डॉ. टी.महादेव राव की ग़ज़लें:काश कोई देख पाता दर्द लहर के - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

नवीनतम रचना

डॉ. टी.महादेव राव की ग़ज़लें:काश कोई देख पाता दर्द लहर के


 (1)
बेदर्द नज़ारे हर तरफ
डूबे सि‍तारे हर तरफ
इनसानियत को रौंद गये
भाले हमारे हर तरफ
उंगलि‍यां हैं कानों में
कि‍तनी पुकारें हर तरफ

हर एक मजहबी बात पर
कैसे इशारे हर तरफ
खुदगर्जी भरी दांवो पर
वारे औ न्‍यारे हर तरफ
--------------------------
 (2)
कल तक थे जो गुल अब गुलजार हो चले
हम  बीमार  थे  और भी बीमार हो चले

उनकी हरकतों पे हमेशा उठती हैं उंगलि‍यां
ऐसी बातों से वे मगर लाचार हो चले
गलि‍यों के गुंडे मवाली जो थे कल तक
वही आज कल अपने सरकार हो चले
कुर्सी हासि‍ल हुई तो है, अनपढ हैं तो क्‍या
पर कई फाजि‍ल उनके आगे गंवार हो चले
हमने कि‍या इश्‍क तो बलात्‍कार हो चला
उनके कि‍ये गये रेप मगर प्‍यार हो चले
हमने पढी गजल तो कह दि‍ये बकवास
वे कुछ भी कह दि‍ये तो अशआर हो चले
-------------------------
(3)
अजीब बशर हैं यारों इस शहर के
सब के सब आफ़ताब हैं दोपहर के
सोचो तो कि‍तने हैं शाम के मुंतज़िर
जो आँखें ‍बि‍छाये हुए हैं सहर के

समंदर की उछाल को तो सब ने देखा
काश कोई देख पाता दर्द लहर के
उड़ते थे आसमां पे खुशनुमा परिंदे
आज छुप गये हैं न जाने कहां डर के
चाहते सभी हैं पी लें अमृत के प्‍याले
मगर ‍मि‍ल रहे हैं पैमाने जहर के


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डॉ. टी.महादेव राव
सचि – सृजन

09394290204                              mahadevraot@hpcl.co.in
SocialTwist Tell-a-Friend

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here