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डा. मनोज श्रीवास्तव की दो नई रचनाएं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, नवंबर 04, 2011 | शुक्रवार, नवंबर 04, 2011


ये जो कहानियां हैं 
बडी मुंहफट्ट और बदतमीज हैं,
मैं कहीं भी होऊ
मुझे कह ही देती हैं,
मेरी जाती बातें 
सरेआम कर देती हैं,
नाती-पूत समेत नंगा कर देती हैं,
चिरकुट पुरखों की
रही-सही अस्मत भी 
हंसोढ़ों के आगे
नीलाम कर देती हैं,
पढ़ाकू कुक्कुरों से नुचवाने-छितराने
पंडालों-चौरस्तों पर
धकेलकर-पटक कर 
चित्त कर देती हैं

डांटू या फटकारूं 
याबार-बार लतियाऊ
बेकहन-बेहया बाज नहीं आती हैं,
फंटूसी-फटेहाली-फटीचरी
बकवासी किताबी जुबानों से 
कभी-भीकहीं भी 
बयां कर देती हैं,
कितना भी दुरदुराऊ
अपनी कुत्तैनी हरकत 
दिखा ही जाती हैं 

खुफिया कहानियां 
हर डगरहर पहर पर 
बांहें फ़ैलाए--सैकडों-हजारों,
सिने से भेंटने 
अनचाहे मिल जाती हैं,
बीते-अनबीते दिन-रातें
समेटने-सहेजने का झांसा देकर 
अंदरूनी मामलों में 
चोरनी इच्छाओं की 
और मन के कैदखाने में 
कालापानी काट रहे 
बेजा खयालों की 

घुमंतू कहानियां 
दर-ब-दर भटकाकर
बिलावजह थकाती-छकाती हैं,
देहाती इलाकों की गोबरैली झुग्गियों में 
खरहर जमीन पर माई के हाथों 
पाथी हुई लिट्टीयां 
लहसुनिया चटनी से 
अघा-अघा चंभवाती हैं,
खानाबदोशोंलावारिस लौडों,
बहुरुपियोंफक्कड़ोंहिजड़ों और गुंडो 
के तहजीबो-करतूतों को
अनायास मुझसे ही क्यों 
अवगत कराती हैं?

दिखलाती हैं विसंगतियां 
शहरी चौराहों पर गाँवों की अल्हड़ियाँ,
भुच्च और बेढब 
गंवई पनघटों पर नगरी मोहल्लों की 
ढीठ और अलहदी ठिंगनी दुलारियाँ,
ठौर-ठौरडांय-डांय क्वांरी महतारियाँ,
छोरी में छोरे और छोरों में छोरियां,
रंडों में रंडियां,
ब्लाउज और साड़ी में कराटे और पाप वाली
शहरी रणचंडियाँ

लोफर और लुच्चीलफंगी कहानियां 
लाजवाब लहजे में जीभ लपलपाती हैं
कड़वाहट जीवन की खूब बकबकाती हैं 
हंसती हैंरोती हैं,
नाच-नाच गाती हैं
अंधों-अपाहिजोंयतीम लावारिसों 
फक्कड़ोंभिखमंगों 
के झुंडों में बैठकर 
कहकहे लगाती हैं,
चुटकले सुनाउनके मन बहलाती हैं 
उनकी लाचारियों पर आंसू बहाती हैं 
हमदर्द होने का नाटक दिखाती हैं 

मनहूस मौसमों में मसखरी कहानियां 
औरताना तालों की मर्दाना चाभियाँ
लतीफे सुना-सुना 
फोड़ती हैं हंसगुल्ले,
बहाने बना-बना 
खोलती हैं ग़मज़दा 
दिला की तिजोरियां,
हैं जमा जिनमें 
जंगीले जेहन के 
खिसियाए ख़्वाबों की 
नकली रेज़गारियाँ,
खरीद नहीं पाएं जो 
खैरियतखुशहालियां,
लाख हँसाए वो 
ज़ख्म सहलाएं वो 
मिटा नहीं पाएं वो 
कोई रुसवाइयां 

कभी हुईं सगी नहीं 
सौतेली कहानियां,
चोट-मोच-घावों पर 
दर्द-भरे आहों पर 
कसती हैं तानें,
ऐसी डाक्टरनी हैं,

जो नुस्खे बताकर
हम बीमारों से 
पल्ला झाड़ लेती हैं

सचये कहानियां हैं 
बहुत कुछ सोचने वाली
बहुत कुछ करने वाली
बहुत कुछ कहने वाली,
होनी और अनहोनी 
आगत और अनागत 
काल और अकाल 
सब कुछ समेटे हुए
ज़िंदगी के ज्वार-भाटे
गोद में दुलराती हैं,
परजब जी में आया हमें
कान-बांह उमेठकर 
अपने ओसारे से 
बाहर पटक देती हैं.




