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डा. मनोज श्रीवास्तव के काव्य संग्रह "परकटी कविताओं की उड़ान" से

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 09, 2011 | रविवार, अक्तूबर 09, 2011

 क्रांति की प्रतीक्षा में

पीछे मुड़कर
इतिहास-पथ पर ढूंढ़ आओ,
वह कहीं नहीं दिखेगी,
वह कभी नहीं आई है
सिर्फ विडम्बना खेलती रही है
हमारी स्पंजी सभ्यता से
झोपड़पट्टियों  से
सजीले राजमार्गों तक

भिक्षुओंसूफियों और क्रांतिवीरों की भीड़
हजारों पीढ़ियों से करबद्ध रोती-बिलखती
आह्वान करती रही है उसका
और कभी-कभार बाजुओं से
असफल उतरती भी रही है

वह बंजर बाजुओं में नहीं
उर्वर भावनाओं से प्रसवित होती है
पलती हैबढ़ती हैसयानी  होती है
दिल के एक कोने में
इंसानियत के शीतल तरु-तले
वह प्रतीक्षा में है
एक इंसानी कवायद की

वह नारों से अवतरित नहीं होगी
सियासी मसखरों के
स्वान्त: सुखाय जुमले
उसे हमसे कोसों दूर ले जाएँगे
काव्यनाद पर भी
वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगी
उसे कितना भी गलाफाड़ पुकारो
वह अगले डेढ़ सौ सालों तक
अंगूठा दिखाती जाएगी
बुड़भक भुच्च हिन्दुस्तानियों को

भूख कैसी भी हो
रोटी बांटने वह क्यों आएगी
प्यास कितनी भी असह्य हो
तुम्हारे आंगन वह
कुआँ खोदने नहीं आएगी
हत्याएं कितनी भी जघन्य हों
हत्यारों के खिलाफ वह
पंचायत बैठाने कैसे आएगी

वह तब आएगी
जब मुर्दनी विचारों से
हम मुक्त होंगे
जब हम नींद में भी चौकस होंगे
जब रंगरेलियों में भी
बच्चों का ख्याल कोंचता रहेगा
जब हम पोस्टरों में
नारों की घुड़सवारी तज
सड़कों को पगडंडियों की ओर
उन्मुख करेंगे

हांबस वह
एक बार ही आएगी
और हम सबको
देवता बन जाएगी
भावी सन्ततियों द्वारा पूजे जाने के लिए.

प्रेम का आतंक

वह इनमें से
किसी को भी
प्यार कर सकता है,
परउसे डर है कि
ये उन्हें अंकल न कह दें

वह इनके इर्दगिर्द मंडराता है,
अपने पहचानवालों से मुंह चुराकर
इनकी गोलबंदी के बीच से
सांस थामे
सिर झुकाए
और खांसते हुए
निकल जाता है

फिरपछताता है
उनसे आँख न मिला पाने की 
विवशता पर,
पछताता ही जाता है--
कि काश! 
वह मूंछ की सफ़ेद बालों को
मुस्कराहटों में छिपाकर
गरदन को अकड़ाकर
छोकरे की तरह कंधे उचकाकर
झटके से सिर के
चुनिंदा बाल उड़ाकर
प्रेम-संदेश पहुंचा देता

परवह कांप उठता है
घाम-बतास से सूखे
गाँछ की टूटती टहनी की तरह,
प्रेम के ख्याल भर से
आतंकित हो उठता है कि
आखिर,
किस चिड़िया का नाम है 'प्रेम'

घर में इस्तरी की तरह
टी०वी० से चिपकी हुई
उसकी पत्नी है
जो उसकी मरती भावनाओं को
प्रेस कर देती है,
मोबाइल की तरह
'इश्क दी गली बिच नो एंट्री'
बजते बजते हुए
उसके बच्चे भी हैं
बेहद लाड़-दुलार के काबिल
परवह डरता है
उनमें से किसी को भी
पुचकारने से
और वह घुस जाता है
रसोईं में काम ज़रूरी निपटाने,
जबकि पत्नी ड्राइंग रूम में
विहंस-विहंस बतियाती जाती है
एकता कपूर की दुश्चरित्र पात्रों से
और वह महीनों से
एक भी प्रेम-कविता न लिख पाने के गम में
औंधे मुंह कब रात को
सुबह में तब्दील कर देता है,
उसे कुछ भी आभास नहीं होता

पर उसे आस है कि
अगर वह न कर सका तो
इनमें से कभी कोई
प्रेम प्रस्तावित ज़रूर करेगी
और उसका मर्द होना
सुफल-सार्थक हो जाएगा.

गहरी साजिश 

गहरी साजिश खेली जा रही है
साध्वी पृथ्वी के खिलाफ,प्रकाश मार्गों से एलियनों के दस्ते भेजे जा रहे हैं,ख्यालगाह की उड़न तश्तरियाँ स्थूलरूप धारण कर हमारी टोह लेने लगी हैं,इस अप्रत्याशितता में हमारा अमन-सुकून रेत हो गया है,हम अपने बदन टटोल कर भी शुष्क अन्तरिक्ष में जीवन की लालसा लिएसदियों से गुम अपने होश नहीं ढूंढ पा रहे हैं
जबकि यह तय है कि इस जमीन पर बचे-खुचे आक्सीजन से अन्तरिक्ष के निर्वात सीने में जान नहीं फूंकी जा सकती है,खगोलीय कंकालों को
वैदिक मंत्रों या वैज्ञानिक प्रयोगों से नहीं जिलाया जा सकता है.



योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डा. मनोज श्रीवास्तव 
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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