'केकरा से करीन अरजिया रे' के अंदाज़ वाले विजेंद्र अनिल शायद यहीं कहीं हैं. - अपनी माटी

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शुक्रवार, नवंबर 04, 2011

'केकरा से करीन अरजिया रे' के अंदाज़ वाले विजेंद्र अनिल शायद यहीं कहीं हैं.


3 नवंबर,2011.आरा और दिल्ली 

3 नवंबर को जनगीतकार और कथाकार विजेंद्र अनिल की स्मृति दिवस के अवसर पर आरा और दिल्ली में साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिकर्मियों ने उन्हें याद किया। 2007 में इसी दिन ब्रेन हेमरेज से उनका निधन हो गया था। आरा में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन ने कहा कि अपने दौर के जनवादी रचनाकारों में वे राजनैतिक तौर पर बेहद सचेत और प्रतिबद्ध रचनाकार थे। जनवादी लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने उन्हें एक ऐसे लेखक के रूप में याद किया जिसके जीवन, लेखन और राजनीति में कोई फांक न थी। कथाकार-आलोचक अरविंद कुमार ने कहा कि युवाओं को उनकी रचनाएं जरूर पढ़नी चाहिए, इससे उन्हें अपने दौर की आस्थाहीनता और विभ्रमों से उबरने में मदद मिलेगी। आज भी उनकी रचनाएं प्रासंगिक हैं। 

अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामेश्वर प्रसाद ने कहा कि भोजपुर के क्रांतिकारी किसान संघर्ष से जुड़कर विजेंद्र अनिल ने ऊर्जा ग्रहण की और जनांदोलन को दिशा दी। उन्होंने इंदिरा की तानाशाही का विरोध किया। सत्ता की तानाशाही के खिलाफ समाज में चल रहे आंदोलनों से लेखकों का जुड़ना क्यों जरूरी है, यह हम उनसे सीख सकते हैं। वे अपने हक अधिकारों के लिए संघर्षरत गरीबों और मेहनतकशों के सच्चे साथी थे। सीपीआई (एमएल) के भोजपुर जिला सचिव का. अमर ने भूमिगत दौर की यादों को साझा करते हुए कहा कि उन्होंने जो जनगीत रचे, उसकी रचना-प्रक्रिया में किस तरह वे भी शामिल रहे। इसके जरिए भोजपुर के आंदोलन की यह सच्चाई भी सामने आई कि यहां संघर्ष और सृजन के मोर्चे पर राजनीति और संस्कृति का कितना अटूट रिश्ता रहा है।

चित्रकार राकेश दिवाकर ने कहा कि विजेंद्र अनिल के गीत को गाते हुए जिस तरह लोग आंदोलनों में शामिल हुए, संघर्ष किया, दमन झेले और शहादतें दीं, वही इसे जाहिर करने के लिए पर्याप्त है कि उनकी लेखनी में कितनी ताकत थी। कवि सुनील चौधरी ने कहा कि अपने दौर में वर्ग-संघर्ष को अपनी रचनाओं के जरिए उन्होंने तेज किया। आइसा के बिहार राज्य अध्यक्ष राजू यादव ने कहा कि आज के दौर में शोषण के तरीके ही बदले हैं, शोषण खत्म नहीं हुआ है। बदली हुई परिस्थितियों में जो ऊपर से नीचे तक मौजूद भ्रष्टाचार है, कारपोरेट घराने की जो लूट है और जनता के आंदोलनों का जिस तरह दमन किया जा रहा है, उसके खिलाफ जो लड़ाई हो रही है, उसमें भी विजेंद्र अनिल की रचनाएं मददगार हैं। उनके गीत और कहानियों में जो संघर्ष की चेतना है, वह आज के दौर में भी प्रासंगिक है। प्रो. बलिराज ठाकुर ने कहा कि विजेंद्र अनिल बेहद निर्भीक लेखक थे, ऐसी निर्भीकता गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता से ही पैदा होती है। विजेंद्र अनिल के बड़े बेटे सुनील श्रीवास्तव का कहना था कि जिस राजनैतिक-वैचारिक धारा से जुड़कर उन्होंने आजीवन संघर्ष किया, उसे आगे बढ़ाना और ताकतवर बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सुनील ने यह भी बताया कि उनकी कई अप्रकाशित रचनाएं हैं, जिनका आज के संदर्भ में महत्व है, उन्हें प्रकाशित करने के लिए भी वे प्रयासरत हैं।

