कोई ख़ास प्रभावित नज़र नहीं आ रही थीं. हाँ, कुछ और सुनने की उत्सुकता साफ़ झलक रही थी.

डा. बोस ने फिर कहा, "अब तो भगवान् ही मालिक है. दवा ने भी असर करना बंद कर दिया है. बेहतर होगा कि आप इन्हें अब घर ही ले जाइए. हमने जी-जान से कोशिश की. अब कुछ भी नहीं कर सकते. हाँ, मैं कुछ दवाइयां लिख दे रहा हूँ, इन्हें देते रहिएगा."

हमने डाक्टर के मशविरे को आँख मूँद कर मान लिया. यह भी नहीं सोचा कि अस्पताल में जो चिकित्सीय सुविधाएं मिल रही हैं, वे घर में कहाँ से मिल पाएंगी? हमने मम्मी की आँखों में झाँक कर देखा. उनका इशारा साफ़ था कि डैडी को रामभरोसे छोड़ देना ही श्रेयस्कर है. उन्होंने अपनी सूखी आँखों को साड़ी के पल्लू से बार-बार रगडा. उसके बाद हमने डैडी और सारे सामान-असबाब को कार में डाल दिया. ड्राइवर से कहा, "फ़ौरन घर ले चलो!"

डैडी को उनके बेड पर दोबारा डाल दिया गया. सारा घर फिर से अपनी दिनचर्या में ऐसे व्यस्त हो गया, जैसेकि कुछ हुआ ही न हो. सभी संतुष्ट थे कि चलो! डैडी को बचाने के लिए इतनी कोशिश तो की गई. चालीस-पैंतालीस हजार रूपए भी फूंक-ताप दिए गए. अब भगवान की मर्जी! वह बचें या न बचें!

चूंकि, डैडी की लाइलाज बीमारी का चतुर्दिक विज्ञापन हो चुका था, इसलिए उन्हें देखने आने वाले शुभचिंतकों का भी तांता लग गया था. मम्मी उन्हें चाय पिलाते-पिलाते कुछ रेट-रटाए जुमले सुना देती थी--जैसेकि 'भगवान की मर्जी', 'विधि का बदा टारे नहीं टरे', 'विधाता को हमें सुहागन देखना नहीं भा रहा है', 'पैतालीस साल साथ-साथ जिए, बस! हेमा बिटिया के हाथ पीले नहीं करा सकेंगे,' वगैरह=-वगैरह. तदुपरांत, वह शुभचिंतकों को बेड की ओर इशारा कर देती जैसेकि यह कहना चाह रही हों कि 'बहुत इस्तेमाल कर चुकी, अब इस डिस्पोजेबल आइटम को निपटाना भर बाकी है.'

रात के लगभग ग्यारह बजे हेमा आकर अपने दोस्तों के साथ ड्राइंग रूम में सेमीनार हुई चर्चाओं की समीक्षा कर रही थी. थोड़ी देर बाद जब भाईसाहब घर में तशरीफ़ लाए तो उनका मुंह गुस्से में सूजा हुआ था. या, यूं कहिए कि वे जानबूझकर अपने चेहरे पर गुस्सा लाने की असफल कोशिश कर रहे थे. शायद, वे अस्पताल होते हुए आए थे. बेशक! उनके अहं को इस बात से बेहद चोट पहुँची थी कि डैडी को अस्पताल से वापस लाने के फैसले में उनको क्यों नहीं शामिल किया गया. उन्होंने डैडी का हालचाल लेने वालों की मौजूदगी में हममें से एक-एक की खबर ली, "आखिर, इतनी ज़ल्दी क्या थी कि डैडी को वापस लेते आए? अरे, उन्हें पूरी तरह ठीक तो हो जाने दिया होता! हमलोग एक-दो दिन अस्पताल की ज़िल्लत और झेल लेते! यहाँ क्या है? न कोई डाक्टर है, न ही कोई कायदे की दवा? डा. अष्ठाना तो चूतिया और निकम्मा है. बस, ऊपरी तौर पर डैडी का खैरख्वाह बनने का ड्रामा करता रहता है. उसने ही डैडी को इस हालत में ला खड़ा किया है. उल्टे, उनकी बीमार हालत के लिए हमें ज़िम्मेदार ठहराता है."