अंदर का आदमी 

पहली बार
अंदर का आदमी
दिखाई दे रहा था,
एकदम उसके बाहर
साफ-साफ
उजला और चमकदार

उसकी व्यस्त चर्या में
शौचस्नाननाश्ता-भोजन की
कोई ख़ास अहमियत नहीं थी,
वह थोड़ी-सी ऊर्जा इकट्ठी कर
रोज़ काम पर निकल जाता था--
अंदर के आदमी को
बाहर के मज़बूत आदमी से
जकड़े हुए

वह अंदर के आदमी से
बदशक्ल था
और ठण्ड में
अपनी दादी की कथरी ओढ़े हुए था

अंदर का आदमी
बेहद दुबला-पतला था,
वह तमीज़दार था
उसके बालों पर
कंघी हुई थी
कपड़े पुराने थे
परधुलाए-इस्तरी कराए हुए थे

वह गंभीर था,
बाहर के आदमी की तरह
मुंह चियारे हुए
अपनी बदनसीबी
बयां नहीं कर रहा था

मैं पहली बार
अंदर के आदमी को
बाहर के आदमी के बाहर
क़दम-दर-क़दम
चलते हुए देख रहा था

अंदर के आदमी की पीठ पर
एक भारी-भरकम गठरी थी
गठरी में आसमान था--
सपनों का
जो रहा होगा कभी
टूटा-फूटा,
आज वह बुरादा होकर
कूड़े में तब्दील हो गया था,
उसके सपनों के कूड़े से
सड़ांध आ रही थी
परमोह उसे छोड़ नहीं रहा था

सपनों के बुरादे में क्या था--
एक गाँव था
गाँव में एक नन्हा-सा मटियाला घर
घर के बाहर एक गाय
और हू-ब-हू
अंदर के बूढ़े आदमी की शक्ल का
एक जवान ग्वाला
जो उसे दूह रहा था,
उसके बच्चे
वहां खड़े-खड़े
गिलास-भर दूध की बाट जोह रहे थे
वे दूध पी-पीपल-बढ़ रहे थे
और ग्वाला बूढा हो रहा था

मैंने पहली बार देखा कि
अंदर का आदमी
इतना दस्तावेजी था!
उसके हर हिज्जे पर
कुछ लिखा हुआ था--
हथेलियों पर
मेहनत की इबारत लिखी हुई थी
बेटों के पालन-पोषण
बेटियों का ब्याह
और पत्नी की अंत्येष्टि के लिए
महाजन का उधार लिखा हुआ था

मेरी आँखें उसका अंतरंग देख रही थी,
पहली बार मैंने
अंदर के आदमी को
पारदर्शी होते देखा था,
पेट में पचती हुई बासी रोटियां थीं
रोटियों पर वह था
रिक्शा चलाकर
मोहल्ले के बच्चों को
स्कूल पहुंचाते हुए,
पहली बार मैंने देखा कि
एक मेहनतकश के पेट में
शराबसिगरेट और बीड़ी
नदारद थीं

उसके दिमाग में
योजनाओं और विचारों का
बवंडर चल रहा था,
घरेलू खर्चों के फटे नुस्खे
उड़ रहे थे
जिन्हें वह जोड़-जोड़
सामानों के नाम पढ़ रहा था
और जीवनोपयोगी चीजों को
रेखांकित कर रहा था

मैंने उसके पारदर्शी जिस्म में
बाजार देखा
जहां वह बनियों के आगे
हाथ जोड़े
आटादालचावल
हल्दी-नमक और तेल-मसाला
उधार माँग रहा था

पहली बार
और सिर्फ पहली बार
मैंने देखा कि
अंदर का आदमी
किस कदर बाहर आने
और बाहर के आदमी के
हाथ में हाथ डालकर
चलने के लिए
जूझ रहा था

मैं उस अंदर के आदमी से
मिलना चाहता हूँ
और कहना चाहता हूँ
कि अगर वह
उस आदमी से ऊब गया है तो
मेरे साथ चले,
मैं कभी उसे
अपने भीतर जाने के लिए
ज़द्दोज़हद नहीं करूंगा.

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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