संचालन करते हुए सुमन कुमार सिंह ने उनसे की गई एक लंबी बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि वे बदलती हुई परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं और फिर से वे नए सिरे से लेखन में सक्रिय होंगे। 2003 में उन्होंने अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के स्थापना सम्मेलन में पांच नए गीत लिखे। कई चीजें लिखने की वे योजना बना रहे थे। उनके लेखन के एक नए दौर की शुरुआत ही हो रही थी कि वे असमय हमारे बीच से चले गए। बाजारवाद जब गांव तक फैल चुका है और उपभोक्तावादी प्रवृत्तियां चौतरफा पसरी हुई हैं, तब सचमुच ऐसे जनप्रतिबदध लेखक की बेहद जरूरत थी। वे नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियां और उनकी रचनाएं जनवादी विचारधारा के लिए ऊर्जा का काम कर रही हैं। 

इस मौके पर युवानीति के कलाकारों ने विजेंद्र अनिल के गीत- लिखने वालों को मेरा सलाम, मुझपे इल्जाम कातिलों ने लगाया, केकरा से करि अरजिया हो सगरे बटमार तथा मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना को गाकर सुनाया। कार्यक्रम में युवानीति के संयोजक अरुण प्रसाद, राजू रंजन, दिलराज प्रीतम, जितेन्द्र कुमार, शमशाद प्रेम, किशोर कुमार, विजय मेहता आदि भी मौजूद थे। 

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में राधेश्याम मंगोलपुरी ने कहा कि जिन लोगों से प्रभावित होकर वे साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में आए, उनमें विजेंद्र अनिल प्रमुख थे। उसी दौर में पटना में हिरावल टीम बनी। उस वक्त विजेंद्र अनिल, गोरख पांडेय, ब्रजमोहन आदि के गीत खूब गाए जाते थे। उन्होंने बताया कि विद्यार्थी जीवन में विजेंद्र अनिल, महेश्वर, सुरेश कांटक आदि के संसर्ग में आने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि किस तरह नाटक, साहित्य और कला को जरिए समाज को बदला जा सकता है। उसी के बाद वे संगठन निर्माण के कार्य में लगे और गांवों में जाकर नाटक भी किए। उन्होंने बताया कि संगठन की जरूरत के तहत ही उन्होंने जेएनयू के बजाए पटना में एमए में एडमिशन लिया। यह सब इस कारण ही संभव हुआ, क्योंकि संस्कृति के क्षेत्र में विजेंद्र अनिल और महेश्वर जैसे उत्प्रेरक व्यक्तित्व मौजूद थे। उन्होंने एक रोचक तथ्य का उद्घाटन किया कि किस तरह ये संस्कृतिकर्मी जिस क्रांतिकारी संघर्ष के पक्ष में थे, उसी ने उन्हें जाति के आग्रहों से मुक्त किया। हुआ यह कि वे जिस जाति से आते थे, उस जाति की निजी सेना के खिलाफ कलाकार नाटक करते थे, उन्हें कई बार लगता कि इस तरह तो अपनी ही जाति के खिलाफ वे खड़े हो रहे हैं। लेकिन बाद में जब उस जाति के संपत्तिशाली वर्ग के खिलाफ उसी जाति के गरीबों ने लड़ाई को अंजाम दिया, तब उन्हें लगा कि यह सचमुच एक नए समाज के लिए चलने वाला आंदोलन है, एक ऐसा समाज जहां शोषण-उत्पीड़न और गैरबराबरी नहीं होगी। 

जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य कवि मदन कश्यप ने कहा कि विजेंद्र अनिल का लेखन भोजपुर के संघर्ष का सांस्कृतिक प्रतिरूप है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के बर्बर दमन के बाद नए सिरे से सीपीआई (एमएल) का 1974 में जब पुनर्गठन हुआ और आपातकाल के दमन को झेलते हुए उसे आगे बढ़ाने की चुनौती सामने आई, तब उसे संस्कृति के धरातल पर जिन लोगों ने विकसित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें विजेंद्र अनिल और महेश्वर प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि भोजपुर के जो लोग झारखंड में नौकरी करते थे, उनसे विजेंद्र अनिल के गहरे राजनीतिक रिश्ते थे। बोकारो, धनबाद, चिरकुंडा, बराकर आदि जगहों में सांस्कृतिक संगठन बनाने और श्रमिक सोलडिरिटी का काम करने के दौरान उनके संपर्क बेहद काम आए। ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं, जो जीवन के अंतिम दिनों तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रति दृढ़ रहते हैं। विजेंद्र अनिल ने साठ के दशक में लेखन की शुरुआत की थी, लेकिन उस दौर की अराजक प्रवृत्तियों से बचकर आगे बढ़ने वाले लोगों में वे और कुमारेंद्र पारसनाथ थे। विजेंद्र अनिल का सांगठनिक चरित्र ज्यादा प्रभावी था। भोजपुर में आंदोलन शुरू होने से पहले भी साहित्य-संस्कृति को जनता से जोड़ने की पहल करते वे दिखाई पड़ते हैं। वे उन लोगों में से थे, जो संगठन की नींव होते हैं। वे इतने जमीनी थे कि सबके दोस्त और साथी लगते थे। कठोर वैचारिक प्रतिबद्धता और सहजता का अनोखा मेल था उनमें। 

आरा की नाट्य संस्था युवानीति के पूर्व सचिव सुनील सरीन उन्हें याद करते हुए जैसे अपने सांस्कृतिक सक्रियता के दौर में लौट गए। विजेंद्र अनिल के मशहूर गीत ‘मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना’ को उन्होंने सस्वर गाकर सुनाया। उन्होंने कहा कि उनके गीत जनता के हृदय को छू लेते थे। उनकी लेखनी और विचार की ताकत को उनके गीतों के जरिए पड़ने वालों प्रभावों को हमलोगों ने उस दौर में स्पष्ट महसूस किया था। उन्होंने यह भी बताया कि वे लोग अक्सर कार्यक्रमों की शुरुआत उनके गीत ‘सुन हो मजूर, सुन हो किसान, सुन मजलूम, सुन नौजवान, मोर्चा बनाव बरियार कि शुरू भइले लमहर लड़इया’ से करते थे। दरअसल विजेंद्र अनिल और गोरख पांडेय के गीत जनता की जुबान हैं। सुनील सरीन ने बताया कि सामंती शक्तियों के आतंक और दमन को झेलते हुए किस तरह उन्होंने संघर्ष किया, यह उनकी लंबी कहानी ‘फर्ज’ में देखा जा सकता है। जितनी ईमानदारी और निष्ठा उनमें थी, उसकी जरूरत आज कहीं अधिक है।कार्यक्रम में कवि कुमार मुकुल, आलोचक आशुतोष कुमार, कवि अच्युतानंद मिश्र, फिल्मकार संजय जोशी, संपादक संदीप मील भी मौजूद थे।

रपट लेखक साथी 


सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 



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योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

पल्लव
युवा आलोचक और 'बनास' पत्रिका के सम्पादक हैं,जो अपनी प्रकाशित दो किताबों 'मीरा:एक पुनर्मूल्यांकन'  और आलोचना पुस्तक 'कहानी का लोकतंत्र' से  के ज़रिए भी चर्चा में है.
 
इन्होने शोध निदेशक डॉ.माधव हाड़ा के निर्देशन में देश के जानेमाने कथाकार स्वयंप्रकाश की जनवादी कहानियों पर शोध किया है.

मूल रूप से चित्तौड़ के पल्लव अब बतौर सहायक आचार्य,हिंदी विभाग,हिन्दू कोलेज,दिल्ली में कार्यरत हैं.संपर्क सूत्र है-pallavkidak@gmail.com 
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