मैंने भाईसाहब को एक कोने में ले जाकर बताया, ""हमलोग क्या करते? खुद डाक्टर ने हमें डैडी को घर ले जाने की सलाह दी थी कि अब ईश्वर से प्रार्थना कीजिए. उन्हें कोई करिश्मा ही बचा सकता है, हम जैसे इंसान नहीं..."
मेरी बात सुनकर वह पहले हमारा चेहरा घूरते रहे. कुछ क्षण तक उन्होंने डैडी के कमरे की ओर भी निर्भाव दृष्टि से देखा. मैंने सोचा कि वह कमरे में जाकर डैडी की हालत का जायजा लेंगे. पर, वे ठिठकते हुए अपने बेडरूम में घुस गए.
रात के लगभग साढ़े बारह बजे हम लेट-लतीफ़ खाना खाने के बाद सोने का यत्न कर रहे थे. हम यह सोचकर खुश थे कि अच्छा हुआ कि डैडी घर वापस आ गए. कल का फाइनल मैच टी. वी. पर तसल्ली से देख सकेंगे. अस्पताल में तो इतना बढ़िया मौक़ा खटाई में पड़ जाता. शायद, बेड में पड़े-पड़े हर व्यक्ति यह सोच रहा था कि ज़ल्दी से एक ही नींद में रात गुजर जाए, ताकि कल सबेरे तरिताजा मूड में मैच का भरपूर आनंद लिया जा सके.
अभी हम नींद के कद्रदान बन भी नहीं पाए थे कि एक बौखलाने वाली चींख ने उसमें खलल डाल दिया. हम हड़बड़ाकर उठ बैठे. हमने वाकई एहसास किया किया कि वह चींख डैडी की ही हो सकती है. हम एक झटके से उनके कमरे में दाखिल हुए. डैडी का सारा शरीर तेजी से काँप रहा था. और जबड़ा तेजी से बज रहा था. मम्मी झिझकते हुए उनके हाथ पकड़ कर उनकी कंपकंपाहट को रोकना चाह रही थीं और हमलोग दूर से ही डैडी को तसल्ली दे रहे थे कि 'डैडी, आपको कुछ भी नहीं होगा." पर, वे तो मायूस निगाहों से चारों ओर देखते हुए कुछ अनापशनाप आवाज़ निकाल रहे थे. उस वक़्त, डैडी की इकलौती लाडली बेटी--हेमा की आँखों में आंसुओं का गुबार उमड़ रहा था. इसी बीच सुधा ने बुद्धिमानी दिखाते हुए डाक्टर अष्ठाना को झटपट फोन कर, उन्हें तत्काल बुला लिया.

जब तक डाक्टर अष्ठाना आए, डैडी के शरीर की हरकत बंद हो गई थी. हाँ, आँखें अधखुली थीं. हमने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि डैडी अचानक शांत क्यों हो गए या उनकी आँखें पूरी तरह खुली क्यों नहीं हैं या उनके डांट किटकिटा क्यों नहीं रहे हैं. पता नहीं, उन्हें छूकर उनके शरीर का तापमान जानने में हमें तो हिचक हो रही थी; पर, कुंआरी हेमा डाक्टर होकर भी उन्हें हाथ क्यों नहीं लगाना चाह रही थी? डाक्टर के आने से पहले हममें से कोई भी उन्हें टटोलने की ज़हमत नहीं उठा सका.

