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अशोक जमनानी के एक कविता

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, नवंबर 11, 2011 | शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

मेरे घर की उस दहलीज़ पर
तुम जहाँ खड़े होकर
बुलाते थे मुझे
वहां अब तुम न आते
न बुलाते हो मुझे
पर अब भी तुम्हारी आवाज़
रक्खी है उसी दहलीज़ पर
और मैं गुजरता हूँ
उस दहलीज़ से
कानों पर हाथ रखकर
सब लोग हँसते हैं
कहते हैं इसे
मेरा बेवज़ह का ख्याल
लेकिन कुछ लोग हैं जो
न हँसते न कुछ कहते हैं
बस देखते हैं
चुपचाप मेरी ओर
और उन चंद लोगो को
देखकर समझ जाता हूँ मैं
कि ये लोग भी
गुज़रते होंगे
किसी न किसी दहलीज़ से
कानों पर
हाथ रखकर 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



अशोक जमनानी
www.ashokjamnani.com
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