डा. अष्ठाना संतोषजनक ढंग से डैडी की जांच करने के बाद ग़मगीन हो गए, "मेजर सा'ब इज नो मोर." उनका निष्कर्ष सुनते ही मम्मी दहाड़ें मार-मार कर बिलखने लगीं. रात से उसका सन्नाटा अचानक छीन गया. उस रात हमें पता चला कि मम्मी रोने-धोने में कितनी माहिर हैं. इसके पहले हमें मालूम नहीं था कि उनके शब्दकोश में ग्रामीणता किस हद तक शामिल है. यों तो हम सभी बेहद दुखी थे और नि:संदेह! दुखी होने का इससे अनुकूल मौक़ा और कोई नहीं हो सकता था. लेकिन, मम्मी के रोने का पूरबीपन हमें बिल्कुल नहीं भाया. अगर कोई और मौक़ा होता तो मै निश्चय ही कह देता कि 'मम्मी, किसी और लहजे में रोओ.'

दु:ख की उस घड़ी में सारा पड़ोस रात के अँधेरे में उमड़ पड़ा. सुबह शहर के कई प्रतिष्ठित व्यक्ति भी आए जो या तो डैडी के जानने वाले थे या दोस्त थे. लिहाजा, हमें यह जानकर बहुत सुकून मिला कि हमारे साथ इतने ढेर सारे लोग पूरी औपचारिकता के साथ शोक मनाने को तैयार हैं.

सुबह के करीब दस बजे, डैडी के शव पर सेना की तरफ से पुष्पांजलि अर्पित की गई. एक रिटायर्ड मेजर की मृत्यु पर ऐसा करना राज्य का कर्तव्य होता है. हमलोगों का सीना तो फख्र से चौड़ा हो गया. सारे मोहल्ले में हमारी नाक ऊंची हो गई. हमें पहली बार अपने पिता के इतने बड़े आदमी होने का एहसास हुआ.

लगभग साढ़े दस बजे शव यात्रा आरम्भ हुई. शव यात्रा में जाते समय, हम दु:खी कम, चिंतित ज़्यादा थे. रास्तों से गुजरते हुए हममें से ज़्यादातर लोगों की निगाहें दुकानों में लगी टी.वी. पर जमीं हुई थीं. कुछ लोग तो इस चक्कर में पीछे छूट जा रहे थे. जैसे ही थोड़ी-सी सड़ाका जाम होती, वे शव यात्रा से अलग होकर दुकानों के सामे खड़े हो जाते और मैच का मजा लेने लगते! बेशक! इन दुकानदारों के टी.वी.परस्त हिने का आज हमें शुक्रगुजार होना चाहिए. टुकड़ों में ही सही, इस फाइनल मैच की जानकारी तो हमें मिल रही थी. मै भी शव यात्रियों के शोरगुल के बावजूद, क्रिकेट कमेंटरी के एक-एक लफ्ज़ पर अमल कर रहा था और उसके दो सलामी बल्लेबाज आउट हो चुके थे. जबकि उसका स्कोर चौदह ओवर में १२२ रन था. यानी, भारत की हालत पतली नज़र आ रही थी. यह बात साफ थी कि पाकिस्तान एक बड़ा स्कोर खड़ा करेगा और भारत को मनोवैज्ञानिक दबाव में बल्लेबाजी करने के लिए मज़बूर करेगा.

इसी दरमियान, मैंने अपने आगे भाईसाहब को बड़ी चिंतित मुद्रा में चलते हुए देखा. ऐसा लगा रहा था कि वह डैडी की अर्थी को अपने कंधे पर धोने के बजाय, भारत की भारी हार का दुर्वह्य बोझ खींच रहे हों. यकायक, मेरी निगाह उनके कान में लगे इयर माइक्रोफोन पर गई. मुझे समझने में देर नहीं लगी कि इन्होंने काले कुर्ते की पाकेट में मिनी द्रान्जिस्टर सेट छिपा रखा था. घने बालों के भीतर वह माइक्रोफोन मुश्किल से नज़र आने वाला था. मै हैरत के समंदर में गोते लगाने लगा. इस असीम दु:ख की घड़ी में भी उन्हें उन्होंने क्रिकेट मैच का दामन नहीं छोड़ा था. वे सिर झुकाए हुए चल रहे थे ताकि सारा ध्यान क्रिकेट कमेंटरी पर केन्द्रित कर सकें. पता नहीं, उस वक़्त वे अच्छी तरह 'राम नाम सत्य' भी बोल रहे थे या नहीं. उस सामूहिक स्वर में किसी को इसका क्या पता चलता? लेकिन, मुझे मन ही मन उनसे ईर्ष्या होने लगी थी. सारे मैच का आनंद एकमात्र वे ही ले रहे थे. मुझे खुद पर बड़ा कोफ़्त हो रहा था कि यह युक्ति मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई. मेरे पास भी माचिस के आकार का बढ़िया द्रान्जिस्टर था जिसे मैं या तो कान खुजलाने के बहाने कान से लगाए रखता या भाईसाहब के नक्शेकदम पर माइक्रोफोन के जरिए कान में फिट कर लेता. किसी को इसकी आहट तक नहीं लगने देता!

दो घंटे की थकाऊ पदयात्रा के बाद हमने श्मशान घाट पर कदम रखा. वहां बिल्कुल ऊपर वाली सीढियों के किनारे जो माला-फूल और पूजन-सामग्री की दुकानें थीं, उनमे लगीं कुछ मिनी टीवियों पर दर्शक उमड़े हुए थे.
बहरहाल, शव के साथ जो चुनिंदा संस्कार किए गए, उनमे भाईसाहब ने बखूबी शिरकत की. फिर, डैडी को मुखाग्नि देने के के बाद पता नहीं, कहाँ वे गुम हो गए? मैंने इधर-उधर उन्हें ढूँढने की असफल चेष्टा की. कुछ देर तक मैंने ऊपर टी.वी. देखने में मशगूल भीड़ में भी उनको तलाश किया. पर, वे कहीं नहीं दिखाई दिए. बेशक! वे वहीं मौजूद रहे होंगे. लेकिन, मेरा ध्यान बार-बार टी.वी. पर ठहर जाने की वज़ह से मै उन्हें ईमानदारी से नहीं ढूंढ सका. जब पुन: नीचे आया तो मेरा मिजाज़ ठीक नहीं था क्योंकि पाकिस्तान ने चौवालीस ओवरों में दो सौ बानवे रन बना लिए थे और शेष छ: ओवरों में बिलाशक! वह कम से कम सत्तर-अस्सी रन तो बना ही लेगा. भला! इतने बड़े स्कोर का भारत कैसे पीछा कर सकेगा? मेरा मन बिल्कुल बैठा जा रहा था. जी कर रहा था कि वहां से तत्काल उठकर घर चला जाऊं और...

तभी महापात्र ने जैसे ही कपाल-क्रिया के लिए आवाज़ लगाई, भाईसाहब तत्काल उपस्थित हो गए. मुझे आश्चर्य हुआ. मैंने देखा कि उन्होंने उस संस्कार को बड़ी कुशलता से अंजाम दिया. उसके बाद, सनातनी रीति के अनुसार, हम पीछे मुड़े बगैर, घर की ओर चल पड़े. जब हम ऊपर दुकानों के पास से गुजर रहे थे तो किसी ने भाईसाहब को आवाज लगाई, "वकील सा'ब! आइए, अब तसल्ली से बैठकर मैच का मजा लें..." सभी ने सिर उठाकर एक बार उन्हें देखा जो बड़ी तल्लीनता से इयर माइक्रोफोन से क्रिकेट कमेंटरी सुनते हुए आगे बढ़ रहे थे.
मेरी समझ में आ गया कि वे बीच-बीच में श्मशान से कहाँ गायब हो जा रहे थे.घर पहुंचकर हमें एहसास हुआ कि पिता के विछोह ने हमें अनाथ बना दिया है. गमी के सन्नाटे में सारा माहौल ऐसे डूबा हुआ था जैसेकि अंतरिक्ष में उड़ाते भूतों के बीच कोई गोरैया फंस गई हो.

मेहमानखाना रिश्तेदारों से भरा हुआ था. आँगन में एक चौकी पर स्वर्गीय डैडी की एक बड़ी-सी माल्यार्पित तस्वीर लगा दी गयी थी. दीपक और अगरबत्तियां जल रही थीं. महापंडित वहां किसी कर्मकांड की रूपरेखा तैयार कर रहा था. मै पता नहीं, किन्हीं अंतर्द्वंद्वों के चलते बाहर दालान में आकर टहलने लगा. अचानक, मुझे लगा कि हेमा के कमरे के पास से कुछ सनसनाहट-भरी आवाज़ आ रही है. तब, मै, गलियारे से होते उए पीछे जा धमाका. मैंने हेमा के कमरे में झांककर देखा तो वहां घुप्प अँधेरा छाया हुआ था. तेज धूप में से अचानक अँधेरे में आने के कारण कुछ भी साफ़-साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था. कुछ पल बाद, मुझे टी.वी. पर क्रिकेट का मैदान स्पष्ट दिखाई देने लगा. मैंने भीतर दाखिल होकर खिड़की से परदा खींचा तो बहन हेमा और पत्नी सुधा कोने में दुबकी हुई नज़र आईं. वे मुझे देख, एकदम से सिटक-सी गईं. मेरे मन में गुस्से का बवंडर उमड़ रहा था. जी में आया कि दोनों को तेज फटकार लगाऊँ. लेकिन, तभी हेमा ने मेरे आगे स्टूल खिसकाते हुए भर्राती हुई आवाज़ में कहा, "भैया! इंडिया इज ग्रेजुअली क्रम्बलिंग डाउन. पाकिस्तान के ३५४ के जवाब में भारत ने पांच विकेट खोकर कुल १०२ रन बनाए हैं. उन्तीसवाँ ओवर चल रहा है. डेफिनिटली इंडिया हज लास्ट द वर्ल्ड कप..."

उसकी सूचना से मेरा गुस्सा काफूर हो गया. मैंने गिन-गिनकर भारतीय बल्लेबाजों को दो-चार गैयाँ सुनाईं. जब बाहर निकला तो देखा कि मम्मी अहाते में तुलसीदल के पास हाथ जोड़कर शिवलिंग के से कुछ प्रार्थना कर रही थीं. मै दो मिनट तक वहां खड़ा रहा. संभवत: उन्हें वहां मेरी उपस्थिति का अहसास ही नहीं रहा. आखिरकार, मै उसी गलियारे से फिर वापस लौटने लगा. मैंने जाते-जाते पीछे घूमकर देखा कि मम्मी हेमा के कमरे की ओर जा रही हैं. मुझे यकीन हो गया कि वहां मम्मी हाथ जोड़कर डैडी की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर रही थीं. बल्कि, भारत के क्रिकेट में विजयी होने के लिए प्रार्थना कर रही थीं.

जब तक मैच चलता रहा हम बेहतर अंडरस्टैंडिंग के साथ बारी-बारी से कमरे में जाकर मैच देखते रहे. रिश्तेदारों को और यहाँ तक कि भाईसाहब को भी इसकी भनक नहीं लगी. शाम को जब पंडितजी गरुण पुराण सुनाने आए तो हमारी क्रिकेट-भक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी क्योंकि भारत, पाकिस्तान के हाथों शर्मनाक हार, हार चुका था.

हमने बड़ी श्रद्धा से सांसारिक निस्सारता पर पंडितजी की कथा सुनी. वर्ल्ड कप में भारत का पत्ता साफ़ होने के बाद, सचमुच सारा संसार निस्सार-सा लगने लगा था.

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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